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क्या डायलिसिस की जरूरत होगी कम? वैज्ञानिकों ने बनाई इंप्लांटेबल आर्टिफिशियल किडनी ‘हॉली’

हॉली नाम की इंप्लांटेबल आर्टिफिशियल किडनी किडनी फेलियर मरीजों के लिए नई उम्मीद बन सकती है. जानिए यह कैसे काम करेगी और डायलिसिस से कितनी अलग है.

क्या डायलिसिस की जरूरत होगी कम? वैज्ञानिकों ने बनाई इंप्लांटेबल आर्टिफिशियल किडनी ‘हॉली’
Artificial Kidney 'Holly': क्या डायलिसिस का विकल्प बन सकती है नई तकनीक?
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किडनी फेलियर के मरीजों को अक्सर हफ्ते में कई बार डायलिसिस कराना पड़ता है, जिससे उनकी रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो सकती है. अब वैज्ञानिक 'हॉली' नाम की एक इंप्लांटेबल आर्टिफिशियल किडनी विकसित कर रहे हैं, जिसे शरीर के अंदर लगाया जा सकेगा. अगर यह तकनीक ह्यूमन ट्रायल में सफल रहती है, तो भविष्य में यह डायलिसिस और किडनी रिप्लेसमेंट ट्रीटमेंट के क्षेत्र में बड़ा बदलाव ला सकती है.

क्या है हॉली आर्टिफिशियल किडनी?

आम डायलिसिस में मरीज के शरीर के बाहर मौजूद मशीन खून से वेस्ट और अतिरिक्त फ्लूइड को हटाती है. इसके लिए मरीज को हफ्ते में कई बार डायलिसिस सेंटर जाना पड़ता है. हर सेशन में काफी समय लग सकता है. हॉली का तरीका इससे अलग है.

इसे सर्जरी के जरिए शरीर के अंदर लगाया जाना है. यह पेल्विस में मौजूद ब्लड वेसल्स से जुड़ा रहेगा और लगातार खून से वेस्ट हटाने के लिए काम करेगा. स्वस्थ किडनी भी दिन-रात लगातार खून को फिल्टर करती है. हॉली को भी इसी तरह लगातार काम करने के मकसद से तैयार किया जा रहा है.

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यह किडनी की तरह कैसे काम करेगी?

अभी डायलिसिस कराने वाले मरीजों को जरूरत के मुताबिक सप्ताह में दो या तीन बार डायलिसिस सेंटर जाना पड़ता है. इससे उनके काम, यात्रा और रोजमर्रा के दूसरे काम प्रभावित हो सकते हैं. जबकि हॉली शरीर के अंदर रहकर पूरे दिन खून को फिल्टर कर सकता है.

डायलिसिस से यह तकनीक कितनी अलग है?

शरीर से अतिरिक्त पानी निकालने के लिए रात में जरूरत के मुताबिक एक बेडसाइड सिस्टम का इस्तेमाल किया जा सकता है. अगर यह तकनीक सुरक्षित और असरदार साबित होती है तो मरीजों को दिन के समय काम करने, यात्रा करने और सामान्य गतिविधियां जारी रखने में ज्यादा सुविधा मिल सकती है.

किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए क्यों अहम है?

हॉली का फायदा सिर्फ इतना नहीं होगा कि मरीजों को बार-बार डायलिसिस सेंटर न जाना पड़े. अगर यह तकनीक सफल होती है तो किडनी ट्रांसप्लांट का इंतजार कर रहे मरीजों के लिए भी यह मददगार हो सकती है. यानी ट्रांसप्लांट होने तक हॉली किडनी का काम संभालने में मदद कर सकता है. उन मरीजों के लिए भी आगे चलकर इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, जिनका किडनी ट्रांसप्लांट नहीं हो सकता. हालांकि, इसके लिए ह्यूमन ट्रायल के नतीजों का इंतजार करना होगा. 

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भारत में किडनी फेलियर मरीजों को इससे क्या फायदा हो सकता है?

भारत में किडनी की बीमारी और किडनी फेलियर के मामले बढ़ रहे हैं. वहीं डायलिसिस और किडनी ट्रांसप्लांट की सुविधा हर मरीज तक आसानी से नहीं पहुंच पाती. ऐसे में शरीर के अंदर लगातार काम करने वाला आर्टिफिशियल किडनी सिस्टम डायलिसिस सेंटर पर दबाव कम करने और किडनी रिप्लेसमेंट ट्रीटमेंट को ज्यादा आसानी से उपलब्ध कराने में मदद कर सकता है.

अगर ये नया तरीका आगे के ह्यूमन ट्रायल में यह सुरक्षित और असरदार साबित होता है, तो किडनी फेलियर के इलाज का तरीका बदलने की दिशा में यह एक अहम कदम हो सकता है.

क्या अभी मरीज इसका इस्तेमाल कर सकते हैं?

हॉली एक इंप्लांटेबल आर्टिफिशियल किडनी है, जिसे शरीर के अंदर लगाने के लिए विकसित किया जा रहा है. इसका उद्देश्य स्वस्थ किडनी की तरह लगातार खून से वेस्ट पदार्थों को फिल्टर करना है. हालांकि यह तकनीक अभी रिसर्च और ह्यूमन ट्रायल के चरण में है और फिलहाल इलाज के रूप में उपलब्ध नहीं है.

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