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बस्तर में गुरिल्ला वॉर से कैफे में 'कस्टमर सर्विस' तक... पूर्व नक्सलियों की जिंदगी कैसे चुन रही अपना 'मेन कोर्स'

Surrendered Naxals Work: किसी पूर्व माओवादी का वह संगठनात्मक अनुशासन, जो कभी गोलियां चलाने में इस्तेमाल होता था, अब हॉस्पिटैलिटी की दुनिया में 'ऑर्डर प्लीज' कहकर लोगों का दिल जीत रहा है. पढ़िए पूरी ग्राउंड रिपोर्ट...

बस्तर में गुरिल्ला वॉर से कैफे में 'कस्टमर सर्विस' तक... पूर्व नक्सलियों की जिंदगी कैसे चुन रही अपना 'मेन कोर्स'
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Bastar Pandum Cafe: लाल गलियारों की वो खौफनाक दुनिया, जहां कभी इंसान का नाम और उसका वजूद दोनों किसी अनजान 'कमांडर' की फाइलों में दफन हो जाया करते थे, आज एक अजीब से विरोधाभास से गुजर रही है. दशकों तक जिस दंडकारण्य के भूगोल ने बारूद की गंध और गुरिल्ला वॉर का खूनी 'स्टारडम' देखा, वहां आज एक खामोश इंकलाब कॉफी के प्यालों में उबल रहा है. सिस्टम की बंदूकों और माओवादी विचारधारा के तिलिस्म के बीच अब जिंदगी ने अपना नया 'मेन कोर्स' चुन लिया है.

पंडुम कैफे की तस्वीर

पंडुम कैफे की तस्वीर
Photo Credit: Nishant Mishra

खौफ का मेन्यू और 'कस्टमर सर्विस' का क्रैश कोर्स

बस्तर का 'पंडुम कैफे' महज़ एक रेस्तरां नहीं, बल्कि खून से सने उस अतीत का श्मशान है, जहां अब नई उम्मीदों की तामीर हो रही है. सोचिए, जिन हाथों की उंगलियां एके-47 के ट्रिगर पर सेट थीं, वह आज कॉफी मशीन का बटन दबा रही हैं. हेमुधर नाग, जिसे कभी बीहड़ों में 'पवन' के नाम से जाना जाता था, आज ग्राहकों को मुस्कुराहट के साथ मेन्यू कार्ड थमा रहा है. 5वीं क्लास में ही माओवादी चंगुल में फंसे हेमुधर ने 8 साल तक खौफ का वह नंगा नाच देखा, जहां एक रात सुकून से सोना भी किसी सपने जैसा था.

उसकी पत्नी फगुनी कश्यप, जो भोर की पहली किरण के साथ सिविल स्काउटिंग पर निकलती थी और पुलिस की घेराबंदी से गुप्त रास्तों से बच निकलने की महारत रखती थी, आज टेबल साफ करते हुए जिंदगी के बिखरे पन्नों को समेट रही है. नक्सलाइन वॉर से लेकर कैफे में 'कस्टमर सर्विस' तक का यह क्रैश कोर्स किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से ज्यादा खौफनाक और असल है.

'पंडुम कैफे' जहां पूर्व नक्सली कर रहे काम

जगदलपुर शहर में स्थित पंडुम कैफे का नाम भी बस्तर की स्थानीय संस्कृति से लिया गया है. गोंडी भाषा में ‘पंडुम' का अर्थ उत्सव या त्योहार होता है. बस्तर में साल भर होने वाले अलग-अलग त्योहारों और सामुदायिक परंपराओं को ध्यान में रखते हुए कैफे का वातावरण तैयार किया गया है. यहां की सजावट और कलाकृतियों में स्थानीय संस्कृति दिखाई देती है.

कैफे में काम कर रहे पूर्व नक्सली

कैफे में काम कर रहे पूर्व नक्सली
Photo Credit: Nishant Mishra

पंडुम कैफे के मैनेजर ओमप्रकाश यादव के लिए यहां काम करना उनके 15 सालों के हॉस्पिटैलिटी अनुभव से अलग रहा है. बिलासपुर के रहने वाले ओमप्रकाश ने होटल मैनेजमेंट की पढ़ाई की है. उनके मुताबिक शुरुआत में पूर्व कैडरों के साथ काम करने को लेकर कुछ आशंकाएं थीं, लेकिन रोजमर्रा के काम के दौरान वे धीरे-धीरे खत्म हो गईं.

ओमप्रकाश बताते हैं कि ये कर्मचारी शांत स्वभाव के हैं, नई चीजें जल्दी सीखते हैं और टीम के साथ काम करने में सहज हैं. उनके अनुसार, संगठन में काम करने के दौरान विकसित हुआ अनुशासन अब सामान्य नौकरी में भी दिखाई देता है.

बारूदी पगडंडियों से रिहाई और आज़ादी का नया 'ऑर्डर'

खोजी नजरिए से देखें तो यह महज़ सरेंडर की कोई सरकारी फाइल नहीं है. यह उस 'कैद' से रिहाई की दास्तान है, जिसे विचारधारा का चोला पहनाया गया था. जंगल के उस खौफनाक ढांचे में न तो कोई अपनी मर्जी से परिवार से मिल सकता था, न ही जिंदगी का कोई निजी फैसला ले सकता था. हर सांस पर संगठन का पहरा था. लेकिन आज, फगुनी बिना किसी खौफ के खुली हवा में सांस ले रही है. वह बिना मार्कशीट वाली अपनी अधूरी माओवादी तालीम को पीछे छोड़कर ओपेन स्कूल के जरिए आम जिंदगी का ककहरा पढ़ रही है.

पंडुम कैफे के मैनेजर ओमप्रकाश यादव से बातचीत करते रिपोर्टर

पंडुम कैफे के मैनेजर ओमप्रकाश यादव से बातचीत करते रिपोर्टर
Photo Credit: Nishant Mishra

असल जीत 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे के सिर्फ सरकारी दावों या मुठभेड़ों के आंकड़ों में नहीं है. असली कामयाबी इस बात में है कि किसी पूर्व कैडर का वह संगठनात्मक अनुशासन, जो कभी गोलियां चलाने में इस्तेमाल होता था, अब हॉस्पिटैलिटी की दुनिया में 'ऑर्डर प्लीज' कहकर लोगों का दिल जीत रहा है. लाल आतंक के काले साये को चीरकर, पंडुम कैफे की ये रंगीन लाइटें चीख-चीख कर कह रही हैं कि जब मौत की पगडंडियां डामर की सड़कों में तब्दील होती हैं, तो गुरिल्ला वॉर का सिपाही भी एक आम इंसान बनने की जुर्रत कर ही लेता है.

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