बेंगलुरु के रिचर्ड्स टाउन में मौजूद क्लेरेंस हाई स्कूल में फ्लू जैसी बीमारी के चलते करीब 500 से ज्यादा बच्चे और 21 स्टाफ मेंबर्स बीमार पड़ गए हैं. रिपोर्टस के मुताबिक, बीमार लोगों में बुखार, खांसी, जुकाम और बदन दर्द जैसे लक्षण देखे गए हैं. इनमें से कम से कम दो स्टूडेंट्स में H1N1 की पुष्टि हुई है, जबकि एक स्टाफ का इलाज बैंगलोर बैपटिस्ट हॉस्पिटल में चल रहा है. इन्फेक्शन के बढ़ते खतरे को देखते हुए स्कूल मैनेजमेंट ने फिलहाल कैंपस को बंद कर दिया है.
इतने बड़े पैमाने पर बच्चों का बीमार होना पेरेंट्स के लिए फिक्र की बात तो है ही, क्योंकि स्कूलों में बच्चे क्लासरूम, बस और प्लेग्राउंड में काफी देर साथ रहते हैं, जिससे फ्लू तेजी से फैलता है. हालांकि सिर्फ दो केस मिलने का मतलब ये बिल्कुल नहीं है कि हर बीमार बच्चे को H1N1 ही है. दूसरी वायरल बीमारियां और फ्लू के स्ट्रेन्स भी ऐसे ही लक्षण लाते हैं, जिसकी सही वजह जांच के बाद ही पता चलती है. तो ऐसे में पेरेंट्स को क्या बातें ध्यान रखनी चाहिए और डॉक्टर के पास कब जाना चाहिए?
H1N1 क्या है?
H1N1 असल में इन्फ्लुएंजा A वायरस का ही एक सब-टाइप है, जो सांस की नली और फेफड़ों पर असर डालता है. इसके लक्षण काफी हद तक आम मौसमी फ्लू जैसे ही होते हैं. CDC (सेंटर्स फॉर डिसीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन) के अनुसार, इसमें आमतौर पर तेज बुखार, कंपकंपी, खांसी, गले में खराश, नाक बहना या बंद होना, सिरदर्द, थकान और बदन दर्द होता है. कुछ बच्चों में उल्टी या दस्त की दिक्कत भी हो सकती है. ध्यान देने वाली बात ये है कि हर मरीज को बुखार आए ये जरूरी नहीं, इसलिए सिर्फ बुखार न होने पर फ्लू को खारिज नहीं किया जा सकता.
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बच्चों में फ्लू कैसे फैलता है?
ये इन्फेक्शन बहुत तेजी से फैलता है. जब कोई बीमार इंसान खांसता, छींकता या बात करता है, तो हवा में ड्रॉपलेट्स फैल जाते हैं. बच्चे अक्सर लक्षण दिखने से पहले ही वायरस फैलाना शुरू कर देते हैं. जानकारों के मुताबिक, लक्षण शुरू होने से एक दिन पहले से लेकर अगले कुछ दिनों तक ये वायरस दूसरों में फैल सकता है. छोटे बच्चे तो इसे और लंबे वक्त तक फैला सकते हैं. स्कूल में बच्चे डेस्क, खिलौने और कई चीजें शेयर करते हैं और बार-बार चेहरे पर हाथ लगाते हैं, इसलिए स्कूल जाते रहने से बाकी बच्चे भी जल्दी इसकी चपेट में आ जाते हैं.
किन लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए?
पेरेंट्स को उन लक्षणों पर नजर रखनी चाहिए जो अचानक शुरू हों या तेजी से बढ़ें:
- तेज बुखार या ठंड लगना
- लगातार खांसी
- गले में दर्द या खराश
- बंद या बहती नाक
- सिरदर्द और तेज बदन दर्द
- बहुत ज्यादा सुस्ती या कमजोरी
- कुछ मामलों में उल्टी या पेट खराब होना
हर बुखार या जुकाम H1N1 नहीं होता, इसलिए तुरंत पैनिक करने से बचें.
डॉक्टर को कब दिखाना जरूरी है?
ज्यादातर बच्चे तो नार्मल देखभाल और आराम से ठीक हो जाते हैं, लेकिन कुछ मामलों में कॉम्प्लिकेशन्स का रिस्क ज्यादा रहता है. 5 साल से छोटे बच्चे (खासकर 2 साल से कम उम्र के), या जिन्हें अस्थमा, दिल की बीमारी, डायबिटीज या न्यूरोलॉजिकल दिक्कतें हैं, उन्हें फ्लू से ज्यादा खतरा रहता है. अगर हाई-रिस्क ग्रुप वाले बच्चों में लक्षण दिखें तो तुरंत पीडियाट्रिशियन से मिलना चाहिए. एंटीवायरल दवाएं शुरुआत के 48 घंटों में दी जाएं तो ज्यादा असरदार होती हैं. ध्यान रहे, कोई भी एंटीवायरल या एंटीबायोटिक अपने मन से शुरू न करें.
ये इमरजेंसी वार्निंग साइन्स नजरअंदाज न करें:
अगर बच्चे में ये गंभीर लक्षण दिखें, तो बिना देर किए इमरजेंसी मेडिकल हेल्प लें:
- तेज या सांस लेने में बहुत तकलीफ होना
- होंठ या चेहरे का नीला पड़ना
- सीने में दर्द
- मांसपेशियों में इतना दर्द कि बच्चा चलने से मना कर दे
- डिहाइड्रेशन (8 घंटे से पेशाब न आना, मुंह सूखना, रोते वक्त आंसू न निकलना)
- लगातार उल्टियां होना
- बहुत ज्यादा बेहोशी जैसी हालत या नॉर्मल रिस्पॉन्ड न करना
- दौरे (Seizures) पड़ना
- 104°F से ज्यादा तेज बुखार
सांस लेने की दिक्कत पर खास ध्यान क्यों?
चूंकि फ्लू सीधे सांस की नली और फेफड़ों को प्रभावित करता है, इसलिए अगर बच्चा बहुत तेजी से सांस ले रहा हो, पसलियां अंदर खिंच रही हों या वो सांस के लिए जोर लगा रहा हो, तो ये सीरियस सिचुएशन हो सकती है. इसके अलावा अगर बच्चा सुस्त है या ठीक से बातचीत नहीं कर पा रहा, तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं.
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बच्चा बीमार हो तो पेरेंट्स क्या करें?
सबसे बेसिक और जरूरी काम है कि बच्चे को स्कूल भेजने के बजाय घर पर पूरी तरह रेस्ट कराएं. जब तक बिना दवा दिए लगातार 24 घंटे बुखार न उतरे, बच्चे को स्कूल न भेजें. बच्चे को खूब सारा पानी, सूप, ओआरएस या लिक्विड डाइट दें ताकि डिहाइड्रेशन न हो. साथ ही खांसते-छींकते वक्त मुंह ढकने और साबुन से हाथ धोने की आदत डलवाएं.
क्या हर बच्चे का H1N1 टेस्ट कराना चाहिए?
बिल्कुल नहीं. हर खांसी-जुकाम वाले बच्चे को H1N1 टेस्ट की जरूरत नहीं होती. टेस्ट कराना है या नहीं, ये डॉक्टर ही बच्चे की हालत देखकर तय करते हैं. खुद से लैब्स में जाकर टेस्ट कराने से बचें.
एंटीबायोटिक्स का क्या रोल है?
H1N1 एक वायरल इन्फेक्शन है और एंटीबायोटिक्स सिर्फ बैक्टीरियल इन्फेक्शन पर काम करती हैं, वायरस पर नहीं. इसलिए बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक देना बिल्कुल गलत है. इससे बच्चे को साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं और शरीर में एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का खतरा बढ़ता है.
घर पर इन्फेक्शन फैलने से कैसे रोकें?
- बीमार बच्चे को थोड़ा अलग कमरे में रखें और बाकी लोगों से दूरी बनाएं.
- बार-बार छूने वाली सतहों (डोर नॉब्स, टेबल) की सफाई रखें.
- बर्तन, तौलिया या पानी की बोतल शेयर न करें.
- बच्चों को फ्लू वैक्सीन लगवाने को लेकर अपने डॉक्टर से सलाह लें, खासकर अगर बच्चे को पहले से कोई मेडिकल प्रॉब्लम हो.
क्या बेंगलुरु आउटब्रेक से डरने की जरूरत है?
संख्या जरूर बड़ी दिख रही है, लेकिन डरने की कोई जरूरत नहीं है. 500 बीमार बच्चों का मतलब 500 H1N1 केस नहीं है, इनमें से अधिकतर मौसमी फ्लू हो सकते हैं. जरूरत सिर्फ अलर्ट रहने, साफ-सफाई बरतने और लक्षण बिगड़ने पर सही समय पर डॉक्टर के पास जाने की है. पैनिक करने के बजाय सही जानकारी और सावधानी ही इसका सबसे अच्छा उपाय है.
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