आजकल के दौर में बच्चों की दुनिया स्क्रीन के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है. चाहे स्कूल का होमवर्क हो, ऑनलाइन क्लासेज या फिर मोबाइल पर पसंदीदा कार्टून देखना, बच्चे दिनभर फोन या टीवी के आगे जमे रहते हैं. ऐसे में माता-पिता की सबसे बड़ी टेंशन यही होती है कि कहीं बच्चे की आंखें कमजोर न हो जाएं. पर सबसे मुश्किल बात ये है कि बच्चे कभी खुद आकर नहीं बताते कि उन्हें धुंधला दिख रहा है. उन्हें लगता है कि दुनिया सबको वैसी ही दिखती है जैसी उन्हें नजर आ रही है.
मुंबई स्थित सर एच. एन. रिलायंस फाउंडेशन अस्पताल में ऑप्थल्मोलॉजी विभाग के डायरेक्टर डॉ. सुजल शाह के मुताबिक, माता-पिता को बच्चे के व्यवहार और आदतों में आने वाले छोटे-छोटे बदलावों पर ध्यान देना चाहिए ताकि समय रहते आंखों की परेशानी पकड़ में आ सके.
बच्चे की नजर कमजोर हो रही है? इन शुरुआती इशारों को पहचानें
अक्सर जब बच्चे की दूर की नजर कमजोर होने लगती है, तो उसके तौर तरीकों में थोड़ा फर्क आने लगता है. अगर आप ध्यान देंगे तो ये बातें आसानी से पकड़ में आ जाएंगी:
- टीवी देखते समय बार बार आंखें छोटी या सिकोड़कर देखना.
- स्कूल में ब्लैकबोर्ड साफ न दिखने पर क्लास में सबसे आगे वाली सीट पर बैठने की जिद करना.
- पढ़ाई करते वक्त किताब को बिल्कुल चेहरे के पास ले आना या बहुत ज्यादा झुककर पढ़ना.
- पढ़ते समय बार बार ध्यान भटकना या लाइन खो देना.
- बार बार सिरदर्द या आंखों में भारीपन और थकान की शिकायत करना.
- किसी चीज को घूरते वक्त एक आंख बंद कर लेना या गर्दन को एक तरफ तिरछा झुका लेना.
- खिलौनों, तस्वीरों या लोगों के चेहरों को पहचानने के लिए उनके बहुत ज्यादा करीब जाना.
नोट : सिर्फ स्क्रीन टाइम ही नहीं, समय पर आंखों की जांच न कराना भी बच्चों में मायोपिया बढ़ने का कारण बन सकता है.
व्यवहार में आ रहे ये बदलाव सिर्फ आलस नहीं हैं
डॉ. सुजल शाह बताते हैं कि अगर आपका बच्चा पहले मन लगाकर ड्रॉइंग करता था, किताबें पढ़ता था या बाहर पार्क में दौड़ता भागता था, लेकिन अब अचानक इन सब चीजों से जी चुराने लगा है, तो उसे डांटने की गलती न करें. हो सकता है कि उसे साफ न दिखने की वजह से झुंझलाहट हो रही हो:
- स्कूल में अचानक नंबर कम आना या बोर्ड से गलत स्पेलिंग उतारना.
- मोबाइल या टैब को आंखों से बिल्कुल सटाकर इस्तेमाल करना.
- थोड़ी देर पढ़ने के बाद ही चिड़चिड़ा हो जाना और आंखों को बार बार मलना.
वैसे हर बार इन बातों का मतलब ये नहीं होता कि चश्मा ही लगेगा. कई बार आंखों में एलर्जी, सूखापन यानी ड्राई आई, या मांसपेशियों में खिंचाव की वजह से भी ऐसा हो सकता है. इसलिए खुद डॉक्टर बनने की जगह किसी अच्छे नेत्र विशेषज्ञ को दिखाना सही फैसला है.

क्या टीवी के पास बैठना हमेशा चश्मे का ही इशारा है?
माता पिता के मन में यह सवाल अक्सर उठता है. सच बात तो ये है कि किसी एक आदत को देखकर सीधे नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता:
टीवी के पास बैठना: कभी कभी बच्चे सिर्फ अपनी मौज मस्ती या आदत के चलते स्क्रीन से चिपककर बैठते हैं. लेकिन अगर वो हर बार ऐसा करते हैं और दूर की चीजें देखने में आंखें सिकोड़ते हैं, तो नजर जरूर टेस्ट कराएं.
किताब पास से पढ़ना: यह मायोपिया यानी दूर की नजर कमजोर होने का बड़ा संकेत हो सकता है.
बार बार आंखें मलना: इसे कभी नजरअंदाज न करें, क्योंकि यह एलर्जी या आंखों में जलन की वजह से भी हो सकता है.
बिना किसी लक्षण के भी क्यों जरूरी है आंखों की रूटीन जांच?
डॉ. सुजल शाह के अनुसार, बच्चों की आंखों की जांच समय-समय पर कराते रहना बेहद जरूरी है. असल में, कई बार दृष्टि से जुड़ी समस्याओं की शुरुआत में कोई साफ लक्षण दिखाई नहीं देते. बच्चा बिल्कुल नॉर्मल बर्ताव करता है और घर में किसी को भनक तक नहीं लगती कि एक आंख की रोशनी कम हो चुकी है. बचपन में अगर सही वक्त पर समस्या पकड़ में आ जाए, तो नजर को आसानी से सुधारा जा सकता है. आजकल बच्चों में मायोपिया की परेशानी बहुत तेजी से बढ़ रही है.
इसलिए सिर्फ यह पूछकर तसल्ली मत कर लीजिए कि "बेटा, तुम्हें सब ठीक दिख रहा है ना?" क्योंकि उसका जवाब हमेशा "हां" ही होगा. उसके देखने, पढ़ने और खेलने के अंदाज पर पैनी नजर रखें. वक्त पर उठाया गया एक छोटा कदम आपके बच्चे की अनमोल आंखों को सुरक्षित रख सकता है.
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