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इंदौर में ‘गूंज’, DUSU में झटका; राहुल गांधी के युवा दांव का असली इम्तिहान अब

केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने तंज किया, 'मैंने गूंज तो नहीं सुनी, लेकिन धमाका जरूर सुना.' इंदौर में राहुल के कार्यक्रम पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का जवाब था ‘झूठ की गूंज’.

इंदौर में ‘गूंज’, DUSU में झटका; राहुल गांधी के युवा दांव का असली इम्तिहान अब
  • राहुल ने इंदौर में छात्रों की भर्ती, पढ़ाई और रोजगार से जुड़ी शिकायतों को लेकर संवाद कार्यक्रम आयोजित किया था
  • DUSU चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई को एक भी पद नहीं मिला था, जबकि एबीवीपी ने तीन पद जीते थे
  • छात्रों ने आरक्षण, नियुक्ति में देरी और नर्सिंग कोर्स की परीक्षा परिणामों में अनियमितताओं की शिकायतें कीं
नई दिल्ली:

कांग्रेस छात्रों की शिकायतों में अपनी वापसी का रास्ता तलाश रही है. भाजपा आयोजन को ‘प्रायोजित' बता रही है और सरकार अपने आंकड़े सामने रख रही है. इंदौर के संवाद और दिल्ली विश्वविद्यालय के नतीजों के बीच युवा राजनीति की एक दिलचस्प, लेकिन उलझी हुई तस्वीर बनी है. वैसे इंदौर में छात्रों की शाम का अपना हिसाब है. अगली परीक्षा कब है, कोचिंग का कितना हिस्सा छूट गया, असाइनमेंट कब जमा करना है, इंटरव्यू का जवाब क्यों नहीं आया और अगले महीने कमरे का किराया कैसे निकलेगा. शनिवार, 19 सितंबर को राहुल गांधी ने इसी बातचीत में अपनी जगह बनाने की कोशिश की. 

‘छात्रों की गूंज' के मंच पर भर्ती, पढ़ाई और रोजगार के सवाल उठे. कांग्रेस के लिए इस आयोजन का मतलब उन युवाओं तक पहुंचना भी था, जिनके बीच पार्टी को अपना परिचय और अपना भरोसा नए सिरे से बनाना है. उसी दिन दिल्ली से दूसरी खबर आई. दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ चुनाव में कांग्रेस की छात्र इकाई एनएसयूआई चार में से एक भी पद नहीं जीत सकी. एबीवीपी तीन पद ले गई और उपाध्यक्ष का पद निर्दलीय दीपांशु शौकीन ने जीत लिया. दिलचस्प यह कि शौकीन एनएसयूआई से टिकट नहीं मिलने के बाद निर्दलीय मैदान में उतरे थे. इंदौर में कांग्रेस युवा संवाद का नया अध्याय खोल रही थी. दिल्ली में उसके छात्र संगठन का रिपोर्ट कार्ड सामने था. 

भाजपा ने इस संयोग को हाथ से नहीं जाने दिया. केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा ने तंज किया, 'मैंने गूंज तो नहीं सुनी, लेकिन धमाका जरूर सुना.' इंदौर में राहुल के कार्यक्रम पर मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव का जवाब था ‘झूठ की गूंज'. यानी छात्रों के सवालों के साथ कार्यक्रम के नाम पर भी राजनीतिक मुकाबला शुरू हो गया. लेकिन इन राजनीतिक जुमलों के पीछे छात्रों के सवाल कहीं अधिक ठोस थे. राजगढ़ की सपना गुर्जर और सतना के अखिल भारती क्रांति ने एमपीपीएससी समेत भर्तियों में 13 प्रतिशत पद होल्ड होने का मुद्दा उठाया. सपना ने ओबीसी आरक्षण विवाद के बीच नियुक्तियां अटकने की शिकायत की. अखिल भारती ने कहा कि प्री, मेंस और इंटरव्यू पार करने के बाद भी अभ्यर्थी वर्षों से इंतजार कर रहे हैं और कई की उम्र निर्धारित सीमा से बाहर निकल रही है. 

नर्सिंग घोटाला जिसको सबसे पहले एनडीटीवी ने ही सामने रखा था, उसकी छात्रा याशिका दानी की शिकायत ने इस इंतजार का दूसरा चेहरा दिखाया. उनके मुताबिक उन्होंने 2020 में दाखिला लिया था. चार साल का कोर्स 2024 में पूरा होना था, लेकिन 2026 में भी वह तीसरे वर्ष में हैं. उन्होंने परिणाम और परीक्षाओं में देरी की बात कही और बताया कि फीस भरने के लिए कॉल सेंटर में नौकरी करनी पड़ी. अस्पताल में काम तलाशने निकलें तो अधूरी डिग्री कम वेतन के प्रस्ताव की वजह बन जाती है.

शिक्षक भर्ती का मुद्दा दीप्ति सिंह ठाकुर ने उठाया. उन्होंने चयनित होने के बावजूद नियुक्ति नहीं मिलने की शिकायत की और वर्ग-2 तथा वर्ग-3 में पद बढ़ाने की मांग रखी. आंदोलन से जुड़े नरेंद्र राजपूत के अनशन का मामला भी सामने आया. राहुल ने आंदोलन में बुलाए जाने पर आने की बात कही. इस मामले में सरकार का सीधा प्रतिवाद आया. स्कूल शिक्षा विभाग ने कहा कि दीप्ति सिंह का नाम चयन या प्रतीक्षा सूची में नहीं है. नरेंद्र राजपूत के बारे में विभाग ने बताया कि ईडब्ल्यूएस श्रेणी में अंतिम चयनित अभ्यर्थी की रैंक 3,621 थी, जबकि उनकी रैंक 5,427 है. विभाग का यह भी कहना था कि परिणाम जारी होने के बाद पद बढ़ाने का कानूनी प्रावधान नहीं है. इस तरह मंच पर रखे गए चयन और नियुक्ति संबंधी दावों पर विभाग ने अलग स्थिति सामने रखी.

धार के रवि वास्कले ने आदिवासी बहुल बालाघाट में स्वास्थ्य सेवाओं, बच्चों की मौतों और स्वास्थ्य विभाग में खाली बैकलॉग पदों का मुद्दा उठाया. वहीं देवास के रंजीत किसानवंशी ने कृषि और पटवारी भर्ती परीक्षाओं में कथित गड़बड़ियों तथा प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई की शिकायत की. उनका आरोप था कि मुख्यमंत्री से आश्वासन मिलने के बाद इंदौर लौटने पर उनके और साथी राधे जाट के खिलाफ एफआईआर हुई और उन्हें जेल जाना पड़ा. ये मंच पर वक्ताओं की ओर से रखे गए आरोप थे.

राहुल ने इन अलग-अलग शिकायतों को ‘सिस्टम बनाम छात्र' की राजनीतिक बहस में रखा. उन्होंने नरेंद्र मोदी, अमित शाह और आरएसएस नेतृत्व पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था सवाल पूछने वाले छात्रों से असहज होती है. मुख्यमंत्री मोहन यादव ने इसके जवाब में राहुल की तैयारी और कार्यक्रम की मंशा पर सवाल उठाए. उन्होंने कहा, 'बिना तैयारी के उन्होंने कुछ बच्चों और युवा मित्रों से संवाद किया.' मुख्यमंत्री का आरोप था कि कांग्रेस ने अपने एजेंडे के आधार पर जनता में भ्रम फैलाने के लिए कार्यक्रम आयोजित किया.

यादव ने सरकार का पक्ष रखते हुए शिक्षा और भर्ती के आंकड़े भी गिनाए. उनके मुताबिक स्कूल शिक्षा का बजट बढ़कर 38,658 करोड़ रुपये हुआ है और प्रदेश में 33 मेडिकल कॉलेज संचालित हैं. उन्होंने स्कूल शिक्षा विभाग में 10 हजार भर्तियां किए जाने और पुलिस विभाग की भर्ती प्रक्रिया का भी उल्लेख किया. मुख्यमंत्री का कहना था कि मध्यप्रदेश पर बात तथ्यों और उपलब्धियों के आधार पर होनी चाहिए. भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने आयोजन की विश्वसनीयता पर हमला किया. उन्होंने कहा, 'कांग्रेस को युवाओं पर वास्तविक विश्वास होता तो छात्रों की आड़ में पार्टी कार्यकर्ताओं को मंच पर खड़ा नहीं करती.' खंडेलवाल ने आरोप लगाया कि कांग्रेस छात्रों के नाम पर राजनीतिक प्रबंधन कर रही है, जबकि युवाओं का विश्वास राष्ट्रवाद के साथ है.

इस तरह बहस के दो स्तर बन गए. कांग्रेस मंच से सामने आई शिकायतों को सरकार के कामकाज पर सवाल बता रही है. भाजपा प्रतिभागियों की राजनीतिक संबद्धता और आयोजन की मंशा पर सवाल उठा रही है. शिक्षक भर्ती के मामले में विभाग ने चयन-सूची और रैंक का प्रतिवाद भी रखा. इंदौर इस अभियान का पांचवां पड़ाव था. कोटा में पढ़ाई और प्रतियोगी परीक्षा के दबाव, देहरादून में पेपर लीक, प्रयागराज में शिक्षा और बेरोजगारी तथा पुणे में छात्राओं की बराबरी, सुरक्षा और पितृसत्ता जैसे मुद्दे उठाए गए थे. इंदौर में सरकारी भर्ती, नर्सिंग शिक्षा और नियुक्तियों के इंतजार ने स्थानीय संदर्भ जोड़ा. अलग-अलग शहरों की शिकायतों को जोड़कर कांग्रेस एक राष्ट्रीय युवा संवाद बनाने की कोशिश कर रही है.

इंदौर का चुनाव केवल शैक्षणिक कारणों से नहीं हुआ. मध्यप्रदेश की कारोबारी राजधानी मालवा-निमाड़ के उस राजनीतिक इलाके में है, जिसकी 66 विधानसभा सीटें प्रदेश में सत्ता का गणित बदल सकती हैं. 2013 में भाजपा ने इनमें 57 सीटें जीती थीं. 2018 में कांग्रेस 36 सीटों तक पहुंची भाजपा 27 पर रह गई, जबकि कांग्रेस के तीन बागी निर्दलीय जीते. फिर 2023 में भाजपा 48 सीटों पर पहुंच गई और कांग्रेस 17 पर सिमट गई. एक सीट भारत आदिवासी पार्टी को मिली. कांग्रेस के लिए इस इतिहास में वापसी की संभावना और पिछली हार की चेतावनी, दोनों हैं. 

इंदौर जिले में तस्वीर और कठिन है. 2023 में कांग्रेस सभी नौ विधानसभा सीटें हार गई थी. जिन जीतू पटवारी के नेतृत्व में अब प्रदेश कांग्रेस वापसी की कोशिश कर रही है, वही राऊ में मधु वर्मा से 35 हजार से अधिक वोटों से हारे थे. पटवारी यह सीट 2013 और 2018 में जीत चुके थे. इसलिए राऊ क्षेत्र में बड़ा युवा आयोजन पटवारी के लिए भी राजनीतिक महत्व रखता है. पार्टी अपनी मौजूदगी उस इलाके में फिर दिखाना चाहती है, जहां उसका नुकसान सबसे साफ दिखाई दिया था. कांग्रेस का हिसाब है कि यहां बचाने के लिए कम, वापस पाने के लिए बहुत कुछ है. हालांकि जमीन पर भाजपा का मजबूत संगठन मौजूद है और उस चुनौती का जवाब एक आयोजन से नहीं मिलने वाला.

इंदौर की दूसरी अहमियत उसके छात्र भूगोल में है. राऊ और महू के आसपास निजी विश्वविद्यालय, कॉलेज, हॉस्टल और पीजी हैं. भंवरकुआं जैसे इलाकों में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी की पूरी दुनिया बसी है. यहां मध्यप्रदेश के अलग-अलग जिलों के साथ गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और उत्तरप्रदेश से भी युवा पढ़ने आते हैं. इसी शहर में मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग का मुख्यालय है. यहीं सरकारी नौकरी की तैयारी करने वालों की बड़ी आबादी है और यहीं इंफोसिस तथा टीसीएस जैसी कंपनियों में काम करने वाले युवा पेशेवर भी हैं. किसी की उम्मीद भर्ती के विज्ञापन से जुड़ी है, किसी की अगले इंटरव्यू और बेहतर वेतन से. कांग्रेस को एक ही शहर में कई तरह की युवा चिंताओं तक पहुंचने का अवसर मिलता है.

सत्य निकेतन में मारे गए अर्पित जाज के परिजनों के साथ राहुल गांधी

सत्य निकेतन में मारे गए अर्पित जाज के परिजनों के साथ राहुल गांधी

इसीलिए आयोजन से पहले स्थानीय कार्यकर्ताओं ने कॉलेजों, हॉस्टलों, लाइब्रेरी, कैफे और दूसरी अनौपचारिक जगहों पर संपर्क किया था. ऑनलाइन पंजीकरण को भी आगे के संपर्क का माध्यम बनाने की योजना थी. वैसे कार्यक्रम से पहले हुए विवादों ने भी इसे राजनीतिक रंग दिया. पहले 12 सितंबर को नेहरू स्टेडियम में आयोजन की योजना थी. अनुमति नहीं मिली प्रशासन ने स्टेडियम के उपयोग से संबंधित हाईकोर्ट के निर्देशों का हवाला दिया. कार्यक्रम 19 सितंबर को रीजनल पार्क के सामने आईडीए की जमीन पर हुआ. 

राहुल गांधी के मंच पर पुलकित मनी की कितनी जरूरत थी?

अतिरिक्त किराये पर विवाद में आईडीए ने स्वीकृत अवधि से पहले जमीन इस्तेमाल होने की बात कही, जबकि कांग्रेस ने राजनीतिक दबाव का आरोप लगाया. पुलिस की 31 सुरक्षा शर्तों में राजीव गांधी की हत्या से जुड़ी सुरक्षा चूक पर वर्मा आयोग की रिपोर्ट का उल्लेख भी विवाद बना. कांग्रेस ने इसे बाधा पैदा करने की कोशिश कहा. पुलिस का पक्ष था कि आयोग का संदर्भ आयोजकों की जिम्मेदारियां स्पष्ट करने के लिए दिया गया था. मंच पर कॉमेडियन पुलकित मणि की प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मिमिक्री ने अलग बहस पैदा की. भाजपा नेताओं ने इस पर आपत्ति जताई. हास्य वाली क्लिप चर्चा में आई, लेकिन इससे कार्यक्रम के सामने एक संपादकीय और राजनीतिक चुनौती भी दिखी किसी मजाक की चर्चा के बीच नियुक्ति का इंतजार कर रहे छात्र की बात कितनी जगह बचा पाती है. 

इंदौर के मंच पर मौजूद थी दिल्ली की एक त्रासदी

इंदौर के मंच पर दिल्ली की एक त्रासदी भी मौजूद थी. सत्य निकेतन में इमारत गिरने से जान गंवाने वाले 18 वर्षीय अर्पित जाज का परिवार कार्यक्रम में आया. उनकी बहन प्रियंशी ने छात्रों की सुरक्षा और व्यवस्था की जवाबदेही का सवाल उठाया. पढ़ाई के लिए घर छोड़ने वाले युवाओं की चिंता यहां परीक्षा और नौकरी से आगे, सुरक्षित आवास तक पहुंच गई. यही वह पृष्ठभूमि है, जिसमें डूसू के नतीजे कांग्रेस के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाते हैं. अध्यक्ष पद पर एबीवीपी के यश डबास ने एनएसयूआई के विजय शंकर मीणा को 2,053 वोटों से हराया. उपाध्यक्ष बने निर्दलीय दीपांशु शौकीन को 30,615 वोट मिले, जबकि एनएसयूआई के आधिकारिक उम्मीदवार को 4,313 वोट. जिसे संगठन ने टिकट नहीं दिया, छात्रों ने उसे विजेता बना दिया. यह कांग्रेस के लिए उम्मीदवार चयन और परिसर में वास्तविक पकड़ की समीक्षा का कारण है.

DUSU चुनाव ने बताया- नाराजगी वोट में तब्दील यूं ही नहीं होगी

दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनाव पूरे देश के युवाओं की राय नहीं बताता. अध्यक्ष पद का मुकाबला भी एकतरफा नहीं था. फिर भी यह नतीजा उस धारणा को चुनौती देता है कि छात्रों की नाराजगी अपने-आप विपक्ष के पक्ष में वोट बन जाएगी. उम्मीदवार की पहचान, स्थानीय काम और संगठन की उपलब्धता का अपना महत्व है. मध्यप्रदेश के करीब 5.63 करोड़ मतदाताओं में लगभग 1.53 करोड़, यानी 27 प्रतिशत से अधिक, 30 वर्ष से कम उम्र के हैं. 18-19 साल के मतदाता करीब 16.89 लाख हैं. ये 2024 के आंकड़े हैं, लेकिन बताते हैं कि अगली पीढ़ी से राजनीतिक संबंध दोनों दलों के लिए कितना महत्वपूर्ण है. 

इंदौर ने अवसर दिया, पर दिल्ली ने भी काम याद दिलाया

इस आबादी की जरूरतें भी अलग-अलग हैं. इंदौर ने कांग्रेस को बातचीत आगे बढ़ाने का अवसर दिया है. दिल्ली ने संगठन का काम याद दिलाया है. सरकार ने अपने आंकड़े रखे हैं और भाजपा ने आयोजन की मंशा पर सवाल उठाए हैं. अब देखना होगा कि छात्रों की शिकायतों पर रिकॉर्ड क्या बताते हैं और जिन समस्याओं की पुष्टि होती है, उन पर कार्रवाई कितनी आगे बढ़ती है. शनिवार का कार्यक्रम हो चुका है. छात्र फिर कोचिंग, कॉलेज, दफ्तर और किराये के कमरों की जिंदगी में लौटेंगे. उनकी अगली तारीख परीक्षा, परिणाम या नियुक्ति की होगी. कांग्रेस की अगली तारीख किसी दूसरे शहर की सभा हो सकती है. इंदौर की ‘गूंज' कितनी दूर जाएगी, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी को छात्रों वाली तारीखें कितनी याद रहती हैं. और सरकार के जवाब का असर इस पर कि उसके आंकड़ों के बीच इंतजार कर रहे छात्र को अपनी जगह कब मिलती है.

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