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शादी के लिए 'कमांडर' की इजाजत, 'नसबंदी' शर्त... किसी जहन्नुम से कम नहीं इन पूर्व नक्सलियों की दर्दनाक दास्तान

बस्तर की ये ग्राउंड रिपोर्ट सिर्फ एक हिंसक आंदोलन की हार की कहानी नहीं है, बल्कि इंसानी वजूद की उस जद्दोजहद की दास्तान है, जो हर बेड़ी तोड़कर अपनी आज़ादी छीन ही लाती है...

शादी के लिए 'कमांडर' की इजाजत, 'नसबंदी' शर्त... किसी जहन्नुम से कम नहीं इन पूर्व नक्सलियों की दर्दनाक दास्तान

Stories of Former Naxalites: आज की इस डिजिटल दुनिया में, जहां नौजवान चंद 'लाइक्स', रील वाले स्टारडम और शोहरत के नशे में अपनी आज़ादी का जश्न मनाते हैं... ठीक उसी वक्त इस देश के एक अंधेरे कोने में आज़ादी के मायने कुछ और ही थे. जब आप अपने स्मार्टफोन की स्क्रीन पर दुनिया मुट्ठी में होने का भ्रम पाल रहे थे, तब बस्तर के दंडकारण्य में एक ऐसा खौफनाक 'सिस्टम' चल रहा था, जहां इंसान की सांसों का हिसाब भी कोई और रखता था. वहां कानून की हकीकत एके-47 की नली से तय होती थी. यह उस 'लाल आतंक' की दुनिया का वो सच है, जो किसी वैचारिक या किताबी इंकलाब से नहीं, बल्कि इंसान की रूह को गुलाम बना देने वाली खौफनाक बेड़ियों और छीनी गई निजता से बुना गया था. जहां शादी के लिए 'कमांडर' की इजाजत और जिंदगी के लिए 'नसबंदी' शर्त थी.

बस्तर में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान ली गई तस्वीर

बस्तर में ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान ली गई तस्वीर
Photo Credit: Nishant Mishra

अपनी पहचान मिटाकर एक 'फर्जी वजूद' ओढ़ लेना कोई फिल्मी सस्पेंस नहीं, बल्कि इस खूनी इंकलाब की पहली शर्त थी. 15 साल की कच्ची उम्र में माओवादी संगठन का हिस्सा बने रामा को 'बदरना' का नाम दे दिया गया. सरकारी दस्तावेजों से दूरी सिर्फ पुलिस से बचने का पैंतरा नहीं था, बल्कि इंसान को उसकी जड़ों से काट फेंकने की एक सोची-समझी साजिश थी. बदरना बताते हैं कि संगठन में निजी जिंदगी नाम का कोई शब्द ही नहीं था.

अगर किसी के दिल में मोहब्बत पनप भी जाए, तो उसे शादी के लिए अपने 'कमांडर' के इजाजत का इंतजार करना पड़ता था. और बात सिर्फ शादी की इजाजत तक नहीं रुकती थी. बदरना बताते हैं कि उनके दौर में शादी से पहले नसबंदी का खौफनाक नियम लागू था, उन्होंने खुद नसबंदी कराई थी. बता दें कि कमांडर ग्रुप का लीडर होता था जिसके अंतर्गत कई माओवादी काम करते थे.

रात के अंधेरे में बदलते ठिकाने

दूसरी तरफ उन बच्चों की खौफनाक दास्तान है, जिनके हाथों से स्लेट छीनकर बारूद थमा दिया गया. पांचवीं क्लास में पढ़ने वाले हेमुधर नाग, जिन्हें बीहड़ों में 'पवन' के नाम से पुकारा गया, पूरे आठ साल तक इस दलदल में रहे. हेमुधर उस खौफ को याद करते हुए बताते हैं कि जंगल की उस जिंदगी में सबसे बड़ी तकलीफ थी लगातार अस्थिरता. हर रात ठिकाना बदलता, हर आहट पर मौत का साया मंडराता.

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Photo Credit: Nishant Mishra

उनकी पत्नी फगुनी कश्यप का दर्द भी इसी खौफ से रिसता है. फगुनी बताती हैं कि जंगल में उनका दिन अलसुबह चार बजे शुरू होता था और पुलिस की घेराबंदी से छुपते-छुपाते हुए कटता था. लेकिन सबसे बड़ी पीड़ा मौत का डर नहीं था. फगुनी बड़े ही शांत लेकिन भारी लहजे में बताती हैं कि जंगल में बिताए पूरे तीन साल तक वो अपने परिवार की एक झलक तक नहीं देख सकीं. अपनों से मिलना आपकी मर्जी पर नहीं, बल्कि संगठन के निर्दयी फरमान पर तय होता था.

पूर्व नक्सलियों के लिए क्या है 'आज़ादी' का असली मतलब?

आज ये पूर्व कैडर हथियार डालकर मुख्यधारा में लौट आए हैं. हमारे-आपके लिए इस आजादी के मायने भले ही छोटे हो सकते हैं, लेकिन पूर्व कैडरों के लिए बेहद गहरे हैं. हेमुधर के लिए सबसे बड़ी बात तो अब रात को आराम से सो पाना है, बिना इस खौफ के कि कोई उन्हें आधी रात को जगाकर भागने को कहेगा. फगुनी के लिए आज़ादी का मतलब उस तीसरी कक्षा के बाद छूटी पढ़ाई को ओपन स्कूल से दोबारा शुरू करना है, जिसकी कोई 'मार्कशीट' उन्हें संगठन ने नहीं दी थी.

दंडकारण्य जंगल के बीच से गुजरते हुए रास्ते की तस्वीर

दंडकारण्य जंगल के बीच से गुजरते हुए रास्ते की तस्वीर
Photo Credit: Nishant Mishra

इन चेहरों को देखकर एक बात साफ हो जाती है कि आज़ादी सिर्फ किसी जेल की सलाखों से बाहर आने का नाम नहीं है. आज़ादी का असली मतलब है- बिना किसी कमांडर की इजाज़त के अपने मां-बाप के गले लगना और 'संगठन के दिए फर्जी नाम' को कूड़ेदान में फेंककर अपनी असली पहचान के साथ इस खुली हवा में बेखौफ सांस लेना. बस्तर की यह कहानी सिर्फ एक हिंसक आंदोलन की हार की कहानी नहीं है, बल्कि इंसानी वजूद की उस जद्दोजहद की दास्तान है, जो हर बेड़ी तोड़कर अपनी आज़ादी छीन ही लाती है.

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