विज्ञापन
This Article is From Apr 08, 2026

बच्चे की कस्टडी को लेकर मां की स्पेशल अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की मंजूर, सिंगल बेंच के बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के खारिज करने वाले आदेश को किया रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बच्चे की कस्टडी से जुड़े एक मामले में स्पेशल अपील को स्वीकार कर लिया है. बच्चा अभी पति के पास है और मां उसकी कस्टडी पाने के लिए संघर्ष कर रही है.

बच्चे की कस्टडी को लेकर मां की स्पेशल अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की मंजूर, सिंगल बेंच के बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका के खारिज करने वाले आदेश को किया रद्द
child custody
इलाहाबाद:

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 20 महीने के बच्चे की कस्टडी को लेकर मां और पिता के बीच चल रही कानूनी लड़ाई में महत्वपूर्ण आदेश दिया है. वैवाहिक विवाद के बीच बच्चा पति के पास था और वो उसे महिला को सौंपने को तैयार नहीं है. बच्चे की कस्टडी को लेकर महिला ने पति के खिलाफ हाईकोर्ट की सिंगल बेंच मे बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की थी लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया. हालांकि हाईकोर्ट की डबल बेंच ने महिला की स्पेशल अपील को स्वीकार करते हुए एकल खंडपीठ के आदेश को गलत ठहराया है. दरअसल, हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी थी, जिसके खिलाफ मां ने बड़ी अदालत में गुहार लगाई थी.गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट 1890 के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर भी बच्चे की कस्टडी के लिए 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिका दायर की जा सकती है. 

बच्चे की कस्टडी से जुड़े मामले में मां द्वारा दाखिल स्पेशल अपील को इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मंजूर करते हुए महत्वपूर्ण आदेश में साफ कर दिया है कि वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर भी बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को खारिज नहीं किया जा सकता. दरअसल, हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने बच्चे की कस्टडी पिता को सौंपी थी, जिसके खिलाफ मां ने दुबारा अदालत में गुहार लगाई थी. कोर्ट ने कहा कि गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट 1890 के तहत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध होने पर भी बच्चे की कस्टडी के लिए 'बंदी प्रत्यक्षीकरण' याचिका दायर की जा सकती है.

इलाहाबाद हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता वाली डिविजन बेंच ने फैसला सुनाते हुए सिंगल के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें नाबालिग बच्चे की कस्टडी से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) याचिका को इस आधार पर खारिज कर दिया गया था कि पक्षकारों के पास ‘गार्जियन एंड वार्ड्स एक्ट' (Guardians and Wards Act 1890) के तहत वैकल्पिक उपचार मौजूद है. कोर्ट ने पाया कि अपील करने वाली मां का अपने नाबालिग बेटे की कस्टडी पाने का दावा रिट कोर्ट ने मेरिट के आधार पर नहीं देखा है. सिंगल बेंच की राय थी कि गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट 1890 के तहत उपाय मौजूद होने की वजह से हैबियस कॉर्पस की याचिका या तो पोषणीय नहीं है या रिट कोर्ट इसके लिए सही फोरम नहीं है.

कोर्ट ने कहा कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि पक्षकार इस कानून के तहत किसी अन्य फोरम में जा सकते हैं, खासकर तब जब किसी नाबालिग बच्चे के सर्वोत्तम हित का मामला जुड़ा हो. कोर्ट ने सिंगल जज के फैसले को रद्द करते हुए खारिज की गई हैबियस कॉर्पस याचिका को उसके ओरिजिनल नंबर और स्टेटस पर वापस लाने का आदेश देते हुए मामले को 16 अप्रैल को फ्रेश केस के तौर पर उचित बेंच के सामने पेश करने का आदेश दिया है. यह आदेश चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की डिविजन बेंच ने बलिया जिले से जुड़ी एक महिला आवेदक और उसके नाबालिग बेटे की स्पेशल अपील को मंजूर करते हुए दिया है. 

दरअसल, बलिया की रहने वाली महिला ने अपने बच्चे की कस्टडी पाने के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट में स्पेशल दाखिल की थी. महिला ने इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा 6 नवंबर 2025 के ऑर्डर के खिलाफ यह अपील दाखिल की थी. सिंगल जज ने अपीलकर्ता महिला की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को खारिज कर दिया था. यह रिट याचिका 20 महीने  के बेटे की मां ने दायर की थी. याचिका में कहा गया था कि बेटे का जन्म 13 अगस्त 2024 को हुआ था. लेकिन दोनों में वैवाहिक विवाद उत्पन्न हो गया. आरोप है कि बच्चे को पिता द्वारा जबरदस्ती ले जाया गया था. याचिका के अनुसार, बाल कल्याण समिति के 10 सितंबर 2025 को पारित आदेश के बावजूद पति ने बच्चे को उसे नहीं सौंपा.

छह नवंबर 2025 को सिंगल बेंच ने मां की हैबियस कॉर्पस याचिका को इन टिप्पणियों के साथ खारिज कर दिया कि हेबियस कॉर्पस रिट एक खास अधिकार वाली रिट है, जिसका मकसद किसी व्यक्ति की आजादी की रक्षा करना है, ताकि उसे गैरकानूनी या गलत हिरासत से तुरंत और असरदार तरीके से रिहाई मिल सके. अगर किसी नाबालिग को गलत तरीके से हिरासत से हटा दिया गया है तो उसकी कस्टडी उसके कानूनी गार्जियन को वापस देने के लिए भी रिट का इस्तेमाल किया जा सकता है. किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा नाबालिग को हिरासत में रखना जो कानूनी कस्टडी का हकदार नहीं है, गैरकानूनी हिरासत के बराबर माना जाता है. इसके लिए नाबालिग की कस्टडी के लिए रिट जारी करना ज़रूरी है.

सिंगल बेंच ने कहा था कि गार्जियनशिप और कस्टडी के मामलों को कंट्रोल करने वाला कानून मुख्य रूप से गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट 1890 में शामिल है. इसके तहत किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा दावा करने पर सही एप्लीकेशन देने पर गार्जियन को कस्टडी के लिए नियुक्त या हकदार बनाया जा सकता है. कोर्ट ने कहा था कि ऐसा कोई सबूत नहीं मिला जिससे ये साबित हो कि बच्चे की कस्टडी गैर-कानूनी या गलत है. इसलिए हैबियस कॉर्पस रिट, जिसका इस्तेमाल गैर-कानूनी कस्टडी से रिहाई के लिए किया जाता है , इस मामले में लागू नहीं होती है. जहां तक कस्टोडियल राइट के मुद्दे का सवाल है, यह पार्टियों के लिए यह खुला है कि वो कानून के अनुसार ऐसे हक तय करने के लिए सही फोरम से संपर्क करें. 

हाईकोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद पाया कि अपीलकर्ता मां का अपने नाबालिग बेटे जो अब लगभग 20 महीने का है उसकी कस्टडी पाने का दावा रिट कोर्ट ने मेरिट के आधार पर नहीं देखा था. सिंगल जज की राय थी कि गार्जियन्स एंड वार्ड्स एक्ट 1890 के तहत उपाय मौजूद होने की वजह से हैबियस कॉर्पस की याचिका या तो पोषणीय नहीं है या रिट कोर्ट इसके लिए सही फोरम नहीं है. कोर्ट ने कहा कि सिंगल जज द्वारा अपनाया गया दृष्टिकोण सुप्रीम कोर्ट के निर्णय यशित साहू बनाम राजस्थान राज्य और अन्य(2020) के विपरीत है.

इस फैसले में यह निर्धारित किया गया है कि अब यह तर्क देना बहुत देर की बात है कि यदि बच्चा दूसरे माता-पिता की कस्टडी में हो तो बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट विचारणीय नहीं है और यह कि न्यायालय बच्चे के सर्वोत्तम हित के लिए अपने असाधारण रिट क्षेत्राधिकार का प्रयोग कर सकता है. कोर्ट ने महिला की स्पेशल अपील को मंजूर करते हुए कहा कि कस्टडी के मामलों में सिर्फ बच्चे की भलाई ही सबसे जरूरी है और एक बार जब हम इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि रिट पिटीशन को पोषणीय न मानकर खारिज नहीं किया जा सकता या रिट कोर्ट का फोरम सही नहीं है तो रिट कोर्ट को मामले पर मेरिट के आधार पर विचार करना होगा, जहां पक्षकारों को अपनी पूरी बात कहने का मौका मिले. इन टिप्पणियों के साथ कोर्ट ने सिंगल जज द्वारा दिए गए आदेश को रद्द करते हुए पूर्व में खारिज की गई रिट पिटीशन को उसके ओरिजिनल नंबर और स्टेटस पर वापस लाने का भी आदेश दिया है. कोर्ट ने मामले को 16 अप्रैल 2026 को उचित पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए लिस्ट करने का आदेश दिया है.
 

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Allahabad High Court, Allahabad High Court Lucknow Bench, Habeas Corpus Petition, Child Custody, Husband Wife Dispute
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com