महिलाओं की सेहत से जुड़ी कई बीमारियां ऐसी होती हैं, जो समय पर पहचान ली जाएं तो पूरी तरह रोकी जा सकती हैं. सर्वाइकल कैंसर भी उन्हीं में से एक है. यह कैंसर गर्भाशय के निचले हिस्से यानी सर्विक्स में होता है और भारत में महिलाओं में पाए जाने वाले आम कैंसरों में शामिल है. सबसे चिंताजनक बात यह है कि जानकारी और जांच की कमी के कारण कई महिलाएं इसे शुरुआती दौर में पकड़ ही नहीं पातीं. जबकि सच्चाई यह है कि अगर सही उम्र में स्क्रीनिंग और वैक्सीनेशन कर ली जाए, तो सर्वाइकल कैंसर से आसानी से बचा जा सकता है.
भंगेल सीएचसी की सीनियर मेडिकल ऑफिसर और गायनेकोलॉजी विशेषज्ञ डॉ. मीरा पाठक के अनुसार, सर्वाइकल कैंसर का खतरा हर उम्र में समान नहीं होता. यह आमतौर पर 35 से 55 साल की महिलाओं में ज्यादा देखा जाता है, लेकिन 40 से 50 साल की उम्र इसकी सबसे ज्यादा संवेदनशील अवधि मानी जाती है. इस उम्र में महिलाओं को अपने शरीर के संकेतों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए, क्योंकि यही समय है जब सही जांच जान बचा सकती है.
किन लक्षणों को बिल्कुल नजरअंदाज न करें
डॉ. पाठक बताती हैं कि सर्वाइकल कैंसर के कुछ लक्षण ऐसे हैं, जिन्हें अक्सर महिलाएं मामूली समझकर टाल देती हैं. जैसे संबंध के बाद ब्लीडिंग होना, जिसे मेडिकल भाषा में पोस्ट कॉइटल ब्लीडिंग कहा जाता है या संबंध के दौरान दर्द महसूस होना. इसके अलावा बिना वजह सफेद पानी आना, पीठ या पेल्विक एरिया में लगातार दर्द भी चेतावनी के संकेत हो सकते हैं. खासतौर पर 40 से 50 साल की उम्र में अगर ऐसे लक्षण दिखें, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.
स्क्रीनिंग बचाव का सबसे मजबूत हथियार
सर्वाइकल कैंसर को रोकने का सबसे असरदार तरीका समय पर स्क्रीनिंग है. इसके लिए सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला टेस्ट है पैप स्मीयर टेस्ट. यह टेस्ट हर उस महिला को कराना चाहिए जो सेक्सुअली एक्टिव हो चुकी है. इसमें सर्विक्स के मुंह से एक छोटा सा सैंपल लिया जाता है, जिससे कैंसर से पहले होने वाले बदलावों का पता चल जाता है. यह टेस्ट हर तीन साल में एक बार कराना चाहिए. अगर 65 साल की उम्र तक लगातार रिपोर्ट नॉर्मल आती रहे, तो इसके बाद यह टेस्ट बंद किया जा सकता है.

एचपीवी डीएनए टेस्ट क्यों है जरूरी
सर्वाइकल कैंसर का सबसे बड़ा कारण ह्यूमन पेपिलोमा वायरस यानी एचपीवी माना जाता है. इसे पहचानने के लिए एचपीवी डीएनए टेस्ट किया जाता है. यह भी सर्विक्स से सैंपल लेकर किया जाता है और यह बताता है कि शरीर में एचपीवी संक्रमण मौजूद है या नहीं. अगर 30 साल की उम्र से यह टेस्ट शुरू किया जाए, तो हर पांच साल में इसे दोहराया जा सकता है. कई बार डॉक्टर पैप स्मीयर और एचपीवी टेस्ट दोनों साथ में कराने की सलाह देते हैं, जिससे खतरे का अंदाजा और साफ हो जाता है.
वैक्सीनेशन से भी संभव है बचाव
एचपीवी वैक्सीन सर्वाइकल कैंसर से बचाव का एक और मजबूत तरीका है. यह वैक्सीन यौन गतिविधि शुरू होने से पहले लगवाना सबसे सुरक्षित माना जाता है, लेकिन डॉक्टर की सलाह से बाद की उम्र में भी इसे लिया जा सकता है. यह वैक्सीन शरीर को एचपीवी वायरस से लड़ने की ताकत देती है.
डॉ. मीरा पाठक का साफ कहना है कि सर्वाइकल कैंसर से डरने की नहीं, समझदारी दिखाने की जरूरत है. हल्की ब्लीडिंग या दर्द को हल्के में न लें. सही उम्र में जांच, स्क्रीनिंग और वैक्सीनेशन ही इस कैंसर को रोकने का सबसे बड़ा और सबसे आसान तरीका है. जागरूकता ही महिलाओं की सबसे बड़ी सुरक्षा है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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