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दुबली पतली लड़कियों को भी हो सकता है PCOS, सिर्फ वजन बढ़ना ही नहीं है वजह, जानिए क्या है PMOS और इसके लक्षण

बहुत सी महिलाएं मानती हैं कि PCOS सिर्फ मोटापे से जुड़ी समस्या है, लेकिन डॉक्टरों के मुताबिक सामान्य वजन वाली या दुबली-पतली महिलाओं को भी Lean PCOS हो सकता है. इसके लक्षणों में अनियमित पीरियड्स, मुंहासे, बाल झड़ना और इंसुलिन रेजिस्टेंस शामिल हैं.

दुबली पतली लड़कियों को भी हो सकता है PCOS, सिर्फ वजन बढ़ना ही नहीं है वजह, जानिए क्या है PMOS और इसके लक्षण
पतली लड़कियों में भी हो सकता है PCOS, अक्सर नजरअंदाज हो जाते हैं इसके लक्षण
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  • पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम का नाम बदलकर पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम रखा गया है.
  • भारत में लगभग हर नौ में से एक महिला इस सिंड्रोम से प्रभावित है और यह केवल मोटी महिलाओं तक सीमित नहीं है
  • लीन पीसीओएस उन महिलाओं में होता है जिनका वजन सामान्य होता है.

PCOS यानी पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम को लेकर अब नजरिया काफी बदल चुका है. मई 2026 में इसके गंभीर और चौतरफा असर को देखते हुए इसका नाम बदलकर PMOS यानी पॉलीएंडोक्राइन मेटाबॉलिक ओवेरियन सिंड्रोम कर दिया गया है. दुनिया भर में हर 8 में से 1 महिला इससे जूझ रही है, जबकि हमारे भारत में हालात और भी नाजुक हैं. यहां करीब 11.3 फीसदी महिलाएं इस डिसऑर्डर की शिकार हैं, यानी लगभग हर 9 में से एक महिला.

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जिनका बॉडी वेट या बीएमआई बिल्कुल नार्मल होता है, वे भी इस बीमारी के चंगुल में आ जाती हैं. ऐसी महिलाओं को पीरियड्स का मिस होना, खुलकर न आना, बहुत ज्यादा ब्लीडिंग होना या फिर कभी-कभी महीनों तक डेट न आने जैसी परेशानियां झेलनी पड़ती हैं.

PMOS के लक्षणों में मेल हार्मोन्स यानी एंड्रोजन का बढ़ना, चेहरे और शरीर पर अनचाहे बाल आना, जिद्दी मुंहासे, स्किन का बहुत ज्यादा ऑयली होना और सिर के बालों का तेजी से पतला होना शामिल है. इसके साथ ही गर्भधारण करने में दिक्कत और बांझपन जैसी समस्याएं भी खड़ी हो जाती हैं. इसे नया नाम देने की सबसे बड़ी वजह यही है कि यह बीमारी सिर्फ बच्चेदानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे मेटाबॉलिज्म पर गहरा असर डालती है.

इसमें इंसुलिन रेजिस्टेंस, प्रीडायबिटीज, टाइप 2 डायबिटीज, गर्दन पर काले घेरे और स्किन टैग्स की समस्या हो जाती है. बात यहीं खत्म नहीं होती, कुछ औरतों को वजन कम करने में बहुत परेशानी होती है, तो वहीं कुछ बिना वजह हर वक्त थकान, मूड स्विंग्स, घबराहट, डिप्रेशन, नींद न आना और पेट के निचले हिस्से में दर्द से परेशान रहती हैं.

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आखिर क्या है यह लीन पीसीओएस (Lean PCOS)?

फरीदाबाद के आरजी हॉस्पिटल्स में गायनेकोलॉजी कंसल्टेंट डॉ. पलक दीवान बताते हैं कि समाज में सबसे बड़ा भ्रम यही फैला है कि पीसीओएस सिर्फ मोटी महिलाओं को ही होता है. बेशक बहुत सी औरतों का वजन इसमें बढ़ता है, लेकिन एक बड़ी तादाद ऐसी भी है जिनका वजन एकदम सामान्य होता है और वे अंदर ही अंदर हार्मोनल और मेटाबॉलिक दिक्कतों से जूझ रही होती हैं. मेडिकल भाषा में इसे ही लीन पीसीओएस कहा जाता है.

डॉ. दीवान का कहना है कि यह बीमारी हर महिला में एक जैसी नहीं दिखती. दुबली-पतली लड़की को भी पीरियड्स में गड़बड़ी, चेहरे पर दाने, दाढ़ी-मूंछ की जगह बाल आना, हेयर फॉल और प्रेग्नेंट होने में तकलीफ हो सकती है. कई बार लक्षण इतने हल्के होते हैं कि बरसों तक पता ही नहीं चलता कि अंदर कोई बीमारी पल रही है.

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क्या पतली महिलाओं को सच में पीसीओएस हो सकता है?

डॉक्टर साहब जोर देकर कहते हैं कि पीसीओएस के मामले में सिर्फ शरीर का वजन देखना बहुत बड़ी भूल है. बाहर से बिल्कुल फिट दिखने वाली औरतों के अंदर भी हार्मोनल असंतुलन और इंसुलिन रेजिस्टेंस हो सकता है.

आमतौर पर इंसुलिन रेजिस्टेंस को मोटापे से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन लीन पीसीओएस वाली महिलाओं में भी यह छुपा बैठा होता है. इससे हार्मोन का लेवल बिगड़ता है, अंडोत्सर्जन यानी ओवुलेशन रुक जाता है और आगे चलकर मेटाबॉलिज्म से जुड़ी गंभीर बीमारियां घेर लेती हैं.

जामा (JAMA) नेटवर्क में छपी एक मेडिकल रिसर्च भी बताती है कि भारत में ज्यादातर महिलाओं में मोटापा न होने के बावजूद पीएमओएस के लक्षण पाए जाते हैं.

लीन पीसीओएस के आम लक्षण

अगर किसी महिला का वजन सामान्य है, फिर भी उसे नीचे दिए गए लक्षण महसूस हो रहे हैं तो सतर्क हो जाना चाहिए:

  • पीरियड्स का समय पर न आना या कई महीनों तक रुक जाना.
  • चेहरे पर जिद्दी कील-मुंहासे और बहुत ज्यादा तेलीय त्वचा.
  • चेहरे, ठोड़ी, पेट या छाती पर अनचाहे मोटे बाल उगना.
  • सिर के बीच के बाल हल्के होना या बहुत ज्यादा झड़ना.
  • बच्चा कंसीव करने में बार-बार दिक्कत आना.
  • बिना किसी साफ वजह के हॉर्मोनल उतार-चढ़ाव महसूस होना.
     

यह बीमारी पकड़ में क्यों नहीं आती?

लीन पीसीओएस का वक्त पर पता न चलने की सबसे बड़ी वजह यही है कि इसके लक्षण बहुत मामूली लगते हैं. डॉक्टर और मरीज दोनों ही मान लेते हैं कि वजन तो सही है, फिर यह बीमारी कैसे हो सकती है. इसी गलतफहमी की वजह से इलाज में सालों की देरी हो जाती है, जिसका सीधा बुरा असर औरतों की फर्टिलिटी और मेटाबॉलिक हेल्थ पर पड़ता है.

इंसुलिन रेजिस्टेंस और लीन पीसीओएस का क्या रिश्ता है?

डॉ. पलक दीवान समझाते हैं कि जब भी पीसीओएस की बात होती है, तो लोगों के दिमाग में सिर्फ महावारी की खराबी या पिंपल्स आते हैं. लेकिन यह सिर्फ बच्चा पैदा करने से जुड़ी समस्या नहीं है. इसका सबसे गहरा ताल्लुक इंसुलिन रेजिस्टेंस से है.

इंसुलिन वो हार्मोन है जो खून में मौजूद ग्लूकोज को एनर्जी में बदलने का काम करता है. जब शरीर की कोशिकाएं इंसुलिन की बात सुनना बंद कर देती हैं, तो शरीर जरूरत से ज्यादा इंसुलिन बनाने लगता है. इसी को इंसुलिन रेजिस्टेंस कहते हैं.

जब खून में इंसुलिन बढ़ जाता है, तो ओवरी ज्यादा मात्रा में पुरुष हार्मोन यानी एंड्रोजन बनाने लगती है. नतीजतन नॉर्मल ओवुलेशन रुक जाता है, पीरियड्स गड़बड़ा जाते हैं, चेहरे पर बाल आने लगते हैं और स्किन खराब हो जाती है.

सबसे डरावनी बात यह है कि इंसुलिन रेजिस्टेंस का कोई सीधा लक्षण बाहर से नहीं दिखता. जब तक खून की जांच न कराई जाए, तब तक महिला को अहसास ही नहीं होता कि अंदर क्या चल रहा है. समय बीतने के साथ यही चीज प्रीडायबिटीज और आगे चलकर टाइप 2 डायबिटीज में बदल जाती है.

वजन न बढ़ने पर भी इंसुलिन रेजिस्टेंस कैसे?

डॉ. दीवान आगाह करते हैं कि मोटापा एक कारण जरूर है, लेकिन ऐसा बिल्कुल नहीं है कि दुबली महिलाओं को यह नहीं हो सकता. इसलिए औरतों को सिर्फ अपनी माहवारी या चेहरे के दानों तक ध्यान सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि पूरे मेटाबॉलिज्म की जांच करवानी चाहिए.

द लांसेट जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक पीसीओएस में ब्लड शुगर की सेहत बहुत मायने रखती है. अगर इस पर ध्यान न दिया जाए तो दिल की बीमारियां, डायबिटीज और बांझपन का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

लीन पीसीओएस की जांच कैसे होती है?

लीन पीसीओएस को पकड़ने के लिए डॉक्टर मरीज की पूरी पीरियड हिस्ट्री देखते हैं और कुछ जरूरी टेस्ट करवाते हैं:

  • मरीज के शारीरिक लक्षणों की बारीकी से जांच.
  • ब्लड टेस्ट और कंप्लीट हार्मोन प्रोफाइल.
  • फास्टिंग ग्लूकोज और सीरम इंसुलिन का स्तर.
  • पेल्विक अल्ट्रासाउंड स्कैन.

इसके अलावा कुछ दूसरी बीमारियों की जांच करके उन्हें खारिज करना भी जरूरी होता है, जिनके लक्षण इससे मिलते-जुलते हैं:

  • थायरॉयड की बीमारी.
  • हाइपरप्रोलैक्टिनीमिया (प्रोलैक्टिन हार्मोन का बढ़ जाना).
  • एड्रिनल ग्रंथि से जुड़े हॉर्मोनल डिसऑर्डर.
     
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क्या इससे मां बनने में रुकावट आती है?

जर्नल ऑफ डायबिटीज एंड मेटाबॉलिक डिसऑर्डर्स के अनुसार, पीएमओएस सीधे तौर पर प्रजनन क्षमता को कमजोर करता है. इसमें समय पर अंडा नहीं बनता और अगर बन भी जाए तो उसकी क्वालिटी ठीक नहीं रहती. इसलिए सही समय पर पहचान होना बहुत जरूरी है, ताकि आगे चलकर परेशानी न बढ़े.

लीन पीसीओएस का इलाज और बचाव

डॉ. दीवान का मानना है कि रोजमर्रा की आदतों में छोटे-छोटे बदलाव करके इस बीमारी को काफी हद तक काबू में रखा जा सकता है. इसके लिए ये तरीके सबसे कारगर साबित होते हैं:

  • रोजाना कम से कम 30 से 40 मिनट की हल्की-फुल्की कसरत या योग.
  • खाने में फाइबर और प्रोटीन की भरपूर मात्रा शामिल करना.
  • पैकेज्ड फूड, मैदा, तली-भुनी चीजें और रिफाइंड चीनी से बिल्कुल दूरी बनाना.
  • रात को 7 से 8 घंटे की अच्छी नींद लेना और तनाव कम करने की कोशिश करना.

वे आगे कहते हैं कि कुछ मामलों में डॉक्टर लक्षणों और रिपोर्ट को देखकर दवाइयां भी शुरू करते हैं. पीसीओएस का इलाज केवल पीरियड्स ठीक करने या क्रीम लगाकर मुंहासे मिटाने का नाम नहीं है. असली इलाज यह समझना है कि शरीर के भीतर मेटाबॉलिज्म और ब्लड शुगर का क्या हाल है.

डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?

अगर किसी को भी ये संकेत नजर आ रहे हों तो घर बैठे रहने के बजाय तुरंत गायनेकोलॉजिस्ट से मिलना चाहिए:

  • हर महीने पीरियड्स की तारीख का लगातार बदलना.
  • चेहरे पर ऐसे पिंपल्स होना जो किसी भी दवा से ठीक न हों.
  • ठोड़ी, छाती या पेट पर काले-मोटे बाल उगना.
  • सिर के आगे के हिस्से से मांग चौड़ी होना और बाल झड़ना.
  • शादी के लंबे समय बाद भी गर्भधारण न हो पाना.

डॉ. पलक दीवान अंत में यही सलाह देते हैं कि वक्त रहते जांच और डॉक्टर से लगातार सलाह लेते रहने से आने वाले बड़े खतरों को टाला जा सकता है. इससे महिलाएं अपनी प्रजनन क्षमता के साथ-साथ अपनी लंबी उम्र और सेहत को भी सुरक्षित रख सकती हैं.

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