Former Maoists Surrendered: आज जब देश में नक्सलवाद अपनी अंतिम सांसें ले रहा है और बस्तर का लाल गलियारा विकास की मुख्यधारा से जुड़ चुका है, तब अतीत के वो काले पन्ने आज भी इतिहास की गवाही देते हैं. बस्तर के जंगलों में कभी 15 साल तक मौत का तांडव देखने वाला एक ऐसा ही पूर्व नक्सली कमांडर था 'बदरना', जिसकी निगहबानी में हिडमा जैसे खूंखार माओवादी तैयार हुए थे. एके-47 छोड़कर काफी पहले ही मुख्यधारा में आम इंसान की जिंदगी जी रहे पूर्व कमांडर बदरना की आपबीती लाल गलियारे के उस बीते हुए दौर के घिनौने सच को बेनकाब करती है, जिसे जानना आज के शांत बस्तर को समझने के लिए जरूरी है. जानिए इस अनसुनी दास्तां को...
कैसा था जंगल का वो खौफनाक 'सिस्टम'?
बदरना (जिनका असली नाम रामा है) महज 15 साल की कच्ची उम्र में उस खूनी जंग का हिस्सा बन गए थे, जिसके लाल आतंक ने दशकों तक देश की सरकारों की नींद उड़ा रखी थी. तब बस्तर के उस माओवादी तिलिस्म में इंसान की हैसियत महज एक कठपुतली से ज्यादा कुछ नहीं थी. बदरना बताते हैं कि संगठन में रहते हुए किसी के पास आधार कार्ड या कोई भी सरकारी दस्तावेज नहीं होता था. अपनी असली पहचान को दफन कर देना ही उनकी सबसे बड़ी 'सुरक्षा' मानी जाती थी. लेकिन इस तथाकथित वैचारिक इंकलाब का सबसे घिनौना चेहरा वो था, जिसने कैडरों की निजी जिंदगी और उनकी बुनियादी भावनाओं पर अपना ताला जड़ दिया था.

पूर्व नक्सली बदरना के साथ इंटरव्यू के दौरान ली गई तस्वीर
Photo Credit: Nishant Mishra
बदरना बताते हैं कि अगर किसी कैडर को प्यार हो जाए या वो शादी करना चाहे, तो उसे कमांडर उसे कमांडर से इजाजत लेनी पड़ती थी. बात सिर्फ इजाजत तक ही नहीं रुकती थी; उस दौर में शादी की शर्त ही 'नसबंदी' थी, जिससे संगठन में कोई पारिवारिक मोह न पनप सके. खुद बदरना को भी शादी करने के लिए नसबंदी करानी पड़ी थी. बदरना का कहना है कि बिना वेतन के, बेबस ग्रामीणों से छीने गए राशन पर पलने वाला यह संगठन बाहर से भले ही जल-जंगल-जमीन के अधिकारों की बात करता हो, लेकिन हकीकत में इसने अपने ही लड़ाकों के वजूद और भविष्य दोनों को पैरों तले रौंद दिया था.
हिडमा की पौध, अपनों की लाशें और वो आंसू...
दक्षिण बस्तर को कभी अपनी उंगलियों पर नचाने वाले बदरना उस दौर के गवाह हैं, जब माओवादी आंदोलन अपनी नई पौध में जहर घोल रहा था. 'हिडमा' जिसके नाम से तब बस्तर का भूगोल कांपता था- कभी बदरना के ही इलाके का एक साधारण युवा कैडर हुआ करता था. बदरना बताते हैं कि शुरुआती दौर में हिडमा से उनकी अक्सर मुलाकातें होती थीं. बदरना खुद को हिडमा का सीधा गुरु तो नहीं बताते, लेकिन यह जरूर कुबूल करते हैं कि उन्हीं जैसे वरिष्ठ कमांडरों के साये में हिडमा जैसी खूंखार पौध तैयार हुई थी.
फिर सवाल उठता है कि 15 साल तक इस खूनी ढांचे को सींचने वाले बदरना ने साल 2000 में बंदूक जमीन पर क्यों पटक दी? इसका जवाब उस आक्रोश और इंसानी पीड़ा में छिपा है, जिसे क्रांति का झूठा चोला पहनाकर लंबे समय तक दबाया नहीं जा सकता था. हिंसा पर अपने बदलते नजरिए का जिक्र करते हुए बदरना बताते हैं कि पुलिस के साथ हुई मुठभेड़ों में उन्होंने दो बार मौत को बिल्कुल करीब से देखा था. लेकिन उनका दिल तब हमेशा के लिए टूट गया, जब उन्होंने अपने ही साथियों की लाशें गिरती देखीं.
बदरना नम आंखों से बताते हैं कि जिन साथियों के साथ उन्होंने सालों तक एक ही थाली में खाना खाया था, उनके गोलियों से छलनी जिस्म को देखकर उन्हें साफ समझ आ गया था कि यह तथाकथित इंकलाब अब अपने रास्ते से भटक चुका है और संगठन के नाम पर केवल व्यक्तिगत दुश्मनी, जबरन वसूली और मासूमों का सरेआम कत्लेआम चल रहा है.

पूर्व नक्सली बदरना का घर, जगदलपुर छत्तीसगढ़
Photo Credit: Nishant Mishra
बारूद से निकलकर खुशहाल परिवार तक का सफर
बता दें कि बदरना खुद को मध्यप्रदेश का पहला नक्सली होने का भी दावा करता है, हालांकि हम इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं करते हैं. बहरहाल खून-खराबे का रास्ता छोड़कर जब बदरना ने आत्मसमर्पण किया, तो सरकार और समाज ने भी उन्हें गले लगाया. आज वही बदरना जगदलपुर नगर निगम में एक आम कर्मचारी की तरह काम करते हैं. उनकी पत्नी छत्तीसगढ़ पुलिस का हिस्सा बनकर कानून की सेवा कर रही हैं.
सरकार की मदद से अस्पताल में बदरना की नसबंदी का सफल रिवर्सल ऑपरेशन किया गया, जिसके बाद उनके आंगन में एक नन्ही बेटी की किलकारी गूंजी. बदरना की यह जिंदगी सिर्फ एक पूर्व नक्सली का सरेंडर नहीं है, बल्कि इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि बारूद के ढेर पर खड़ा कोई भी खूनी साम्राज्य आखिरकार इंसानी संवेदनाओं और आंसुओं के आगे कभी टिक नहीं सकता.
Nishant Mishra's Report
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