केरल में एक 9 साल की बच्ची के पेट और छोटी आंत से करीब 1 किलो बालों का गुच्छा निकालकर डॉक्टर्स ने उसकी जान बचाई. खबरों में बताया जा रहा है कि बच्ची काफी लंबे समय से पेट दर्द और उल्टी की समस्या से जूझ रही थी. जांच के दौरान पता चला कि बच्ची एक बेहद दुर्लभ बीमारी, रैपुंजेल सिंड्रोम से पीड़ित है. इस सिंड्रोम के दुनियाभर में कुछ ही मामले सामने आते हैं, ऐसे में ये मामला डॉक्टर्स के लिए हैरान करने वाला था. यहां जानते हैं इस खबर को विस्तार से-
पेट दर्द और उल्टी के बाद बच्ची पहुंचा हॉस्पिटल
रिपोर्ट के मुताबिक, बच्ची को लगातार पेट दर्द और उल्टी की शिकायत थी. परिवार उसे इलाज के लिए केरल के नेय्याट्टिनकारा स्थित NIMS मेडिसिटी हॉस्पिटल लेकर पहुंचा. डॉक्टर्स ने शुरुआती जांच में आंतों में रुकावट की आशंका जताई. इसके बाद अल्ट्रासाउंड, सीटी स्कैन और एंडोस्कोपी की गई.
एंडोस्कोपी में दिखा बच्ची के पेट के अंदर बालों का गुच्छा
इसके बाद जांच के दौरान डॉक्टर्स को बच्ची के पेट और छोटी आंत में बड़ी मात्रा में बाल जमा मिले. एंडोस्कोपी से पुष्टि हुई कि बालों का यह गुच्छा पेट से निकलकर छोटी आंत तक फैल चुका था. इसके बाद डॉक्टरों ने बच्ची को रैपुंजेल सिंड्रोम से पीड़ित बताया और तत्काल सर्जरी का फैसला लिया.
सर्जरी में निकला करीब 1 किलो बाल
इसके बाद डॉक्टर्स ने सर्जरी का फैसला लिया. बच्ची की सफल सर्जरी हुई. सर्जरी में बच्ची के पेट और छोटी आंत से लगभग 1 किलोग्राम बालों का गुच्छा निकाला. इस सर्जरी का लीड बाल रोग सर्जरी डिपार्टमेंट के सीनियर एक्सपर्ट डॉ. बिजू आई. जी. नायर ने किया. ऑपरेशन के बाद बच्ची की स्थिति तेजी से सुधरी और वह सामान्य रूप से खाना खाने लगी. बाद में उसे हॉस्पिटल से छुट्टी दे दी गई.
क्या है रैपुंजेल सिंड्रोम?
डॉक्टर्स के मुताबिक जब कोई व्यक्ति बार-बार अपने बाल तोड़कर निगलता है, तो बाल पेट में जमा होने लगते हैं. चूंकि, ह्यूमन शरीर बालों को पचा नहीं सकता, इसलिए समय के साथ वे एक कठोर गुच्छे का रूप ले लेते हैं. जब ये हेयरबॉल पेट से आगे बढ़कर छोटी आंत तक पहुंच जाता है, तब इस स्थिति को रैपुंजेल सिंड्रोम कहा जाता है.
क्यों खतरनाक है ये बीमारी?
हेयरबॉल के बढ़ने से आंतों में रुकावट, पेट दर्द, उल्टी, भूख कम लगना और कुपोषण जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं. समय पर इलाज न मिलने पर स्थिति जानलेवा भी बन सकती है. विशेषज्ञों के अनुसार यह बीमारी आमतौर पर किशोर उम्र की लड़कियों में ज्यादा देखी जाती है और दुनियाभर में इसके 100 से भी कम मामले रिपोर्ट हुए हैं.
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