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डीजे की तेज आवाज कितनी खतरनाक? बलरामपुर घटना के बाद ENT एक्सपर्ट ने बताए शरीर पर इसके असर

हाल ही में उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान एक स्कूली छात्रा की तबीयत बिगड़ने और बाद में उसकी मौत की घटना ने इस विषय को फिर चर्चा में ला दिया है. इस घटना ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या बहुत तेज आवाज इंसान की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है?

बलरामपुर में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान एक बच्ची की तबीयत बिगड़ने की घटना ने तेज आवाज और डीजे के शोर को लेकर नई बहस छेड़ दी है. क्या बहुत तेज आवाज सिर्फ कानों को नुकसान पहुंचाती है या दिल और दिमाग पर भी असर डाल सकती है? यथार्थ हॉस्पिटल की ENT विशेषज्ञ डॉ. बुलबुल गुप्ता से जानिए इस बारे में क्या कहता है मेडिकल साइंस.

त्योहारों और जुलूसों के दौरान तेज आवाज में डीजे बजना अब आम बात हो गई है. कई लोग इसे सिर्फ मनोरंजन का हिस्सा मानते हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि बहुत ज्यादा तेज आवाज हमारे शरीर पर कितना असर डाल सकती है? 

हालांकि यह साफ करना जरूरी है कि उपलब्ध जानकारियों के आधार पर बच्ची की मौत का कारण अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है. मेडिकल जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट के बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचना सही नहीं होगा. लेकिन इस घटना ने एक अहम सवाल जरूर खड़ा किया है कि क्या बहुत तेज आवाज इंसान की सेहत को गंभीर नुकसान पहुंचा सकती है?

यथार्थ हॉस्पिटल मॉडल टाउन, दिल्ली की डायरेक्टर और एचओडी (ईएनटी) डॉ. बुलबुल गुप्ता कहती हैं कि अत्यधिक तेज आवाज शरीर और दिमाग दोनों पर असर डाल सकती है. खासकर जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक या अचानक बहुत ज्यादा ध्वनि के संपर्क में आए.

तेज आवाज से शरीर में बढ़ सकता है तनाव

डॉ. बुलबुल गुप्ता के अनुसार, जब हम बहुत तेज आवाज सुनते हैं तो शरीर उसे एक तरह के खतरे की तरह महसूस कर सकता है. इस स्थिति में शरीर का तनाव तंत्र सक्रिय हो जाता है. इससे तनाव वाले हार्मोन बढ़ सकते हैं और दिल की धड़कन पर भी असर पड़ सकता है.

• धड़कन तेज हो सकती है.
 • ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है.
 • घबराहट महसूस हो सकती है.
 • बेचैनी और तनाव बढ़ सकता है.

जिन लोगों को पहले से हाई ब्लड प्रेशर, दिल की बीमारी या अन्य स्वास्थ्य समस्याएं हैं, उनके लिए स्थिति और ज्यादा गंभीर हो सकती है. यही वजह है कि डॉक्टर सार्वजनिक आयोजनों में ध्वनि की सीमा का ध्यान रखने की सलाह देते हैं.

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कानों पर सबसे पहले पड़ता है असर

तेज आवाज का सबसे सीधा प्रभाव हमारे कानों पर पड़ता है. कान के अंदर बहुत नाजुक कोशिकाएं होती हैं जो सुनने में मदद करती हैं. जब आवाज बहुत ज्यादा होती है तो इन कोशिकाओं को नुकसान पहुंच सकता है.

कई बार लोग किसी शादी, जुलूस या पार्टी से लौटने के बाद महसूस करते हैं कि कान में सीटी जैसी आवाज आ रही है या आवाज साफ सुनाई नहीं दे रही. इसे सामान्य समझकर नजरअंदाज कर दिया जाता है, लेकिन बार-बार ऐसा होना नुकसान का संकेत हो सकता है.

• सुनाई कम देना.
 • कान में घंटी या सीटी बजना.
 • कान भारी लगना.
 • सुनने की क्षमता पर स्थायी असर पड़ना.

डॉ. गुप्ता बताती हैं कि कुछ मामलों में नुकसान स्थायी भी हो सकता है, इसलिए सावधानी बेहद जरूरी है.

बच्चों और बुजुर्गों को ज्यादा खतरा

हर व्यक्ति पर तेज आवाज का असर एक जैसा नहीं होता. छोटे बच्चों, बुजुर्गों और पहले से बीमार लोगों पर इसका प्रभाव ज्यादा हो सकता है.

बच्चों के शरीर और तंत्रिका तंत्र का विकास अभी चल रहा होता है. इसलिए बहुत अधिक शोर उन्हें परेशान कर सकता है. वहीं बुजुर्गों में पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याएं तेज आवाज के असर को बढ़ा सकती हैं.

यही कारण है कि स्कूल, अस्पताल, वृद्धाश्रम और रिहायशी इलाकों के आसपास ध्वनि प्रदूषण को नियंत्रित रखना बेहद जरूरी माना जाता है.

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कब हो जाना चाहिए सतर्क?

अगर किसी व्यक्ति को तेज आवाज के बीच अचानक कोई परेशानी महसूस हो तो उसे तुरंत शांत जगह पर ले जाना चाहिए. कई बार लोग लक्षणों को मामुली समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जो गलती हो सकती है.

इन संकेतों को हल्के में न लें:

• चक्कर आना.
 • सांस लेने में परेशानी.
 • सीने में दर्द.
 • अचानक घबराहट होना.
 • बेहोशी जैसा महसूस होना.
 • दिल की धड़कन असामान्य लगना.

ऐसी स्थिति में जल्द से जल्द डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

क्या सिर्फ तेज आवाज से मौत हो सकती है?

यह सवाल इस समय सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है. डॉ. बुलबुल गुप्ता कहती हैं कि किसी भी व्यक्ति की मौत को केवल तेज आवाज से जोड़ना वैज्ञानिक तौर पर तब तक सही नहीं माना जा सकता, जब तक मेडिकल जांच से इसकी पुष्टि न हो जाए.

बलरामपुर की घटना में भी वास्तविक कारण का पता जांच और मेडिकल रिपोर्ट आने के बाद ही चल सकेगा. इसलिए किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों का इंतजार करना जरूरी है.

बड़े आयोजनों में जरूरी है जिम्मेदारी

त्योहार हमारी संस्कृति का हिस्सा हैं और उत्सव मनाना सभी को पसंद है. लेकिन खुशी मनाने का मतलब यह नहीं कि लोगों की सेहत को खतरे में डाल दिया जाए. सार्वजनिक कार्यक्रमों में ध्वनि की तय सीमा का पालन करना बहुत जरुरी है. कई बार लोग यह सोचकर डीजे की आवाज बढ़ा देते हैं कि इससे माहौल बेहतर बनेगा, लेकिन इसका असर आसपास मौजूद बच्चों, बुजुर्गों और मरीजों पर पड़ सकता है.

बलरामपुर की घटना ने एक बार फिर हमें यह सोचने पर मजबूर किया है कि ध्वनि प्रदूषण को हल्के में नहीं लेना चाहिए. थोड़ी सी सावधानी और जिम्मेदारी कई लोगो की सेहत को सुरक्षित रख सकती है. आखिर त्योहार का असली मकसद खुशियां बांटना है, परेशानी बढ़ाना नहीं.

FAQs-

Q. क्या डीजे की तेज आवाज से सुनने की क्षमता कम हो सकती है? 
A. हां, लगातार तेज आवाज के संपर्क में रहने से सुनने की क्षमता प्रभावित हो सकती है.

Q. टिनिटस क्या होता है? 
A. कानों में घंटी, भिनभिनाहट या सीटी जैसी आवाज सुनाई देना टिनिटस कहलाता है.

Q. बच्चों पर तेज आवाज का क्या असर पड़ता है? 
A. बच्चों में तनाव, घबराहट और सुनने की क्षमता पर असर पड़ सकता है.

Q. कितनी तेज आवाज खतरनाक मानी जाती है? 
A. 85 डेसिबल से अधिक आवाज के लंबे संपर्क से नुकसान का खतरा बढ़ सकता है.

Q. तेज आवाज सुनने के बाद कान भारी लगें तो क्या करें? 
A. शोर वाली जगह से दूर जाएं और जरूरत पड़ने पर ENT विशेषज्ञ से सलाह लें.

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