बॉलीवुड अभिनेता कार्तिक आर्यन की घुटने की सर्जरी की खबर सामने आने के बाद लोगों के मन में एक सवाल उठ रहा है. क्या घुटने की हर गंभीर चोट में ऑपरेशन कराना जरूरी होता है? एक्सपर्ट्स के मुताबिक इसका जवाब चोट की गंभीरता, लिगामेंट या मेनिस्कस के नुकसान और मरीज की फिजिकल एक्टिविटी पर निर्भर करता है. आइए समझते हैं कि किन मामलों में सर्जरी जरूरी होती है और कब फिजियोथेरेपी से भी रिकवरी संभव है.
पूरी खबर क्या है?
बॉलीवुड एक्टर कार्तिक आर्यन को लेकर एक बड़ी खबर सामने आई है. कबीर खान की आने वाली नई फिल्म की शूटिंग के दौरान उनके घुटने में गंभीर चोट लग गई है. 35 साल के कार्तिक को तुरंत मुंबई के माहिम इलाके में मौजूद फोर्टिस रहेजा अस्पताल ले जाया गया, जहा डॉक्टरों ने उनके घुटने की सर्जरी की है.
कार्तिक आर्यन के घुटने में किस तरह की चोट लगी है, इसकी पूरी मेडिकल जानकारी तो अभी सामने नही आई है. लेकिन उनकी सर्जरी की खबर सुनकर आम लोगों के मन में एक बड़ा सवाल जरूर उठने लगा है. क्या घुटने की हर गंभीर चोट में ऑपरेशन कराना जरूरी होता है? हड्डी और जोड़ो के डॉक्टरों का कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है.
सर्जरी होगी या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि घुटने के अंदर का कौन सा हिस्सा टूटा या फटा है, चोट कितनी गहरी है और उस इंसान को अपनी रोजमर्रा की जिंदगी या काम में कितनी फिजिकल एक्टिविटी करनी पड़ती है.
कुछ घुटने की चोटों में ऑपरेशन क्यों जरूरी हो जाता है?
अमृता हॉस्पिटल, फरीदाबाद की ऑर्थोपेडिक्स सीनियर कंसल्टेंट डॉ. अनन्या शर्मा बताती हैं कि घुटने की चोट शुरुआत में जितनी साधारण लगती है, अंदर से उतनी ही पेचीदा हो सकती है. गिरने या अचानक पैर मुड़ने के बाद दर्द होना, सूजन आना और चलने में परेशानी होना बहुत आम बात है. लेकिन मेडिकल नजरिए से असली बात यह होती है कि जोड़ के अंदर क्या डैमेज हुआ है. घुटने के अंदर लिगामेंट, मेनिस्कस की गद्दी, कार्टिलेज, हड्डियां और मांसपेशियां होती हैं.
कुछ चोटें ऐसी होती हैं जो सिर्फ आराम और फिजियोथेरेपी से पूरी तरह ठीक हो जाती हैं. लेकिन कुछ गंभीर मामलों में अगर सही इलाज न मिले तो घुटना हमेशा के लिए कमजोर हो सकता है.
डॉ. शर्मा का कहना है कि जब तक कार्तिक की मेडिकल रिपोर्ट सामने न आए, उनकी चोट पर कोई पक्का दावा करना ठीक नहीं होगा. लेकिन आमतौर पर सर्जरी तब की जाती है जब घुटना अपनी जगह से हिलने लगे, पैर कांपने लगे, लिगामेंट पूरी तरह फट जाए, मेनिस्कस की गद्दी खिसक कर टूट जाए या फिर चलते-चलते घुटना अचानक लॉक यानी जाम हो जाए.

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क्या हर एसीएल (ACL) टूटने पर सर्जरी करानी पड़ती है?
खिलाड़ियों और एक्टिव लोगों में एंटीरियर क्रूशिएट लिगामेंट यानी एसीएल टूटने की खबरें सबसे ज्यादा आती हैं. लेकिन एसीएल फटने का मतलब यह कतई नहीं है कि आपको सीधे ऑपरेशन टेबल पर ही जाना पड़ेगा. इसका इलाज मरीज की उम्र, उसके काम के तरीके और घुटने की मजबूती को देखकर तय होता है. अगर कोई इंसान एथलीट है, डांसर है या ऐसा काम करता है जिसमें तेज दौड़ना, अचानक मुड़ना और कूदना शामिल है, तो उसके लिए सर्जरी जरूरी हो सकती है ताकि पैर में लचक न आए.
कब सिर्फ फिजियोथेरेपी और रिहैब से बात बन जाती है?
घुटने की कई गंभीर चोटें बिना किसी चीर-फाड़ के सिर्फ सही कसरत और रिहैब से ठीक हो जाती हैं. मांसपेशियों का खिंचाव, हल्की मोच और मेनिस्कस के छोटे कट बिना सर्जरी के भी भर जाते हैं. मेडिकल रिसर्च में भी यह साबित हो चुका है कि हर एक्टिव युवा को एसीएल फटने पर तुरंत सर्जरी की जरूरत नहीं होती.
कानोन (KANON) और कम्पेयर (COMPARE) नाम की मशहूर रिसर्च में यह देखा गया कि जिन मरीजों को शुरुआत में ऑपरेशन कराने के बजाय सही फिजियोथेरेपी और रिहैब कराया गया, उनमें से ज्यादातर लोगों को आगे चलकर किसी सर्जरी की जरूरत ही नहीं पड़ी. उनका घुटना कसरत के दम पर ही मजबूत हो गया. इसका सीधा सा मतलब है कि इलाज केवल एमआरआई (MRI) की रिपोर्ट देखकर नहीं, बल्कि मरीज की परेशानी को देखकर तय होना चाहिए.
घुटने की चोट के ये खतरे बिल्कुल न करें नजरअंदाज
अगर घुटने में चोट लगने के बाद नीचे दिए गए लक्षण दिखें तो तुरंत किसी हड्डी के डाक्टर से मिलना चाहिए.
- चोट लगते ही कुछ ही देर में बहुत ज्यादा सूजन आ जाना.
- चोट वाले पैर पर वजन बिल्कुल न रख पाना या खड़े न हो पाना.
- चलते समय घुटना अचानक अटक जाना या जाम हो जाना.
- पैर रखते ही घुटने का बार-बार मुड़ जाना या लड़खड़ाना.
- लगातार घुटने में लचक महसूस होना.
- बहुत तेज दर्द होना जो धीरे-धीरे और बढ़ता जाए.
- घुटने को पूरी तरह सीधा करने या मोड़ने में भारी परेशानी होना.
चोट लगते ही बहुत तेजी से आने वाली सूजन का मतलब यह हो सकता है कि जोड़ के अंदर खून जमा हो रहा है. ऐसी हालत में खुद से मालिश या सिकाई करने की गलती बिल्कुल न करें.
एक्टर्स और एथलीटों के लिए नियम क्यों अलग होते हैं?
एक आम इंसान को केवल आराम से चलने-फिरने, उठने-बैठने और सीढ़ियां चढ़ने की जरूरत होती है. लेकिन किसी एक्टर को भारी एक्शन सीन करने होते हैं, नाचना पड़ता है और खिलाड़ी को मैदान में जान लगानी होती है.
ऐसे में हल्की-फुल्की रिकवरी उनके काम नहीं आती. उन्हें घुटने में सौ फीसदी ताकत, लचीलापन और भरोसा वापस चाहिए होता है. यही वजह है कि ऐसे मामलों में डॉक्टर रिहैब के साथ-साथ जरूरत पड़ने पर सर्जरी को तरजीह देते हैं.
सिर्फ MRI रिपोर्ट देखकर न करवाएं ऑपरेशन
आज के समय में आर्थोपेडिक्स साइंस काफी बदल चुका है. डॉक्टर अब सिर्फ एमआरआई फिल्म का इलाज नहीं करते, बल्कि इंसान की रोजमर्रा की परेशानी को देखते हैं. एमआरआई में फटा हुआ लिगामेंट दिखने का यह मतलब नहीं कि सीधे ऑपरेशन थिएटर चले जाएं.
डॉक्टर पहले यह चेक करते हैं कि मरीज को चलने में क्या दिक्कत आ रही है और क्या फिजियोथेरेपी से घुटने को दोबारा मजबूत बनाया जा सकता है. डॉ. शर्मा का कहना है कि असली सवाल यह नहीं है कि लिगामेंट टूटा है या नहीं, बल्कि असली सवाल यह है कि क्या हम इस घुटने को इतना मजबूत बना सकते हैं कि इंसान अपना हर काम बिना डर के कर सके. अगर आपके घुटने में भी चोट लगी है, तो घबराने या तुरंत ऑपरेशन का फैसला लेने के बजाय किसी अच्छे विशेषज्ञ से मिलकर सही सलाह जरूर लें.
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