सुबह उठने के बाद हाथों की उंगलियां मोड़ने में परेशानी होना, मुट्ठी बंद न कर पाना या बिस्तर से उतरते समय घुटनों में अकड़न महसूस होना आम बात लग सकती है. नारायणा हॉस्पिटल के डायरेक्टर - रूमेटोलॉजी, डॉ. राहुल जैन का कहना है कि कई लोग इस तरह के लक्षण को उम्र बढ़ने, थकान या गलत तरीके से सोने का असर मान लेते हैं. हालांकि, अगर ये समस्या रोजाना होने लगे और लंबे समय तक बनी रहे, तो ये र्थराइटिस यानी गठिया का शुरुआती संकेत भी हो सकता है. डॉ.जैन से यहां इस विषय को अच्छे से समझते हैं-
30 मिनट से ज्यादा अकड़न रहना अर्थराइटिस का हो सकता है संकेत
अर्थराइटिस कोई एक बीमारी नहीं है, बल्कि जोड़ों को प्रभावित करने वाली कई बीमारियों का ग्रुप है. इसके दो प्रमुख प्रकार हैं, ऑस्टियोआर्थराइटिस और रूमेटॉइड आर्थराइटिस. ऑस्टियोआर्थराइटिस में जोड़ों के कार्टिलेज और आसपास के टिश्यूज में धीरे-धीरे बदलाव आते हैं. इस स्थिति में सुबह उठने या लंबे समय तक बैठे रहने के बाद अकड़न महसूस हो सकती है, जो आमतौर पर 30 मिनट से कम समय में ठीक हो जाती है.
वहीं, रूमेटॉइड आर्थराइटिस एक ऑटोइम्यून बीमारी है. इसमें शरीर का इम्यून सिस्टम गलती से अपने ही जोड़ों के स्वस्थ ऊतकों पर हमला करने लगता है. ऐसे मामलों में सुबह की अकड़न 30 मिनट से अधिक समय तक रह सकती है और कई बार एक घंटे या उससे भी ज्यादा समय तक बनी रहती है. हालांकि, सिर्फ अकड़न की ड्यूरेशन के आधार पर बीमारी की पुष्टि नहीं की जा सकती.
किसी भी उम्र के लोगों को हो सकता है अर्थराइटिस
डॉक्टर जैन बताते हैं कि अक्सर माना जाता है कि अर्थराइटिस सिर्फ बुजुर्गों को होता है, लेकिन ये धारणा पूरी तरह सही नहीं है. रूमेटॉइड आर्थराइटिस यंग और मध्यम आयु वर्ग के लोगों को भी प्रभावित कर सकता है. इसके शुरुआती लक्षणों में हाथ और पैरों के छोटे जोड़ों में दर्द, दोनों तरफ के जोड़ों में सूजन, लगातार थकान और सुबह रोजमर्रा के काम करने में परेशानी शामिल हो सकते हैं.
क्या समय रहते ज्वाइंट्स को नुकसान होने से बचा सकते हैं?
डॉ. राहुल जैन का कहना है कि रूमेटॉइड अर्थराइटिस की समय पर पहचान और सही इलाज से जोड़ों को होने वाले स्थाई नुकसान के खतरे को काफी हद तक कम किया जा सकता है. बीमारी की पहचान के लिए डॉक्टर मरीज के लक्षणों, शारीरिक जांच, ब्लड टेस्ट और जरूरत पड़ने पर इमेजिंग जांच की मदद लेते हैं. इलाज बीमारी के प्रकार और उसकी गंभीरता के आधार पर तय किया जाता है.
इसमें दवाओं के साथ फिजियोथेरेपी, नियमित फिजिकल एक्टिविटी और वजन को कंट्रोल रखना भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. बिना डॉक्टर की सलाह के लंबे समय तक दर्दनिवारक दवाओं का सेवन नहीं करना चाहिए.
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