- ग्लेशियर पिघलने, ग्लेशियल झील फटने, भूस्खलन और अचानक बाढ़ का असर भारत, चीन और नेपाल तीनों पर पड़ सकता है.
- रियल-टाइम नदी, मौसम, ग्लेशियर, सैटेलाइट डेटा साझा होने से आपदा की चेतावनी दी जा सकती है और जानें बच सकती हैं.
- भारत-चीन तनाव के बावजूद इन देशों को आपदा प्रबंधन को अलग ट्रैक पर रखकर स्थायी हिमालयी सहयोग तंत्र बनाना होगा.
नेपाल में हाल की विनाशकारी आपदा ने एक ऐसी सच्चाई फिर सामने ला दी है, जिसे भारत, चीन और नेपाल लंबे समय से जानते तो हैं, लेकिन उस पर मिलकर काम करने से बचते रहे हैं. वह सच्चाई है कि हिमालय की नदियां, ग्लेशियर, भूस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ किसी अंतरराष्ट्रीय सीमा को नहीं मानते. ऊपर पहाड़ों में जो होता है, उसका असर नीचे बसे शहरों, गांवों और करोड़ों लोगों तक पहुंच सकता है. इसलिए कई एक्सपर्ट हिमालय को सीमा विवाद, कूटनीति या सुरक्षा के नजरिए से देखने के जगह पर्यावरण के लिहाज से एक साझा आपदा क्षेत्र के रूप में देखने की जरूरत बढ़ रही है.
नेपाल की त्रासदी ने क्या समझाया?
नेपाल में अचानक आई बाढ़ और उससे हुई तबाही ने दिखाया कि पहाड़ी इलाकों में आपदा के लिए तैयारी का समय कई बार न के बराबर होता है. जिस तरह हिमालय में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, आने वाली ऐसी प्राकृतिक घटनाओं की संख्या बढ़ने की पूरी उम्मीद है क्योंकि कुछ आंकड़े बताते हैं कि ग्लेशियल झीलों की संख्या बीते वर्षों में बढ़ी हैं. ऐसे में भारी बारिश, भूस्खलन और बर्फ और चट्टानों के खिसकने से इन ग्लेशियल झीलों से अचानक पानी का सैलाब नीचे की ओर आ सकता है. और जब ये मलबा नीचे आएगा तो यह कौन सा रास्ता अख्तियार करेगा या किस देश के भीतर जान-माल का नुकसान करेगा,इसकी कोई सीमा नहीं होगी.
चीन, तिब्बत से नेपाल और नेपाल से शुरू हुई बाढ़ का असर भारत के सीमावर्ती इलाकों तक पहुंच सकता है. यही वजह है कि एक्सपर्ट हिमालय से जुड़े देशों के बीच समय पर सूचना साझा करने को अहमियत दे रहे हैं ताकि इसे आम लोगों की जिंदगियां बचाने का सबसे अहम साधन बनाया जा सके.

हिमालय तीन देशों को कैसे जोड़ता है?
हिमालय पवर्त श्रृंखला एशिया की कई बड़ी नदियों का उद्गम है. तिब्बती पठार से निकलने वाली नदियां भारत और नेपाल की तरफ आती हैं. इनमें ब्रह्मपुत्र, सिंधु और गंगा नदी सिस्टम से जुड़ी कई महत्वपूर्ण धाराएं शामिल हैं.
इसका सीधा मतलब है कि ऊपरी हिस्से में होने वाला बदलाव निचले हिस्से के लिए भी खतरा बन सकता है.
उदाहरण के लिए अगर किसी ऊंचाई वाले इलाके में ग्लेशियर टूटता है या ग्लेशियल झील का पानी अचानक बाहर निकलता है, जैसा कि नेपाल में हुए हालिया जल प्रलय में देखा गया, तो कुछ ही समय में नीचे की नदी का जलस्तर खतरनाक तरीके से बढ़ सकता है. मतलब साफ है कि होने वाला नुकसान केवल एक देश तक सीमित नहीं रह सकता.

सबसे बड़ी दिक्कत क्या है?
इस पूरे संकट में सबसे अधिक अहमियत रखता है इन सभी भौगोलिक स्थितियों से जुड़े आंकड़े यानी डेटा.
किस नदी में कितना पानी है? किस ग्लेशियर में तेजी से बदलाव हो रहा है? कहां भूस्खलन का खतरा बढ़ गया है? किस ग्लेशियल झील के टूटने का जोखिम है? किस इलाके में अचानक बाढ़ आ सकती है?
इस तरह के कई सवालों के जवाब अगर समय रहते मिल जाएं तो हजारों लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सकता है.
लेकिन समस्या यह है कि भारत, चीन और नेपाल के बीच नदी, मौसम, ग्लेशियर और आपदा से जुड़ा डेटा साझा करने की व्यवस्था अभी न तो उतनी विस्तृत ही है और न ही रियल-टाइम.
कई बार नीचे के इलाकों को तब जानकारी मिलती है, जब पानी का तेज बहाव आगे बढ़ चुका होता है.
आपदा के मामले में कुछ घंटे की देरी और कुछ मिनट की चेतावनी के बीच हजारों जिंदगियों का फर्क हो सकता है.

क्या ब्रह्मपुत्र का पानी रोकने की तैयारी कर रहा है चीन?
हिमालय के कई महत्वपूर्ण नदी तंत्रों का ऊपरी हिस्सा तिब्बती पठार में है. इसलिए चीन के पास ऐसी महत्वपूर्ण जानकारियां होती हैं, जो भारत और नेपाल दोनों के लिए ही बेहद उपयोगी हो सकती हैं.
चीन अपनी त्सांगपो नदी पर दुनिया की सबसे बड़ी पनबिजली परियोजना बना रहा है. हालांकि एक्सपर्ट्स इस परियोजना पर सवाल उठाते रहे हैं. त्सांगपो नदी ही भारत में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र के नाम से जानी जाती है.
एक्सपर्ट्स यह चिंता जताते रहे हैं कि त्सांगपो पर चीन जो बांध बना रहा है उससे वह इसके पानी का रुख मोड़ने की ताकत रखेगा. हालांकि चीन खुद इस बात को खारिज करता रहा है.
सबसे बड़ी चिंता ये है कि चीन अपने त्सांगपो मेगा-डैम परियोजना के बारे में भारत के साथ डेटा और डिजाइन संबंधी जानकारी साझा नहीं करता है.

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माना जाता है कि 2017 में सीमा पर गतिरोध के बाद चीन ने सीमा-पार बहने वाली नदियों के प्रवाह से जुड़े डेटा साझा करना बंद कर दिया था.
चीन के डेटा नहीं शेयर किए जाने की आलोचना होती रही है, पर वह इसका बचाव करता रहा है.
नदियों का जलस्तर, बारिश, बर्फबारी, ग्लेशियर की स्थिति और संभावित बाढ़ की जानकारी अगर रियल-टाइम में साझा हो, तो नीचे के देशों में चेतावनी प्रणाली को काफी मजबूत किया जा सकता है.
लेकिन भारत-चीन संबंध सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं हैं. दोनों देशों के बीच सीमाई तनाव जैसे बड़े मुद्दे भी हैं.
यही जियोपॉलिटिकल कारण हिमालय को लेकर सहयोग के रास्ते में रोड़ा अटकाए है.
भारत और नेपाल के सामने भी बड़ी चुनौती
भारत और नेपाल के बीच नदियों और बाढ़ को लेकर सहयोग की व्यवस्था पहले से मौजूद है, लेकिन अचानक आने वाली आपदाओं की संख्या और उनकी प्रकृति दोनों ही बहुत तेजी से बदल रही है.
आज ऐसे सिस्टम को विकसित करने की जरूरत है जिसमें मौसम, ग्लेशियर, भूकंपीय गतिविधि, नदी का बहाव और सैटेलाइट डेटा को एक साथ देखा जाना चाहिए.
मान लीजिए किसी ऊंचे इलाके में ग्लेशियर तेजी से अस्थिर हो रहा है. उसी समय भारी बारिश भी होने वाली है. अगर दोनों घटनाओं का डेटा एक साथ मिल जाए तो विशेषज्ञ पहले ही अनुमान लगा सकते हैं कि नीचे के इलाकों में खतरा कितना बढ़ सकता है.
यही अर्ली वॉर्निंग सिस्टम की असली ताकत है.

तिब्बत के ल्होका में जंगमू हाइड्रोपावर स्टेशन
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सिर्फ डेटा शेयरिंग से काम नहीं चलेगा
भारत, चीन और नेपाल को सभी प्राकृतिक स्थितियों की रियल टाइम डेटा शेयर करनी चाहिए. ऊंचाई पर मौसम केंद्र स्थापित किए जाने चाहिए जो ऑटोमेटेड हो. नदी के जलस्तर को मापने का काम भी ऑटोमेटेड हो. इसके अलावा भूकंप के सेंसर और सैटेलाइट डेटा शेयर करने की फ्रीक्वेंसी बढ़ाई जानी चाहिए. इसमें सबसे अधिक अहम ये होगा कि प्रावधान किसी भी खतरे की सूचना के तुरंत ही संबंधित एजेंसियों तक पहुंचने का होना चाहिए.
अब जैसा कि कुछ रिसर्च एजेंसियों ने ग्लेशियल झीलों के बढ़ने का अनुमान लगाया है, तो यह किसी एक देश के लिए खबर तो नहीं है क्योंकि बगैर किसी अध्य्यन के ये बिल्कुल भी पता नहीं चलेगा कि कौन सी ग्लेशियल झील कितनी खतरनाक है. तो इसके लिए साझा वैज्ञानिक रिसर्च किए जाने की जरूरत है. इससे न केवल तेजी से अस्थिर हो रहीं ग्लेशियल झीलें बल्कि भूस्खलन के खतरों का अंदाज भी मिल सकेगा.
इसी प्रकार सैन्य अभ्यास के तर्ज पर नियमित और संयुक्त आपदा अभ्यास करने की जरूरत भी है. इस अभ्यास का मॉडल हर नए आने वाली आपदा के साथ अपडेट भी किए जाने की जरूरत है.
इसमें किस एजेंसी को सूचना मिलेगी, कौन चेतावनी जारी करेगा, किस इलाके को खाली कराया जाएगा, बचाव और राहत दल किस रास्ते पहुंचेगा, ऐसे सवालों के जवाब पहले से तय होंगे तो आपदा की स्थिति में उसके प्रभाव को न्यून किया जा सकेगा.
कई एजेंसियों को साथ काम करना होगा
जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक आपदाओं के खतरे को और बढ़ा दिया है. ऐसे में भूस्खलन, बाढ़ और हिमस्खलन जैसी आपदाएं पहले के मुकाबले बढ़ गई हैं.
तापमान बढ़ने से ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है. वहीं पिछले कुछ सालों में बारिश के पैटर्न में भी अनिश्चित बदलाव देखने को मिल रहा है.
इसका मतलब ये भी है कि पुराने अनुभवों के आधार पर भविष्य की आपदा का अनुमान लगाना मुश्किल होता जा रहा है.
यही वजह है कि हिमालय में बदलती परिस्थितियों की निगरानी अब केवल मौसम विभाग नहीं कर सकता.
इसमें ग्लेशियर एक्सपर्ट, जल वैज्ञानिक, भूवैज्ञानिक, मौसम वैज्ञानिक, सैटेलाइट एक्सपर्ट्स और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को एक साथ काम करना होगा.
इस पूरे मामले की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि नेपाल का ग्लोबल वार्मिंग में योगदान बहुत कम है, लेकिन जलवायु परिवर्तन के सबसे गंभीर और तत्काल असर झेलने वाले देशों में वह शामिल है.

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चीन, भारत और नेपाल का हिमालय से जुड़ाव कैसे?
जहां नेपाल के लिए हिमालय उसकी अर्थव्यवस्था, पानी, खेती, बिजली और करोड़ों लोगों की आजीविका से जुड़ा है, वहीं भारत के लिए हिमालय एक तरफ विभिन्न नदियों और जल संसाधन का प्रमुख स्रोत है तो दूसरी ओर यह मामसूनी हवाओं को आगे जाने से रोकता है और देश में बारिश के एक प्रमुख कारकों में से एक है.
उधर, चीन के लिए तिब्बती पठार एशिया के बड़े नदी तंत्रों का महत्वपूर्ण स्रोत है. तो ये तीनों देश इसलिए तीनों देशों का हित एक जगह मिल जाता है.
हिमालय सुरक्षित रहेगा तो तीनों देशों के लिए पानी और पर्यावरणीय सुरक्षा मजबूत रहेगी. हिमालय अस्थिर होगा तो असर इन तीनों ही देशों पर देखने को मिलेगा.
क्या भारत-चीन तनाव के बीच ऐसा सहयोग संभव है?
तो इसका जवाब यही होना चाहिए कि बेशक सीमा और विभिन्न रणनीतिक मुद्दों पर मतभेद को आपदा प्रबंधन जैसी मानवीय जरूरत से अलग रखना चाहिए. भारत, चीन और नेपाल का आपसी सहयोग तंत्र विकसित किया जाना चाहिए ताकि आपदा से जुड़े सभी डेटा शेयर किए जा सकें.
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