Chhattisgarh DRG Jawan: कुछ समय पहले की बात है जब बस्तर के दंडकारण्य में सस्पेंस किसी नेटफ्लिक्स सीरीज़ से नहीं, बल्कि इस बात से तय होता था कि जंगल में गया इंसान वापस लौटेगा या किसी आईईडी (IED) का शिकार बन जाएगा. लेकिन अब वह खौफनाक तिलिस्म टूट रहा है. जिस भूगोल ने दशकों तक माओवादियों को अपनी खूनी आस्तीन में पनाह दी, आज उसी भूगोल ने उनके खिलाफ बगावत कर दी है.
भेदा गया चक्रव्यूह, माओवादियों का टूटा गुरूर
बस्तर और आसपास का 92 हजार वर्ग किलोमीटर में फैला वो तिलिस्मी दंडकारण्य, जो कभी माओवादियों के लिए महफूज़ किला हुआ करता था, आज उनके लिए ही एक खौफनाक कब्रगाह बन चुका है. दरअसल, माओवादियों को इस बात का गुरूर था कि घने जंगल, भूलभुलैया जैसी पगडंडियां और स्थानीय बोली उनका सबसे बड़ा रक्षा कवच था. जब पड़ोसी राज्यों से खदेड़े गए, तो इसी भूगोल ने उन्हें पनाह दी. लेकिन साल 2008 में 'डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड' (DRG) के गठन ने इस खूनी बिसात का रुख ही पलट दिया.

बस्तर में GRG के जवानों के साथ एनडीटीवी रिपोर्टर निशांत मिश्रा
Photo Credit: Nishant Mishra
जिस स्थानीय ज्ञान और नेटवर्क का इस्तेमाल करके लाल आतंक के पैरोकार दशकों तक स्टेट (राज्य) की नज़रों में धूल झोंकते रहे, वही ज्ञान अब उनके ताबूत की आखिरी कील साबित हुआ. सुरक्षाबलों ने उसी माटी के युवाओं और सरेंडर कर चुके पूर्व माओवादियों को अपने साथ मिला लिया. डीआरजी (DRG) के जवानों ने उस चक्रव्यूह को उसी की भाषा में भेद दिया. बस्तर के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने भी DRG को नक्सलवाद के खात्मे को लेकर काफी महत्वपूर्ण बताया.
जिस भूगोल और समाज की आड़ लेकर नक्सलियों ने दशकों तक 'सिस्टम' को छकाया, आज उसी माटी ने उनके खिलाफ पुलिस की मुखबिरी शुरू कर दी. हेलीकॉप्टर वाले खौफनाक दौर से डामर की सड़कों के 'साइलेंट ऑपरेशन' तक कभी इन जंगलों में जाने के नाम से ही रूह कांप उठती थी. लेकिन आज इस बंजर खौफ में एक नया बीज अंकुरित हो हुआ.
पूर्व माओवादी कैडर हेमुधर नाग अपने उस पुराने और दहशतगर्द अतीत को याद करते हुए बताते हैं कि उनके इलाके में एक ऐसा भी दौर था, जब वहां महज एक साइकिल का पहुंचना भी किसी चमत्कार से कम नहीं था. रास्ते इतने खौफनाक और पुलिस की पहुंच से इतने दूर थे कि प्रशासन को गांव वालों के लिए राशन तक आसमान से हेलीकॉप्टर के जरिए गिराना पड़ता था. लेकिन आज तस्वीर का रुख पलट गया है.

पूर्व माओवादी हेमुधर से बातचीत कै दौरान ली गई तस्वीर
Photo Credit: Nishant Mishra
हेमुधर बताते हैं कि अब उन्हीं खौफनाक इलाकों में डामर की सड़कें बिछ रही हैं. जिन रास्तों पर कभी बंदूकों की गूंज होती थी, वहां आज स्कूल और आंगनवाड़ी की घंटियां बज रही हैं. बिजली और पानी पहुंच रहा है. खोजी पत्रकारिता की नजरों से देखें तो ये सिर्फ विकास नहीं है, बल्कि दंडकारण्य के 'रेड ज़ोन' में डामर की सड़कों का एक 'साइलेंट ऑपरेशन' है.
सरकार मार्च 2026 तक नक्सलवाद के खात्मे का जो दावा किया, उसकी असली हकीकत सिर्फ एनकाउंटर या सरेंडर के आंकड़ों में नहीं छिपी है. इस खूनी इंकलाब की कमर असल में तब टूटी, जब पगडंडियां सड़कें बनने लगीं. नक्सलवाद असल में गोलियों से नहीं, बल्कि भूगोल के पलटवार से हार गया है. वो रास्ते जो कल तक सिर्फ 'मौत' की गारंटी हुआ करते थे, आज बेखौफ होकर जिंदगी का अता-पता पूछ रहे हैं.
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