- Kidneys and heart work closely; damage in one affects the other
- Chronic kidney disease often shows no symptoms and needs screening
- Serum creatinine and eGFR tests assess kidney filtering function
जब भी किसी को दिल से जुड़ी कोई तकलीफ़ या बीमारी सामने आती है, तो पूरा ध्यान फौरन दिल की जांचों पर चला जाता है. डॉक्टर भी बिना देर किए ईसीजी, 2D इको, कोलेस्ट्रॉल की जांच और ब्लड प्रेशर नापने की सलाह देते हैं. यह सब बहुत जरूरी भी है. लेकिन इस पूरे चक्कर में हम शरीर के एक और बेहद अहम हिस्से को भूल बैठते हैं, और वो है हमारी किडनी यानी गुर्दा.
अगर आपको दिल की बीमारी, हाई ब्लड प्रेशर या डायबिटीज है तो सिर्फ हार्ट टेस्ट ही नहीं, किडनी की जांच भी जरूरी है. डॉक्टरों के मुताबिक eGFR, uACR समेत 5 टेस्ट ऐसी छिपी किडनी बीमारी का पता लगा सकते हैं जो शुरुआती दौर में कोई लक्षण नहीं दिखाती.
अक्सर लोग सोचते हैं कि दिल की बीमारी का किडनी से क्या लेना-देना. पर हकीकत यह है कि हमारे शरीर में दिल और किडनी बिल्कुल पक्के दोस्तों की तरह काम करते हैं. एक पर भी असर पड़ा, तो दूसरा खुद-ब-खुद लड़खड़ाने लगता है. अगर आप या आपके घर में कोई भी दिल की बीमारी, हाई बीपी या शुगर से जूझ रहा है, तो किडनी की नियमित जांच को नजरअंदाज करना बहुत भारी पड़ सकता है.
दिल और किडनी की आपस में सांठगांठ
हमारा दिल पूरे शरीर में खून पंप करता है, और इसी खून को साफ करने का जिम्मा गुर्दों का होता है. किडनी खून को फिल्टर करके जहरीले तत्वों को पेशाब के रास्ते बाहर निकालती है. साथ ही, शरीर में पानी, नमक और इलेक्ट्रोलाइट्स का सही संतुलन बनाए रखकर ब्लड प्रेशर को भी काबू में रखती है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का भी साफ मानना है कि दिल की बीमारी से गुर्दे खराब हो सकते हैं और खराब गुर्दे दिल को बीमार कर सकते हैं. ऊपर से अगर किसी को डायबिटीज या हाई बीपी की समस्या है, तो यह खतरा दोगुना बढ़ जाता है.
सबसे बड़ी परेशानी यह है कि क्रोनिक किडनी डिजीज (CKD) बहुत ही शांत तरीके से दबे पांव आती है. शुरुआत में न तो कोई खास दर्द होता है, न पेशाब में कोई साफ बदलाव दिखता है. मरीज को लगता है कि सब ठीक चल रहा है, जबकि अंदर ही अंदर गुर्दे कमजोर हो रहे होते हैं. इसलिए नियमित जांच ही इसका अकेला बचाव है.
दिल के मरीजों को क्यों कराने चाहिए ये 5 टेस्ट
किडनी की सेहत का हाल जानने के लिए किसी बहुत बड़े या महंगे तामझाम की जरूरत नहीं होती. कुछ आसान टेस्ट्स से ही सारी हकीकत सामने आ जाती है.
1. सीरम क्रिएटिनिन और eGFR टेस्ट
यह एक साधारण सा खून का टेस्ट होता है. हमारे शरीर की मांसपेशियां जब काम करती हैं, तो एक वेस्ट प्रोडक्ट बनता है जिसे क्रिएटिनिन कहते हैं. तंदुरुस्त गुर्दे इसे खून से छानकर बाहर निकाल देते हैं. अगर खून में इसका स्तर बढ़ रहा है, तो मतलब साफ है कि फिल्टर करने का काम धीमा पड़ गया है.
- क्रिएटिनिन की मदद से डॉक्टर eGFR (एस्टीमेटेड ग्लोमेर्युलर फिल्ट्रेशन रेट) निकालते हैं.
- यह बताता है कि आपकी किडनियां कितनी तेजी और सफाई से खून को फिल्टर कर पा रही हैं.
- अगर किसी का eGFR लगातार 3 महीने तक 60 से कम बना रहता है, तो यह क्रोनिक किडनी बीमारी का संकेत हो सकता है.
हालांकि, केवल एक बार रिपोर्ट खराब आने से घबराना नहीं चाहिए. डॉक्टर हमेशा कुछ समय बाद दोबारा टेस्ट करके ही किसी नतीजे पर पहुंचते हैं.
2. यूरिन एल्बुमिन-टू-क्रिएटिनिन रेशियो (uACR)
किडनी में आई शुरुआती खराबी को पकड़ने के लिए यह पेशाब की सबसे बेहतरीन जांच मानी जाती है. एल्बुमिन असल में हमारे खून में मौजूद एक जरूरी प्रोटीन है. जब तक गुर्दे सेहतमंद रहते हैं, वे इस प्रोटीन को शरीर के अंदर ही रोक कर रखते हैं. लेकिन जैसे ही गुर्दे की छन्नी में कोई खराबी आती है, यह प्रोटीन रिसकर पेशाब में आने लगता है.
- अगर uACR की वैल्यू 30 mg/g से ऊपर आती है, तो यह गुर्दे के नुकसान की शुरुआत मानी जाती है.
- कई बार ऐसा होता है कि खून की जांच (eGFR) बिल्कुल सामान्य दिखती है, लेकिन पेशाब में प्रोटीन निकल रहा होता है.
- इसलिए कभी भी सिर्फ ब्लड टेस्ट देखकर यह न समझें कि किडनी एकदम सुरक्षित है.
- गाइडलाइंस के मुताबिक, दोनों टेस्ट साथ में करवाना ही सबसे सही तस्वीर दिखाता है.
3. ब्लड प्रेशर की लगातार निगरानी
ब्लड प्रेशर केवल दिल का पैमाना नहीं है, यह गुर्दों की सेहत का भी सीधा आइना है. अगर आपका बीपी लंबे समय से बढ़ा हुआ है, तो यह गुर्दे की बारीक नसों को छलनी कर सकता है. दूसरी तरफ, अगर गुर्दे कमजोर पड़ रहे हों, तो शरीर में पानी और नमक जमा होने लगता है, जिससे बीपी को दवाइयों से भी कंट्रोल करना मुश्किल हो जाता है.
अगर आपका ब्लड प्रेशर बार-बार बढ़ रहा है या गोलियां बदलने के बाद भी काबू में नहीं आ रहा, तो तुरंत अपने डॉक्टर से किडनी की जांच के बारे में बात करनी चाहिए. अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन भी दिल और मेटाबॉलिज्म की सुरक्षा के लिए बीपी के साथ किडनी टेस्ट को अनिवार्य मानती है.
4. ब्लड शुगर और HbA1c टेस्ट
डायबिटीज दिल और गुर्दे दोनों की सबसे बड़ी दुश्मन है. खून में शुगर का बढ़ा हुआ स्तर धीरे-धीरे गुर्दों की नसों को सख्त और बेजान बना देता है. शुगर के मरीजों में सबसे पहले पेशाब में प्रोटीन रिसने की शिकायत ही शुरू होती है. इसी वजह से अमेरिकन डायबिटीज एसोसिएशन यह सलाह देता है कि टाइप 2 डायबिटीज वाले हर मरीज को साल में कम से कम एक बार eGFR और uACR टेस्ट जरूर करवा लेना चाहिए.
5. रूटीन यूरिन टेस्ट (Urinalysis)
यह एक बेसिक पेशाब जांच है जो हर लैब में आसानी से हो जाती है. हालांकि यह uACR की तरह बहुत सटीक पैमाना नहीं है, फिर भी इससे कई जरूरी सुराग मिल जाते हैं. जैसे कि पेशाब में खून के कण तो नहीं आ रहे, कोई इन्फेक्शन या पस सेल्स तो नहीं हैं. इस टेस्ट से डॉक्टर को यह तय करने में मदद मिलती है कि क्या मरीज को आगे किसी बड़े स्पेशलिस्ट के पास भेजने की जरूरत है या नहीं.
दिल के मरीजों के लिए यह सब जानना क्यों जरूरी है?
कई लोगों को लगता है कि किडनी की बीमारी पकड़ने का मतलब सिर्फ यह देखना है कि कहीं डायलिसिस की नौबत तो नहीं आने वाली. पर बात सिर्फ इतनी नहीं है. अगर किसी दिल के मरीज की किडनी में थोड़ी भी खराबी आती है या पेशाब में प्रोटीन बहने लगता है, तो उसे दिल का दौरा पड़ने, स्ट्रोक होने या हार्ट फेलियर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन की नई गाइडलाइंस भी यही साफ करती हैं कि अगर हम समय रहते eGFR और uACR के जरिए गुर्दे की बीमारी को पकड़ लेते हैं, तो ऐसी दवाएं शुरू की जा सकती हैं जो दिल और गुर्दे दोनों को एक साथ बचाती हैं.
मरीजों को क्या करना चाहिए:
- अपनी अगली विज़िट पर जब भी दिल के डॉक्टर के पास जाएं, तो उनसे सीधे पूछें कि क्या आपकी किडनी फंक्शन और पेशाब की जांच हाल ही में हुई है.
- अगर आपको पहले से दिल की बीमारी, हार्ट फेलियर, हाई बीपी या शुगर है, तो साल में कम से कम एक बार यह टेस्ट अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें.
- बिना डॉक्टर की सलाह के खुद से दर्द निवारक गोलियां (पेनकिलर्स) खाने से बचें, क्योंकि यह कमजोर गुर्दों पर और बुरा असर डालती हैं.
अगर समय रहते छोटी-छोटी लापरवाहियों को छोड़ दिया जाए और जरूरी टेस्ट करा लिए जाएं, तो न सिर्फ किडनी को बचाया जा सकता है, बल्कि दिल की उम्र भी लंबी की जा सकती है.
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