स्ट्रोक आने के बाद मरीज जब अस्पताल से घर आ जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं होता कि वह पूरी तरह ठीक हो गया है. इसके बाद भी नॉर्मल होने में काफी टाइम लग जाता है. ऐसे में फिजियोथेरेपी बहुत काम आती है, क्योंकि इससे चलने-फिरने में आसानी होती है, बैलेंस बनता है और मरीज का खोया हुआ कॉन्फिडेंस भी वापस लौटने लगता है.
परेशानी तब होती है जब घरवाले प्यार और जल्दबाजी में कुछ ऐसी गलतियां कर बैठते हैं, जिससे मरीज की रिकवरी की रफ्तार धीमी पड़ जाती है. डॉ. धरम पांडे का कहना है कि जानकारी न होने की वजह से कई बार ऐसा हो जाता है. आइए जानते हैं कि वे कौन सी बातें हैं जिनका ध्यान रखना चाहिए:
देरी से फिजियोथेरेपी शुरू करना:
कई बार जब मरीज थोड़ा-बहुत चलने लगता है, तो घरवाले सोचते हैं कि अब डॉक्टर या फिजियोथेरेपिस्ट की कोई जरूरत नहीं है. यहीं पर गड़बड़ हो जाती है. डॉक्टर जितनी जल्दी मरीज को देख लें, उतना ही अच्छा रहता है. इससे यह पता चल जाता है कि शरीर को किस तरह की एक्सरसाइज की जरूरत है.
जल्दबाजी में बड़े सुधार की उम्मीद करना:
हर मरीज की बॉडी अलग होती है. किसी को फायदा जल्दी मिल जाता है, तो किसी को महीनों लग जाते हैं. कई बार ऐसा भी होता है कि हफ्तों तक कोई प्रोग्रेस नहीं दिखती. ऐसे में घबराना नहीं चाहिए और न ही मरीज की तुलना किसी दूसरे मरीज से करनी चाहिए, इससे सिर्फ टेंशन बढ़ती है.
ये वीडियो भी देखें:
बिना जाने-समझे खुद एक्सरसाइज करवाना:
मरीज की मदद करने के चक्कर में कई बार घरवाले खुद ही उसे एक्सरसाइज कराने लगते हैं. याद रखिए, हर मरीज की हालत अलग होती है. किस मरीज को कौन सी एक्सरसाइज करानी है और उसका सही तरीका क्या है, यह एक एक्सपर्ट ही बेहतर बता सकता है. गलत तरीके से कराई गई एक्सरसाइज फायदे की जगह नुकसान कर सकती है.
सिर्फ एक हिस्से पर फोकस करना:
रिहैब का मतलब सिर्फ हाथ या पैर हिलाना नहीं होता. इसमें मरीज को बैठना, उठना, बैलेंस बनाना और रोजमर्रा के छोटे-मोटे काम खुद करना सिखाना भी शामिल है. शरीर के हर हिस्से पर ध्यान देना जरूरी है.
थोड़ा सुधार दिखते ही फिजियोथेरेपी बंद कर देना:
यह बहुत आम गलती है, जैसे ही मरीज के हाथ-पैर में थोड़ी सी हलचल दिखने लगती है, घरवालों को लगता है कि मरीज अब पूरी तरह ठीक हो रहा है और वे फिजियोथेरेपी रुकवा देते हैं. जबकि सच यह है कि इस दौर में रेगुलर रहना सबसे ज्यादा जरूरी होता है.
शुरुआत में ही बहुत ज्यादा जोर डलवाना:
घरवाले सोचते हैं कि मरीज जितनी ज्यादा मेहनत करेगा, उतनी जल्दी ठीक होगा पर ऐसा नहीं है. जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करवाने से मरीज जल्दी थक जाता है और थकावट की वजह से वह ढंग से एक्सरसाइज कर भी नहीं पाता. इसलिए आराम भी उतना ही जरूरी है जितना काम.
मरीज के मूड और स्वभाव में आए बदलाव को अनदेखा करना:
स्ट्रोक का असर सिर्फ शरीर पर नहीं, दिमाग और मूड पर भी पड़ता है. कई बार मरीज चिड़चिड़ा हो जाता है या उसका काम करने का मन नहीं करता. इसे उसकी जिद न समझें. डॉक्टर से बात करके समझें कि ऐसा क्यों हो रहा है और उस हिसाब से पेश आएं.
लेखक के बारे में :
डॉ. धरम पी. पांडे एक अनुभवी फिजियोथेरेपिस्ट और न्यूरो-रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ हैं, जो स्ट्रोक रिहैबिलिटेशन, स्पाइनल कॉर्ड इंजरी और न्यूरोलॉजिकल रिहैबिलिटेशन में विशेषज्ञता रखते हैं. उन्होंने 1999 में नई दिल्ली में क्लिनिकल प्रैक्टिस शुरू की और पिछले 25 वर्षों से भारत में फिजियोथेरेपी और रिहैबिलिटेशन साइंस को आगे बढ़ाने के लिए समर्पित हैं.
इसे भी पढ़ें: तंदूर के बिना घर पर बनाएं होटल जैसी गार्लिक नान, ये है सबसे आसान तरीका
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं