हिंदू धर्म में पितृपक्ष को पूर्वजों के स्मरण, तर्पण और श्राद्ध का विशेष समय माना जाता है. इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मा की शांति और आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए पूजा-पाठ, दान और श्राद्ध कर्म करते हैं. ऐसी मान्ता है कि पितृपक्ष के 16 दिनों में खानपान को लेकर भी विशेष नियमों का पालन करना चाहिए. इन्हीं कारणों से इस समय कुछ दालों और खानपान का सेवन वर्जित माना गया है. यहां जानते हैं पितृपक्ष या श्राद्ध के दिनों में कौन सी दाल नहीं खानी चाहिए?
मसूर की दाल खाना है वर्जित
पितृपक्ष में सबसे अधिक जिस दाल के सेवन से बचने की बात आती है, वो मसूर दाल है. धार्मिक ग्रंथों और परंपराओं में इसे श्राद्ध कर्म के लिए उपयुक्त नहीं माना गया है. मान्यता है कि मसूर की दाल में तामसिक गुण अधिक होते हैं, जो पितरों को समर्पित सात्विक वातावरण के अनुरूप नहीं माने जाते. कई जगहों पर श्राद्ध भोजन में मसूर का उपयोग पूरी तरह वर्जित माना जाता है.
उड़द की दाल खाना है मना
उड़द की दाल का सेवन भी अनेक परिवारों और क्षेत्रों में पितृपक्ष के दौरान नहीं किया जाता. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार उड़द को तामसिक प्रवृत्ति वाला माना जाता है. इसलिए श्राद्ध और तर्पण जैसे कार्यों के दौरान सात्विक भोजन को प्राथमिकता दी जाती है और उड़द की दाल से दूरी बनाई जाती है. बिहार, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के कई हिस्सों में यह परंपरा आज भी प्रचलित है.
पितृपक्ष में न खाएं चना दाल
पितृपक्ष में चना दाल, चने और सत्तू के सेवन से भी कई लोग परहेज करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में खाना ऐसा होना चाहिए जो पूरी तरह से सात्विक और पितरों को अर्पित करने योग्य माना जाए. इसी वजह से कारण चना दाल को भी वर्जित फूड्स की लिस्ट में रखा गया है.
पितृपक्ष में क्या खाएं?
पितृपक्ष में आमतौर पर मूंग दाल, चावल, जौ, तिल, दूध, दही, घी, खीर, लौकी, परवल जैसे सात्विक सात्विक चीजों का सेवन करने की सलाह दी जाती है. साथ ही प्याज, लहसुन, मांसाहार और शराब भी वर्जित माना गया है.
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