ऑफिस पहुंचते ही कुर्सी पर बैठना और फिर शाम तक मुश्किल से उठना, आजकल लाखों-करोड़ों लोगों की लाइफस्टाइल बन चुकी है. आईटी, मीडिया, बैंकिंग और कॉर्पोरेट सेक्टर में काम करने वाले लोगों का बड़ा हिस्सा रोज 8 से 10 घंटे तक बैठकर काम करता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपकी यही आदत पैरों की नसों के लिए खतरा बन सकती है?
फरीदाबाद स्थित फोर्टिस हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. विनीत बांगा का कहना है कि अगर आप एक ही जगह पर बैठे रहते हैं, तो इससे पैरों में ब्लड फ्लो धीमा होने लगता है. इस स्थिति में नसों में ब्लड क्लॉट बनने लग सकता है. मेडिकल भाषा में इस समस्या को डीप वेन थ्रॉम्बोसिस कहा जाता है. अगर आप समय रहते ध्यान न दिया जाए, तो ये स्थिति जानलेवा भी साबित हो सकती है.
आखिर क्या होता है डीप वेन थ्रॉम्बोसिस?
डॉक्टर विनीत बताते हैं कि हमारे शरीर की नसें लगातार खून को हार्ट तक पहुंचाने का काम करती हैं. लेकिन जब हम कई घंटों तक बिना हिले-डुले बैठे रहते हैं, तो पैरों की मांसपेशियां इन-एक्टिव हो जाती हैं. इससे नसों में खून जमा होने लगता है और धीरे-धीरे थक्का बनने का खतरा बढ़ जाता है.
ये थक्का आमतौर पर पिंडली या जांघ की गहरी नसों में बनता है. शुरुआत में कई लोगों को इसका पता भी नहीं चलता, लेकिन जैसे-जैसे समस्या बढ़ती है, लक्षण दिखने लगते हैं.
इन संकेतों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
डॉक्टर बांगा कहते हैं कि अगर आपको पैरों में लगातार दर्द या भारपन महसूस हो रहा है, तो इसे सामान्य थकान समझकर टालना ठीक नहीं है. डीवीटी के दौरान आमतौर पर ये लक्षण दिखाई दे सकते हैं, जैसे-
- एक पैर में सूजन आना
- पिंडली में दर्द या खिंचाव महसूस होना
- स्किन का लाल या नीला पड़ना
- पैर में गर्माहट महसूस होना
- चलने या खड़े होने पर दर्द बढ़ना
कई बार यह समस्या बिना किसी स्पष्ट लक्षण के भी हो सकती है, इसलिए जोखिम वाले लोगों को ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत होती है.
क्यों हो सकती है जान का खतरा?
डॉ. विनीत कहते हैं कि डीवीटी की परेशानी सिर्फ पैर का दर्द नहीं है. असली खतरा तब पैदा होता है, जब नस में जमा खून का थक्का टूटकर शरीर में घूमते हुए फेफड़ों तक पहुंच जाता है. इस स्थिति को पल्मोनरी एम्बोलिज्म कहा जाता है. इससे अचानक सांस फूलना, सीने में तेज दर्द, चक्कर आना और कुछ मामलों में मौत तक हो सकती है. यही वजह है कि डॉक्टर डीवीटी को कभी हल्के में न लेने की सलाह देते हैं.
डॉक्टर का कहना है कि हाल के वर्षों में वर्क फ्रॉम होम और स्क्रीन टाइम बढ़ने के बाद युवाओं में भी इस बीमारी के मामले काफी बढ़े हैं.
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