तिब्बत (चीन)-नेपाल सीमा के पास आए भीषण ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) ने पूरे हिमालयी क्षेत्र में क्लाइमेट चेंज से बढ़ते खतरों को लेकर नई चिंता पैदा कर दी है. यह आपदा भारत के लिए भी गंभीर चेतावनी है, क्योंकि देश के 11 राज्य और 2 केंद्र शासित प्रदेश हिमालयी क्षेत्र में आते हैं, जहां बढ़ते तापमान के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं और आपदाओं का खतरा बढ़ता जा रहा है.
सूत्रों के अनुसार, हिमालयी क्षेत्रों में करीब 600 संवेदनशील ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है. इन झीलों की निगरानी बढ़ाई जा रही है ताकि किसी संभावित खतरे की समय रहते जानकारी मिल सके.
हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में बढ़ रहा खतरा
एक्सपर्ट्स का कहना है कि पूरा हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र तेजी से बदलते जलवायु पैटर्न का सामना कर रहा है. ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार बढ़ रही है और नई ग्लेशियल झीलें बन रही हैं. यही वजह है कि संयुक्त राष्ट्र से लेकर भारत सरकार और राज्य सरकारें इस चुनौती से निपटने के लिए नई रणनीतियों पर काम कर रही हैं.
संयुक्त राष्ट्र की स्टडी में 407 खतरनाक ग्लेशियल झीलें
UN की संस्था संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (United Nations University) के नेतृत्व में हुई एक अंतरराष्ट्रीय स्टडी में हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 407 ऐसी ग्लेशियल झीलों की पहचान की गई है, जिनके फटने का खतरा है.

ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ. दीपेश चपागाइन
NDTV को दिए एक एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में जर्मनी के 'बॉन' (Bonn) शहर में स्थित संयुक्त राष्ट्र विश्वविद्यालय (United Nations University) के ग्लेशियर वैज्ञानिक डॉ. दीपेश चपागाइन के नेतृत्व में हुई इस रिसर्च में 2024 तक दर्ज 493 GLOF घटनाओं का विश्लेषण किया गया. शोध में पाया गया कि 1950 से पहले हर दशक में औसतन 7 GLOF घटनाएं होती थीं, जबकि 1950 के बाद यह संख्या बढ़कर प्रति दशक 34 हो गई है. यानी ऐसी घटनाओं में करीब पांच गुना वृद्धि दर्ज की गई है.
डॉ. चपागाइन के अनुसार हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में 64 हजार से अधिक ग्लेशियर और 23 हजार से ज्यादा ग्लेशियल झीलें हैं. उनके मुताबिक जलवायु परिवर्तन के कारण नई झीलें लगातार बन रही हैं, जिससे खतरे का दायरा बढ़ता जा रहा है.
उन्होंने यह भी कहा कि हाल में नेपाल-चीन सीमा पर हुई आपदा किसी पहले से चिन्हित खतरनाक झील से नहीं बल्कि नई बनी झीलों से जुड़ी थी. इससे स्पष्ट है कि खतरे का वास्तविक स्तर अभी भी पूरी तरह समझा नहीं जा सका है.
भारत सरकार की रणनीति
इस बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए भारत सरकार ने एक पांच सूत्रीय रणनीति पर काम शुरू किया है.
मिशन मौसम के तहत बढ़ी निगरानी
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय ने 'मिशन मौसम' के तहत हिमालयी क्षेत्र में ग्लेशियरों की निगरानी बढ़ाने, नए डॉप्लर मौसम रडार लगाने और अर्ली वार्निंग सिस्टम को मजबूत करने की पहल शुरू की है.
वित्त वर्ष 2026-27 के लिए मिशन मौसम का बजट 1,342.29 करोड़ रुपये रखा गया है. इसके तहत उन्नत मौसम निगरानी तकनीक, अगली पीढ़ी के मौसम रडार, पवन प्रोफाइलर और अत्याधुनिक उपग्रहों की तैनाती की जा रही है.
IMD ने जताई चिंता
भारत मौसम विभाग (IMD) के महानिदेशक डॉ. एम. मोहपात्रा के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में तापमान वृद्धि वैश्विक औसत से अधिक तेजी से हो रही है. उन्होंने कहा कि ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से ग्लेशियल झीलों में पानी का स्तर बढ़ रहा है. वहीं एल-नीनो जैसे मौसमीय कारक और जलवायु परिवर्तन मिलकर इस खतरे को और बढ़ा रहे हैं. उनकी वजह से क्लाउडबर्स्ट, अत्यधिक वर्षा और GLOF जैसी घटनाओं की आशंका बढ़ जाती है.
IMD ने हिमालयी क्षेत्रों में मौसम, जल विज्ञान, क्रायोस्फेयर और भूभौतिकीय निगरानी को मजबूत करने का फैसला किया है. इसके तहत स्वचालित मौसम स्टेशन और स्वचालित हिमपात मौसम स्टेशन भी बढ़ाए जा रहे हैं.

NDMA के सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल
NDMA ने दी नई लैंड यूज प्लानिंग की सलाह
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सदस्य डॉ. दिनेश कुमार असवाल ने NDTV को बताया कि नेपाल में हुई तबाही से भारत को सीख लेनी चाहिए. उन्होंने कहा कि भारत के हिमालयी क्षेत्रों में मौजूद बड़े ग्लेशियर यदि टूटते हैं या ग्लेशियल झीलें फटती हैं, तो नुकसान नेपाल जैसा या उससे भी अधिक हो सकता है.
NDMA ने हिमालयी क्षेत्रों के लिए नई लैंड यूज प्लानिंग की सिफारिश की है. सुझाव दिया गया है कि पिछले हजार वर्षों के उच्चतम बाढ़ स्तर का अध्ययन कर उसी के आधार पर निर्माण गतिविधियां तय की जाएं. NDMA का मानना है कि अधिक अर्ली वार्निंग सिस्टम, बेहतर संचार व्यवस्था और ग्लेशियरों की लगातार निगरानी से बड़े नुकसान को कम किया जा सकता है.
उत्तराखंड में 219 'हैंगिंग ग्लेशियर'
वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियोलॉजी (WIHG) के साथ मिलकर उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) पिथौरागढ़, चमोली, टिहरी, उत्तरकाशी और बागेश्वर ज़िलों की 13 ग्लेशियल झीलों से जुड़े खतरों का आकलन कर रहा है. WIHG खास तौर पर चमोली जिले के धौलीगंगा बेसिन में मौजूद वसुंधरा ताल पर नजर रख रहा है.
हाल ही में प्रकाशित एक शोध के अनुसार उत्तराखंड के अलकनंदा बेसिन में 219 हैंगिंग ग्लेशियर (लटकते हुए ग्लेशियर) बन चुके हैं. वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के कारण इन ग्लेशियरों में अस्थिरता बढ़ रही है और इनके टूटने का खतरा बना हुआ है.
IIT भुवनेश्वर के वैज्ञानिक आशिम सत्तार के अनुसार यह उत्तराखंड में हैंगिंग ग्लेशियरों की पहली विस्तृत सूची में से एक है और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों का स्पष्ट संकेत देती है.
सिक्किम में 7 ग्लेशियल झीलें बेहद संवेदनशील
सिक्किम आपदा प्रबंधन प्राधिकरण ने राज्य की 85 ग्लेशियल झीलों का मानचित्रण किया है. इनमें से 17 झीलों को अत्यंत संवेदनशील माना गया है, जबकि 7 झीलें ऐसी हैं जो बड़े भूकंप या क्लाउडबर्स्ट की स्थिति में टूट सकती हैं. इससे बड़ी GLOF आपदा का खतरा पैदा हो सकता है.
भारत में पहले भी हो चुकी हैं बड़ी GLOF आपदाएं
जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (GSI) के अनुसार भारत में कुल 9,575 ग्लेशियर हैं. पिछले 13 वर्षों में भारत तीन बड़ी GLOF आपदाओं का सामना कर चुका है.
2013 की केदारनाथ आपदा
2021 की चमोली आपदा
2023 में सिक्किम की साउथ ल्होनक झील फटने से आई बाढ़
जाहिर है, क्लाइमेट चेंज का खतरा बड़ा होता जा रहा है और इससे निपटने के लिए भारत सरकार को सभी संवेदनशील राज्यों के साथ मिलकर गंभीरता से पहल करनी होगी.
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