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Maharishi Valmiki Jayanti: रामायण में वर्णित 4 जड़ी-बूटियां, जानें संजीवनी बूटी और उनके इस्‍तेमाल का तरीका

रामायण में वर्णित संजीवनी बूटी ही नहीं, मृतसंजीवनी, विशल्यकरणी और संधानी जैसी कई जड़ी-बूटियों का उल्लेख मिलता है. विशेषज्ञ बताते हैं कि इन वनस्पतियों से जुड़ी पारंपरिक मान्यताएं आज भी लोगों की दिलचस्पी का विषय हैं.

Maharishi Valmiki Jayanti: रामायण में वर्णित 4 जड़ी-बूटियां, जानें संजीवनी बूटी और उनके इस्‍तेमाल का तरीका
लक्ष्मण को बचाने वाली संजीवनी बूटी क्या थी? रामायण की 4 प्रमुख औषधियों पर एक्सपर्ट की राय

Maharishi Valmiki Jayanti के अवसर पर जब रामायण की चर्चा होती है तो श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के प्रसंग सबसे ज्यादा याद किए जाते हैं. लेकिन महर्षि वाल्मीकि ने अपने महाकाव्य में कई ऐसी जड़ी-बूटियों और औषधीय पौधों का भी उल्लेख किया है, जो प्राचीन भारतीय चिकित्सा ज्ञान की झलक देते हैं. इनमें संजीवनी बूटी, संधानी, विशल्यकरणी और सुवर्णकरणी का नाम सबसे प्रमुख माना जाता है.

रामायण की कथा सुनते वक्त हम अक्सर श्रीराम के आदर्शों, मर्यादा और सीता हरण के प्रसंगों में ही खोकर रह जाते हैं. पर बहुत कम लोगों का ध्यान इस बात पर जाता है कि महर्षि वाल्मीकि ने इस महाकाव्य में हमारे जंगलों, पर्वतों और वनस्पतियों का कितना गहरा ब्योरा लिख छोड़ा है. रामायण में कई जगह ऐसी वनस्पतियों और औषधियों का उल्लेख मिलता है, जो उस समय के चिकित्सा ज्ञान की झलक देते हैं. रामायण में वर्णित जड़ी-बूटियां आज भी लोगों के लिए जिज्ञासा का विषय हैं. संजीवनी बूटी, संधानी, विशल्यकरणी और सुवर्णकरणी जैसी औषधियों का उल्लेख वाल्मीकि रामायण में मिलता है. माना जाता है कि इन्हीं जड़ी-बूटियों की मदद से लक्ष्मण का उपचार किया गया था.

जब मेघनाद के शक्ति बाण से लक्ष्मण अचेत हो गए थे, तब सुषेण वैद्य ने हिमालय के द्रोणगिरि पर्वत से जिन चार दुर्लभ वनस्पतियों की पहचान बताई थी. इसी विषय पर हमने दिल्ली सरकार के योग विभाग के रिटायर्ड प्रोजेक्ट ऑफिसर डॉ. राम अवतार से लंबी चर्चा की. डॉ. राम अवतार पिछले 38 सालों से योग, ध्यान, नाड़ी विज्ञान और प्राकृतिक चिकित्सा के जरिए कई पेचीदा और असाध्य रोगों का इलाज करते आ रहे हैं.

रामायण में वर्णित 4 प्रमुख जड़ी-बूटियां

जड़ी-बूटीमाना जाने वाला उपयोग
मृतसंजीवनीचेतना वापस लाने से जुड़ी मान्यता
संधानीहड्डियों और ऊतकों से जुड़ी पारंपरिक मान्यता
विशल्यकरणीघावों के उपचार से जुड़ी मान्यता
सुवर्णकरणीत्वचा की मरम्मत से जुड़ी मान्यता

रामायण में कौन-कौन सी जड़ी-बूटियां थीं?

डॉ. राम अवतार का मानना है कि सुषेण वैद्य द्वारा बताई गई जड़ी-बूटियों के पीछे व्यावहारिक चिकित्सा समझ दिखाई देती है

संजीवनी बूटी क्या है 

मृतसंजीवनी क्या है : मृतसंजीवनी वह बूटी है जो बेहोश पड़े इंसान के दिमाग और प्राणवायु को फिर से चालू कर देती है. आज के वनस्पति वैज्ञानिक इसे सेलाजिनेला ब्रायोप्टेरिस के नाम से पहचानते हैं. डॉ. राम अवतार बताते हैं कि यह जड़ी-बूटी हमारे नर्वस सिस्टम को एक्टिव करती है.  इसे कमजोरी और बेहोशी जैसी स्थितियों से जोड़ा जाता रहा है.

संधानी बूटी क्या है

संधानी से हड्डियों का जुड़ना: इसका काम ही है अंदरूनी टूटन को जोड़ना. आजकल इसे हम हड़जोड़ या अस्थिसंहार के नाम से जानते हैं.  आयुर्वेदिक परंपरा में इसका उपयोग हड्डियों और ऊतकों के स्वास्थ्य से जोड़कर देखा जाता है.

विशल्यकरणी के क्‍या फायदे हैं 

विशल्यकरणी का असर: युद्ध में जब शरीर के भीतर तीर या भालों की नोक चुभ जाती थी, तो उसे बिना चीर-फाड़ के बाहर निकालने और घाव का जहर सुखाने के लिए इसका लेप लगता था. यह पुराने घावों, नसों के दर्द और सूजन को शांत करने में आज भी बेजोड़ मानी जाती है.

सुवर्णकरणी से होने वाले स्‍वास्‍थ्‍य लाभ 

सुवर्णकरणी की चमक: गहरे घाव सूखने के बाद त्वचा पर जो बदरंग निशान या काले धब्बे पड़ जाते हैं, उन्हें मिटाने के लिए इसका इस्तेमाल होता था. यह बूटी त्वचा की स्वाभाविक रंगत को वापस लौटाने में मदद करती है.

दैनिक जीवन में काम आने वाले पौधे

बातचीत के दौरान डॉ. राम अवतार ने समझाया कि रामायण सिर्फ हिमालय की दुर्लभ बूटियों तक सीमित नहीं है. इसमें हमारे रोजमर्रा के पेड़ों का भी बड़ा मान है.

अशोक और हरसिंगार: रावण की जिस अशोक वाटिका में सीता जी बैठी थीं, वहां का अशोक का पेड़ केवल छाया देने के लिए नहीं था. अशोक की छाल महिलाओं से जुड़ी अंदरूनी तकलीफों और तनाव को शांत करने के लिए जानी जाती है. वहीं पारिजात यानी हरसिंगार के पत्तों का काढ़ा घुटनों के पुराने दर्द, यूरिक एसिड और साइटिका और जोड़ों की समस्याओं में उपयोग किया जाता रहा है. 

तुलसी और नीम के जंगल: दंडकारण्य के आश्रमों के आसपास ऋषि-मुनि तुलसी और नीम खूब लगाया करते थे, ताकि हवा में मौजूद कीटाणु मरें, खून साफ रहे और मौसमी बुखार शरीर को न जकड़े.

एक्‍सपर्ट की सलाह

जड़ी-बूटियों के साथ रोजमर्रा के खाने का क्या हिसाब होना चाहिए, इस पर फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (FMRI), गुरुग्राम की हेड क्लिनिकल न्यूट्रिशनिस्ट दीप्ति खटूजा का कहना है, "प्राचीन ग्रंथों में जिन जड़ी-बूटियों का जिक्र है, वे एंटीऑक्सीडेंट्स से भरी हैं और शरीर की सूजन कम करती हैं. पर कोई भी काढ़ा या बूटी तभी काम करेगी जब आपकी रोज की थाली भी संतुलित हो. अगर खाने में जरूरी पोषक तत्व नहीं होंगे, तो केवल जड़ी-बूटियों के दम पर सेहत नहीं सुधारी जा सकती. इसलिए सही खान-पान के साथ ही इन पारंपरिक बूटियों को अपनाना चाहिए."

घर पर कैसे शुरू करें इनका इस्तेमाल?

बातचीत के आखिर में डॉ. राम अवतार ने बहुत सीधी सलाह दी कि हर किसी को अपने आंगन या बालकनी में कम से कम तुलसी, गिलोय और हरसिंगार के गमले जरूर रखने चाहिए. अगर घुटनों में तकलीफ है तो हरसिंगार के तीन-चार पत्तों को पानी में उबालकर पिएं, बुखार या कमजोरी में गिलोय का डंठल उबालें और रोज सुबह तुलसी चबाएं. डॉ. राम अवतार के अनुसार, संतुलित खान-पान, योग और पारंपरिक उपाय स्वस्थ जीवनशैली का हिस्सा बन सकते हैं.

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