हमारे घरों में यह बहुत आम बात है. किसी की आंख में खुजली हुई, लाली आई या जलन महसूस हुई तो फौरन फ्रिज का दरवाजा खुलता है. फ्रिज के कोने में महीनों पहले खरीदी हुई आई ड्रॉप रखी मिल जाती है. लोग शीशी पर छपी एक्सपायरी डेट देखते हैं, सोचते हैं कि अभी तो इसमें एक-दो साल बचे हैं, और बेझिझक दो बूंद आंख में टपका लेते हैं. अगर आप भी ऐसा ही करते हैं, तो रुक जाइए. शीशी पर लिखी वह तारीख असल में आपको गुमराह कर रही है.
आंखों के बड़े डॉक्टरों का साफ कहना है कि डब्बे पर छपी अंतिम तारीख देखकर यह मान लेना कि दवा एकदम सुरक्षित है, आंखों के लिए भारी पड़ सकता है. जब बात हमारी नाजुक आंखों की हो, तो दवा की शीशी का ढक्कन खुलते ही सारे नियम बदल जाते हैं.
ढक्कन खुलते ही बदल जाता है खेल
मैरिंगो एशिया हॉस्पिटल्स में ऑप्थैल्मोलॉजी की डायरेक्टर और ग्लूकोमा सर्जन डॉ. शिबल भारतीय के मुताबिक, ज्यादातर आई ड्रॉप्स को शीशी खोलने के ठीक एक महीने बाद फेंक देना चाहिए. भले ही उस शीशी में आधी से ज्यादा दवा बची हो और पैकेजिंग पर छपी एक्सपायरी डेट आने में अभी महीनों या साल बाकी हों.
वहीं, बिना प्रिजर्वेटिव वाली सिंगल-यूज वायल (एक बार इस्तेमाल होने वाली छोटी शीशियां) को तो खोलने के 24 घंटे के भीतर ही हटा देना चाहिए. कुछ कंपनियां तो यह भी सलाह देती हैं कि एक बार इस्तेमाल करने के बाद शीशी में बची दवा को तुरंत फेंक दें.
एक महीने बाद ऐसा क्या हो जाता है?
सवाल उठता है कि जब दवा की एक्सपायरी डेट बाकी है, तो 28 से 30 दिन में ऐसा क्या बदल जाता है.
असल में, जब तक दवा सीलबंद रहती है, वह पूरी तरह रोगाणुरहित यानी स्टेराइल होती है. लेकिन जैसे ही आप उसकी सील तोड़ते हैं, दवा का संपर्क बाहर की हवा और आसपास के माहौल से हो जाता है. शीशी का नोजल कई बार हमारी पलकों, उंगलियों या पलकों के बालों से छू जाता है. इससे बैक्टीरिया, फंगस और वायरस दवा के अंदर दाखिल हो जाते हैं.
- हवा लगने से दवा के अंदर मौजूद प्रिजर्वेटिव धीरे-धीरे काम करना बंद कर देते हैं.
- समय बीतने के साथ शीशी में रोगाणुओं की तादाद तेजी से बढ़ती है.
- नमी और कमरे के तापमान पर बैक्टीरिया बहुत जल्दी अपनी जगह बना लेते हैं.
असर कम होता है या फिर नुकसान ज्यादा?
डॉ. शिबल बताती हैं कि पुरानी खुली हुई आई ड्रॉप से दोनों तरह के खतरे होते हैं. पहला खतरा यह है कि हवा और रोशनी के असर से दवा का मुख्य सॉल्ट कमजोर पड़ने लगता है. यानी जिस बीमारी के इलाज के लिए आप दवा डाल रहे हैं, वह ठीक से असर ही नहीं करेगी.
दूसरा और सबसे बड़ा खतरा है इंफेक्शन का. पुरानी दूषित दवा डालने से कंजंक्टिवाइटिस या केराटाइटिस जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं. गंभीर मामलों में पुतली पर छाले पड़ जाते हैं और आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जाने का खतरा बन जाता है. डॉक्टर मानती हैं कि दवा का असर कम होना एक बात है, लेकिन दूषित दवा से आंखों को पहुंचने वाला नुकसान कहीं ज्यादा घातक होता है.
ग्लूकोमा के मरीजों के लिए यह लापरवाही जानलेवा
काला मोतिया यानी ग्लूकोमा के मरीजों के लिए यह गलती बहुत ज्यादा भारी पड़ सकती है. ऐसे मरीजों को अपनी आंखों का प्रेशर काबू में रखने के लिए रोजाना ड्रॉप्स डालनी पड़ती हैं.
अगर वे पुरानी या खराब हो चुकी दवा डालते रहेंगे, तो दवा अपना असर छोड़ चुकी होगी. मरीज को लगेगा कि वह रोज समय पर दवा डाल रहा है, जबकि अंदर ही अंदर उसकी आंख का प्रेशर बढ़ता रहेगा. बिना किसी आहट के यह प्रेशर आंख की मुख्य नस को सुखा देता है, जिससे धीरे-धीरे अंधापन आ सकता है.
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तो फिर शीशी पर छपी एक्सपायरी डेट का क्या मतलब है?
अक्सर लोग पूछते हैं कि अगर एक महीने में ही फेंकना है, तो कंपनी दो साल की डेट क्यों छापती है.
डॉ. शिबल साफ करती हैं कि शीशी पर लिखी एक्सपायरी डेट केवल उस स्थिति के लिए होती है जब तक शीशी पूरी तरह सील पैक है. वह यह बताती है कि अगर शीशी का ढक्कन कभी न खोला जाए, तो दवा कितने दिन तक सुरक्षित रहेगी. लेकिन जैसे ही सील टूटी, वह छपी हुई तारीख पूरी तरह बेमानी हो जाती है. वहां से सिर्फ तीस दिन का नियम लागू होता है.
डॉक्टर की एक आसान और काम की सलाह
डॉ. शिबल अपने हर मरीज को एक बहुत सीधी सलाह देती हैं.
- जब भी आप बाजार से नई आई ड्रॉप लाएं, तो सील खोलने से पहले उस पर छपी एक्सपायरी डेट चेक करें.
- अगर डेट सही है और आप सील खोल रहे हैं, तो उसी समय एक परमानेंट मार्कर उठाएं.
- शीशी के लेबल पर साफ अक्षरों में वह तारीख लिख दें जिस दिन आपने उसे खोला है.
- आज की तारीख से ठीक एक महीना जोड़ लें और तय तारीख आते ही शीशी को कचरे के डिब्बे में डाल दें.
- कभी भी अपनी याददाश्त पर भरोसा मत करिए, क्योंकि रोजमर्रा की भागदौड़ में किसी को याद नहीं रहता कि शीशी कब खुली थी.
आई ड्रॉप इस्तेमाल करने के कुछ बुनियादी नियम
- तारीख जरूर लिखें: शीशी पर खोलने की तारीख लिखना कभी न भूलें.
- नोजल को छूने से बचें: दवा डालते समय शीशी की नोक को कभी भी अपनी आंख, पलक, हाथ या किसी भी सतह से न छूने दें. थोड़ा ऊपर से ही बूंद टपकाएं.
- प्रिजर्वेटिव-फ्री दवाओं का ध्यान रखें: अगर डॉक्टर ने सिंगल-यूज वायल दी है, तो उसे 24 घंटे से ज्यादा बिल्कुल न रखें.
- अपनी दवा किसी और को न दें: परिवार में भी एक व्यक्ति की इस्तेमाल की हुई आई ड्रॉप दूसरे को नहीं डालनी चाहिए. इससे एक का इंफेक्शन दूसरे को लग सकता है.
- सीधे धूप से बचाएं: दवा को हमेशा ठंडी और साफ जगह पर रखें, तेज धूप या बहुत ज्यादा गर्मी में दवा बहुत जल्दी खराब हो जाती है.
आंखें कुदरत का बहुत अनमोल तोहफा हैं. यह कोई सिरदर्द या बदन दर्द की गोली नहीं है कि पुरानी पड़ी थी तो खा ली. आई ड्रॉप्स को लेकर की गई थोड़ी सी भी लापरवाही जिंदगी भर का पछतावा बन सकती है. इसलिए अगली बार फ्रिज या अलमारी में रखी पुरानी शीशी उठाने से पहले सोचें और अगर एक महीना बीत चुका है, तो उसे तुरंत फेंकने में ही समझदारी है.
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