- नेपाल में ग्लेशियर टूटने से आई भीषण बाढ़ में एक हजार से अधिक लोग मारे गए और साढ़े चार हजार अभी लापता हैं
- बाढ़ का मटमैला पानी गंडक और कोसी नदियों के रास्ते बिहार पहुंच रहा है, जिससे स्वास्थ्य संकट उत्पन्न हो रहा है
- बाढ़ में शवों से महामारी कम होती है, लेकिन दूषित पानी से डायरिया और संक्रमण का खतरा बढ़ता है
पिछले हफ्ते से जो तस्वीरें और वीडियो सामने आ रहे हैं, उन्हें देखकर किसी का भी कलेजा कांप जाए. नेपाल में ऊंचे पहाड़ों पर ग्लेशियर टूटने की वजह से 26 अगस्त को अचानक आई भीषण बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है. तेज बहाव के साथ कीचड़, मलबा, टूटे हुए मकान, मरे हुए मवेशी और कई जगहों पर इंसानी शव बहते हुए अब बिहार की नदियों तक पहुंच रहे हैं. नेपाल में आई इस प्रलयंकारी बाढ़ ने अब एक अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संकट का रूप ले लिया है. वहां एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और करीब साढ़े चार हजार लोग अब भी लापता हैं, जिनकी तलाश में रेस्क्यू टीमें दिन-रात जुटी हुई हैं.
लेकिन यह भयानक आपदा केवल नेपाल की सरहदों तक सीमित नहीं रही.
त्रिशूली नदी से निकला यह मटमैला सैलाब गंडक और कोसी के रास्ते बिहार की सीमा में तेजी से दाखिल हो रहा है. अपने साथ भारी मात्रा में गाद, कचरा, मरी हुई मछलियां, जानवरों के कंकाल और इंसानी शव लेकर आ रहा है. जमीन पर मौजूद रिपोर्टों से साफ पता चलता है कि नेपाल में कई बस्तियां पूरी तरह कीचड़ में दफन हो चुकी हैं. इस भयावह स्थिति को देखते हुए बिहार सरकार ने लोगों को चेतावनी जारी की है कि हालात सामान्य होने तक बाढ़ के पानी से न तो मछली पकड़ें, न खरीदें, न बेचें और न ही खाएं. यह एडवाइजरी इसलिए जारी की गई है क्योंकि सीवेज, सड़े-गले जानवरों और कचरे से नदी का पूरा पानी बुरी तरह दूषित हो चुका है.
क्या पानी में बहते शवों से महामारी फैल सकती है?
जब नदियों में बहते शवों की तस्वीरें सामने आईं तो लोगों के मन में यह सबसे बड़ा सवाल उठा कि क्या बिहार अब किसी बड़ी महामारी की कगार पर खड़ा है.
एनीरा कंसल्टिंग की सीईओ और यूएन सलाहकार डॉ. सबीन कपासी का कहना है कि सिर्फ इंसानी शवों की वजह से अपने आप कोई बड़ी महामारी नहीं फैलती. बाढ़ में सबसे बड़ा खतरा उस पूरे पानी के गंदे और जहरीले होने का होता है. वहीं फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट नई दिल्ली की संक्रामक रोग विशेषज्ञ डॉ. नेहा रस्तोगी का मानना है कि नेपाल से बिहार आ रहा यह गंदा पानी जनस्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय जरूर है, लेकिन इससे लोगों को घबराने या पैनिक करने की जरूरत नहीं है.
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO भी यही साफ करता है कि प्राकृतिक आपदाओं में जान गंवाने वाले लोगों के शवों से आमतौर पर महामारियां नहीं फैलतीं. खतरा केवल तभी होता है जब मरने वाले लोग पहले से ही किसी बेहद संक्रामक बीमारी के शिकार रहे हों. हालांकि शवों के सड़ने और उनसे निकलने वाले मलबे से पानी में बैक्टीरिया जरूर बढ़ सकते हैं, जिससे डायरिया और पेट के गंभीर संक्रमण का खतरा पैदा हो जाता है.

असली खतरा: दूषित पानी और बीमारियों का हमला
बाढ़ का पानी सिर्फ पानी नहीं होता. इसमें गटर का मैला, मलमूत्र, जानवरों के सड़े हुए अंग, घरों का कूड़ा, खेतों के कीटनाशक और अनगिनत खतरनाक जीवाणु मिले होते हैं. जब यह गंदा पानी गांवों के कुओं, चापाकलों, तालाबों और पीने के पानी के स्रोतों में घुसता है, तो बीमारियां फैलने लगती हैं.
इंटरनेशनल एसओएस के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. समीर द्विवेदी बताते हैं कि बाढ़ के पहले हफ्ते में पानी से पैदा होने वाली बीमारियों का सबसे बड़ा हमला होता है. सीवेज और बाढ़ के पानी के मिलने से हैजा, टायफाइड, डायरिया और हेपेटाइटिस ए जैसी बीमारियां बहुत तेजी से फैलती हैं. भारतीय राष्ट्रीय रोग नियंत्रण केंद्र (NCDC) ने भी बाढ़ के दौरान और उसके बाद साफ उबला पानी पीने की सख्त हिदायत दी है, ताकि डायरिया, हेपेटाइटिस और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी खतरनाक बीमारियों से बचा जा सके.
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पानी उतरने के बाद शुरू होता है असली इम्तिहान
अक्सर लोगों को लगता है कि नदियों का जलस्तर कम हो गया तो आफत टल गई, जबकि हकीकत इसके बिल्कुल उलट है. जलस्तर घटने के बाद दूसरा और ज्यादा खतरनाक दौर शुरू होता है.
जगह-जगह जमा ठहरा हुआ गंदा पानी मच्छरों की सबसे बड़ी नर्सरी बन जाता है. डॉ. द्विवेदी के अनुसार, बाढ़ के दूसरे हफ्ते से डेंगू, मलेरिया और चिकनगुनिया का प्रकोप तेजी से बढ़ता है. जब ऊपर से पानी उतर भी जाता है, तब भी चापाकलों और जमीन के अंदर के पानी में यह गंदगी लंबे समय तक जमी रहती है, जिससे इन्फेक्शन का खतरा बना रहता है. चूंकि गंडक और कोसी नदियां नेपाल से निकलकर सीधे उत्तरी बिहार के घनी आबादी वाले इलाकों से गुजरती हैं, इसलिए यहां जोखिम कहीं ज्यादा बढ़ जाता है.

बिहार के लिए दोहरी मार
बिहार के सीमावर्ती जिलों में पीने के पानी की सम्स्या पहले से ही गंभीर बनी हुई है. पश्चिमी चंपारण, पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, किशनगंज, पूर्णिया और अररिया जैसे जिलों के भूजल में आर्सेनिक की मात्रा पहले से ही तय सीमा से अधिक पाई जाती है. इसके अलावा इन इलाकों के पानी में आयरन का स्तर भी काफी ज्यादा है. अब इस बाढ़ और मलबे ने पीने के साफ पानी के संकट को और भी ज्यादा गहरा कर दिया है. ऐसे में अगर पानी की सही निगरानी और क्लोरीनेशन नहीं किया गया तो हालात बेकाबू हो सकते हैं.
स्वास्थ्य सेवाओं का ठप होना और मानसिक तनाव
बाढ़ सिर्फ शारीरिक बीमारियां ही नहीं लाती, बल्कि पूरी व्यवस्था को तोड़कर रख देती है. सड़कें टूट जाती हैं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र पानी में डूब जाते हैं और जरूरी दवाइयों की सप्लाई कट जाती है.
डॉ. कपासी बताती हैं कि ऐसी स्थिति में गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं और टीबी, डायबिटीज या दिल के पुराने मरीजों के लिए सबसे बड़ा संकट खड़ा हो जाता है. एक दिन की दवा छूटने या अस्पताल न पहुंच पाने से मरीज की जान जोखिम में पड़ जाती है.
इसके साथ ही जो सबसे अनदेखा पहलू है, वह है मानसिक आघात. अपना घर-बार, खेत और अपनों को खो चुके लोग गहरे सदमे, तनाव, घबराहट और अनिद्रा के शिकार हो जाते हैं. खासकर छोटे बच्चे इस बेघर होने के डर से मानसिक रूप से टूट जाते हैं. डॉ. द्विवेदी सही कहते हैं कि जब टीवी के कैमरे लौट जाते हैं, तब लोगों की असली मेडिकल और मानसिक जंग शुरू होती है.

इस वक्त क्या करें प्रभावित लोग
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक, बाढ़ प्रभावित इलाकों में रह रहे लोगों को कुछ बुनियादी बातों का कड़ाई से पालन करना होगा.
- केवल उबला हुआ, क्लोरीन की गोली से साफ किया हुआ या पूरी तरह सुरक्षित पानी ही पिएं.
- बाढ़ के गंदे पानी में उतरने या नहाने से हर हाल में बचें.
- जब तक सरकारी स्तर पर हरी झंडी न मिले, तब तक नदियों से पकड़ी गई मछलियां बिल्कुल न खाएं.
- खाना खाने से पहले हाथों को साबुन से अच्छी तरह धोएं और बासी भोजन न करें.
- अगर शरीर पर कोई कट या घाव लग जाए, तो उसे खुला न छोड़ें, तुरंत साफ करके पट्टी बांधें.
- तेज बुखार, लगातार दस्त, उल्टी, पीलिया या बदन दर्द होने पर खुद डॉक्टर बनने के बजाय तुरंत राहत शिविर में दिखाएं.
- रुके हुए पानी के पास नीम का धुआं करें, मच्छरदानी और मच्छर भगाने वाली क्रीम का इस्तेमाल जरूर करें.
नेपाल से बहकर आ रहे शव एक डरावना मंजर जरूर पेश कर रहे हैं, लेकिन मेडिकल नजरिए से असली दुश्मन वह दूषित माहौल, सड़ांध और गंदा पानी है जो हमारे दरवाजे पर दस्तक दे चुका है. बिहार के लिए आने वाले हफ्ते बेहद चुनौतीपूर्ण हैं. अगर हमने साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल और शुरुआती इलाज पर ध्यान नहीं दिया, तो बाढ़ का पानी भले उतर जाए, लेकिन बीमारियों का दलदल लंबे समय तक जिंदगियों को लीलता रहेगा.
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