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अनुष्का रंजन ने बताया IVF का सबसे मुश्किल सच, 'हर महीने उम्मीद टूटने पर खुद को दोषी मानने लगी थी'

अनुष्का रंजन ने अपनी IVF जर्नी में झेले मानसिक तनाव, गिल्ट और भावनात्मक संघर्ष के बारे में खुलकर बात की. जानिए IVF के साइड इफेक्ट्स, IUI और IVF में अंतर और डॉक्टर की सलाह.

अनुष्का रंजन ने बताया IVF का सबसे मुश्किल सच, 'हर महीने उम्मीद टूटने पर खुद को दोषी मानने लगी थी'
आईवीएफ का दर्द सिर्फ शरीर नहीं, दिमाग को भी तोड़ देता है, अनुष्का रंजन ने शेयर किया अनुभव.
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अनुष्का रंजन ने हाल ही में अपनी IVF Journey के दौरान झेले मानसिक तनाव, हार्मोनल बदलाव और गिल्ट की भावना के बारे में खुलकर बात की. उनकी कहानी उन लाखों महिलाओं की भावनाओं को सामने लाती है जो IUI या IVF के जरिए मां बनने की कोशिश करती हैं. अनुष्का रंजन ने खुलासा किया कि IVF का दर्द सिर्फ इंजेक्शन और दवाइयों तक सीमित नहीं होता. बार-बार उम्मीद टूटने, खुद को दोष देने और मानसिक तनाव से गुजरना इस सफर का सबसे कठिन हिस्सा हो सकता है. डॉक्टर ने भी IVF से जुड़े कई अहम पहलुओं पर रोशनी डाली.

हाल ही में अभिनेत्री अनुष्का रंजन और उनके पति आदित्य सील ने नेहा धूपिया और अंगद बेदी के शो में अपनी ऐसी ही एक बहुत निजी और भावुक कहानी सबसे बांटी. वो कहानी, जो बाहर से शायद सिर्फ कुछ डॉक्टरों और इंजेक्शनों की दिखती है, लेकिन अंदर से एक औरत को पूरी तरह तोड़कर रख देती है.

शुरुआती कोशिशें और आईयूआई का सफर

अनुष्का और आदित्य भी बाकी जोड़ों की तरह पहले कुदरती तरीके से माता-पिता बनने की कोशिश कर रहे थे. जब काफी वक्त बीतने के बाद भी बात नहीं बनी, तो डॉक्टरों ने उन्हें आईयूआई की सलाह दी. आईयूआई यानी वो तरीका जिसे लोग आईवीएफ से थोड़ा आसान मानते हैं.

लेकिन आसान कहना सिर्फ बाहर वालों के लिए होता है. अनुष्का बताती हैं कि उस दौरान भले ही इंजेक्शन कम लगे हों, पर जो ढेरों दवाइयां खानी पड़ती थीं, उन्होंने शरीर को अंदर से हिला दिया था. दवाइयों के असर से शरीर हर वक्त भारी लगता, अजीब सी बेचैनी रहती और समझ नहीं आता था कि मिजाज कब क्यों बदल रहा है.

जब अनुष्का ने चुना आईवीएफ का रास्ता

आईयूआई से बात नहीं बनी तो अगला कदम था आईवीएफ. सबको पता है कि आईवीएफ में कामयाबी की उम्मीद ज्यादा होती है, लेकिन इसके साथ जो मानसिक और शारीरिक दर्द आता है, उसकी कल्पना वही कर सकता है जो उस दौर से गुजरा हो.

अनुष्का ने बहुत हिम्मत करके वो बात कही जो शायद लाखों महिलाएं अपने दिल में दबाकर घुटती रहती हैं:

  • औरत सोचने लगती है कि शायद मेरे ही शरीर में कोई बहुत बड़ी कमी है.
  • खुद पर गुस्सा आने लगता है कि मैंने कभी नॉनवेज क्यों खाया, या कभी शराब क्यों पी ली.
  • एक अजीब सी शर्म घेर लेती है कि किसी को कैसे बताएं कि हम बच्चा पैदा करने के लिए ये सब कर रहे हैं.
  • हर महीने जब उम्मीद टूटती है, तो लगता है जैसे जिंदगी वहीं ठहर गई हो.

आदित्य का फैसला: दर्द दोबारा नहीं झेलने दूंगा

इस पूरे सफर में अनुष्का का दर्द देखकर उनके पति आदित्य सील अंदर तक हिल गए थे. उन्होंने देखा कि उनकी पत्नी किस तरह रोज सुईयों के चुभन और आंसुओं के बीच जी रही है. आदित्य ने उसी वक्त एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने तय किया कि अगर ये आईवीएफ कामयाब नहीं हुआ, तो वो अपनी पत्नी को दोबारा इस भयानक दर्द से नहीं गुजरने देंगे.

दोनों ने आपस में बात की और फैसला किया कि अगर बायोलॉजिकली बच्चा नहीं भी हुआ, तो क्या फर्क पड़ता है? वे किसी मासूम बच्चे को गोद ले लेंगे और उसे दुनिया भर का प्यार देंगे. ये सोच किसी भी रिश्ते की सबसे खूबसूरत मिसाल है, जहां बच्चे की चाहत से ज्यादा पार्टनर के वजूद और उसकी तकलीफ की फिक्र होती है.

डॉक्टर की जुबानी: क्यों होता है ये सब?

अनुष्का की इस दर्दभरी कहानी पर मशहूर स्त्री रोग और आईवीएफ विशेषज्ञ डॉ. ऋषिकेश पाई ने बहुत जरूरी बातें समझाई हैं. लीलावती और फोर्टिस जैसे बड़े अस्पतालों से जुड़े डॉ. पाई कहते हैं कि आईवीएफ की राह में आने वाली मुश्किलें सिर्फ शरीर तक सीमित नहीं रहतीं.

डॉक्टर के मुताबिक इन बातों को समझना हर जोड़े के लिए बहुत जरूरी है:

हार्मोन्स का खेल: आईवीएफ के दौरान दिए जाने वाले इंजेक्शन और हार्मोन्स की वजह से अचानक मूड बदलना, बहुत तेज थकान, पेट का फूलना और भारीपन होना पूरी तरह सामान्य बात है.
अनिश्चितता का भारी तनाव: हर हफ्ते नई जांच, हर बार एक नई रिपोर्ट का इंतजार और मन में बैठा यह डर कि पता नहीं इस बार क्या होगा, मरीज को अंदर से थका देता है.
खुद को कोसना तुरंत बंद करें: कंसीव न कर पाने का यह कतई मतलब नहीं है कि महिला के शरीर में ही कोई खोट है. कभी-कभार नॉनवेज खाने या किसी आम आदत को अपनी नाकामी मान लेना एकदम गलत सोच है.
उम्र और मेडिकल हिस्ट्री: आईयूआई चुनना है या आईवीएफ, यह फैसला हमेशा दोनों की उम्र, मेडिकल बैकग्राउंड और फर्टिलिटी की असली वजह देखकर ही तय होना चाहिए, किसी के दबाव में आकर नहीं.

साथी का हाथ ही सबसे बड़ी ताकत

डॉ. पाई जोर देकर कहते हैं कि इस मुश्किल सफर में सबसे बड़ी दवाई पति का प्यार और उसका साथ होती है. जब औरत हर दिन इंजेक्शन के दर्द से गुजर रही हो, तब उसके पार्टनर का यह भरोसा दिलाना कि "तुम जैसी हो मेरे लिए काफी हो", आधी तकलीफ वहीं खत्म कर देता है.

अगर तनाव ज्यादा बढ़ रहा हो, तो हिचकिचाए बिना किसी अच्छे काउंसलर की मदद लेनी चाहिए. बच्चे की किलकारी किसी भी घर में खुशियां लाती है, लेकिन उस सफर में किसी औरत का खुद को अधूरा समझ लेना या खुद से नफरत करने लगना सबसे बड़ा नुकसान है. मातृत्व खूबसूरत है, पर एक औरत की अपनी जिंदगी, उसकी सेहत और उसका आत्मसम्मान उससे भी ज्यादा कीमती है.

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