- नेपाल में 26 अगस्त को आए भयंकर बाढ़ के कारण हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में दो मजदूर नौ दिन तक फंसे रहे
- कबी़र महर्जन और संजय साह ने सुरंग के एक सुरक्षित हिस्से में शरण लेकर कीचड़ वाला पानी पीकर अपनी जान बचाई
- भारी बारिश और मलबे के कारण रेस्क्यू ऑपरेशन में कई बार रुकावटें आईं और सुरंग तक पहुंचना बेहद कठिन साबित हुआ
नेपाल अभी भी भयानक बाढ़ के खौफ से जूझ रहा है. कई जगहों पर रेस्क्यू ऑपरेशन जारी है, इस उम्मीद में कि फिर से कोई 13 दिन बाद मौत को मात देकर जिंदा निकल आएगा. इससे पहले नौ दिन तक सुरंग में फंसे दो मजदूरों का जिंदा बचना किसी चमत्कार से कम नहीं माना गया. 26 अगस्त को बाढ़ आने के बाद कबी़र महर्जन और मैकेनिकल फोरमैन संजय साह त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंग में नौ दिन तक अंधेरे में, चारों तरफ कीचड़ और मलबे के बीच फंसे रहे. दोनों ने एक ऐसी जगह शरण ली थी, जहां थोड़ी हवा बची हुई थी. यही हवा उनकी जिंदगी बचाने की सबसे बड़ी वजह बनी. वे कीचड़ पीते रहे और अपनी नब्ज को चलाने के लिए नम करते रहें.
जलप्रलय ने फंसाया, आस्था सहारा बनी
रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार 26 अगस्त की सुबह करीब 7:30 बजे कबी़र ने अपनी पत्नी हीरा शोभा को फोन किया था. उन्होंने कहा था कि उन्हें सुरंग के अंदर जाना है और वहां नेटवर्क नहीं मिलेगा. करीब एक घंटे बाद पहाड़ पर ग्लेशियर टूट गया और इसके बाद भारी मात्रा में पानी, मिट्टी नीचे की ओर आई. इस तेज बहाव ने गांवों और कई हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट को अपनी चपेट में ले लिया.
अपर हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट में करीब 40 मजदूरों के होने की जानकारी थी. जब खतरा समझ में आया तो कर्मचारियों को बाहर निकलने का आदेश दिया गया. संजय साह पावर हाउस के कंट्रोल रूम में थे. उन्होंने अलग-अलग मंजिलों पर जाकर साथियों को बाहर निकलने के लिए कहा. लेकिन बाढ़ इतनी तेज थी कि कई मजदूर भाग नहीं सके. रिपोर्ट के अनुसार करीब 30 मजदूरों के एक समूह के बह जाने की तस्वीरें बाद में सामने आईं.
रेस्क्यू ऑपरेशन
बाहर उनकी तलाश लगातार चल रही थी. रेस्क्यू ऑपरेशन चला रही टीम को उम्मीद थी कि मलबे के अंदर कहीं हवा के छोटे हिस्से (पैकेट) हो सकते हैं, जहां लोग जिंदा बचे हों. लेकिन सुरंग तक पहुंचना बेहद मुश्किल था. जगह पर 15 से 30 मीटर तक मिट्टी, चट्टान, लकड़ी और मलबा जमा था. बारिश कई बार बचाव का काम शुरू होने के बाद फिर पानी और मलबा भर देती थी. रिपोर्ट के अनुसार टीम ने ऊपर से पांच इंच चौड़ी ड्रिलिंग की. इससे उन्हें सुरंग की सही दिशा का पता चला और वे धीरे-धीरे अंदर की तरफ बढ़ने लगे.
नौवें दिन की रात बचाव दल के सामने मलबे की एक बड़ी दीवार आ गई. टीम ने पानी की तेज धार का इस्तेमाल कर रास्ता साफ करने की कोशिश की. बारिश के कारण सुरंग का एक हिस्सा फिर धंस गया और कुछ बचावकर्मी भी कुछ समय के लिए फंस गए. फिर 10वें दिन सुबह करीब 4 बजे बचाव दल को सुरंग के अंदर से कुछ आवाज सुनाई दी. मशीनें बंद करके सभी ध्यान से सुनने लगे. रेस्क्यू टीम ने आवाज लगाई कि क्या कोई अंदर है? कुछ देर बाद उन्हें फिर आवाज सुनाई दी. टीम को लगा कि कोई जिंदा है.
कुछ और मलबा हटाने के बाद एक हाथ दिखाई दिया. सुबह करीब 7 बजे सैनिकों ने एक छोटा रास्ता बनाया. अंदर से आवाज आई कि “हम यहां हैं.” आखिरकार संजय को बाहर निकाला गया. वह खुद खड़े नहीं हो पा रहे थे और उन्हें बचावकर्मी की पीठ पर बाहर लाया गया. कबी़र को स्ट्रेचर पर निकाला गया. उनके पैर में गंभीर चोट थी. अस्पताल में कबी़र ने अपनी पत्नी को भी पहचान नहीं पाया. लेकिन हीरा शोभा के लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि उनका पति जिंदा वापस आ गया था.
(इनपुट- रॉयटर्स की रिपोर्ट)
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं