विज्ञापन

Sant ki Seekh: जब हम सुनना सीखते हैं, तभी शुरू होता है शांति का सफर

हर मनुष्य खुद शांति और प्रसन्नता चाहता है. जब कोई राष्ट्र या समाज युद्ध के लिए उन्मुख होता है तो अधिकांश स्थितियों में उसके पीछे स्वयं की स्वतंत्रता, समृद्धि और शांति की सुरक्षा का भाव छिपा होता है.

Sant ki Seekh: जब हम सुनना सीखते हैं, तभी शुरू होता है शांति का सफर
संत की सीख
Photo Credit: NDTV

युद्ध केवल रणभूमि में नहीं जन्म लेता. उसकी शुरुआत मनुष्य के भीतर पनपने वाले भय, असुरक्षा, घृणा और अलगाव की भावना से होती है. जब हम दूसरे व्यक्ति, समुदाय या राष्ट्र को खुद से अलग और खतरे के रूप में देखने लगते हैं, तब संघर्ष की नींव पड़ती है. यही मानसिकता आगे चलकर हिंसा और युद्ध का रूप ले लेती है.

क्या हम नकारात्मकता और युद्ध से बच नहीं सकते? क्या यह जीवन का हिस्सा है?

हर मनुष्य खुद शांति और प्रसन्नता चाहता है. जब कोई राष्ट्र या समाज युद्ध के लिए उन्मुख होता है तो अधिकांश स्थितियों में उसके पीछे स्वयं की स्वतंत्रता, समृद्धि और शांति की सुरक्षा का भाव छिपा होता है. जिस प्रकार फव्वारे का पानी ऊपर की ओर बहता है किन्तु थोड़ी ही देर बाद वह पुनः अपनी स्वाभाविक प्रकृति में लौटकर नीचे की ओर बहना शुरू कर देता है उसी तरह युद्ध भी मनुष्यता को थोड़े समय के लिए उसकी मूल प्रकृति से विमुख कर देता हैं किंतु मनुष्य के भीतर छिपी गहन शांति और आनंद की प्राप्ति की आकांक्षा को क्षीण नहीं कर पाता. स्थायी शांति के लिए मनुष्य की मानसिकता में परिवर्तन आवश्यक है. जब तक भीतर परिवर्तन नहीं आता, तब तक बाहरी दुनिया में स्थायी शांति स्थापित करना कठिन है. व्यक्तिगत आंतरिक शांति ही विश्व शांति का आधार है.

शांति और सक्रियता का सही संतुलन

शांति का अर्थ आलस्य व निष्क्रियता नहीं है और सक्रियता का अर्थ उग्रता या बेचैनी नहीं है. हम इन दोनों चरम सीमाओं में चले जाते हैं जब हम सक्रिय होते हैं तो हममें जागरूकता का अभाव होता है. हम अपने सोचने और समझने की क्षमता का सही उपयोग नहीं कर पाते हैं. जब हम शांत और जागरूक होते हैं तो गतिशीलता का अभाव होता है. वास्तव में, शांति तभी हो सकती है जब कोई गतिशील हो और साथ ही जागरूक हो, जब वे कार्य करें और प्रतिक्रिया न करें. प्रतिक्रिया से पछतावा होता है, और पछतावा न केवल व्यक्ति को नुकसान पहुंचाता है, बल्कि यह सामाजिक व्यवस्था में भी अशांति का कारण बन जाता है.

असुरक्षा की भावना

कई बार युद्ध के पीछे मूल कारण के रूप में असुरक्षा की भावना होती है. दो समुदाय या राष्ट्र एक दूसरे को अपने अस्तित्व के लिए एक संभावित खतरे के रूप में देखने लगते हैं. युद्ध के निर्णय के पीछे विभिन्न मानवीय भावनाएं और प्रवृत्तियां कार्य करती हैं जैसे असुरक्षा, अहंकार, महत्वाकांक्षा, स्वार्थ आदि. एक बार यदि युद्ध या संघर्ष शुरू हो जाता है तो संबंधित पक्ष यह नहीं जानते कि उसे कैसे रोकना है. कई बार लोग ऐसी बातों को कह देते हैं जिन पर वो स्वयं भी पूरी तरह विश्वास नहीं करते हैं किन्तु जब एक बार वह कोई बात कह देते हैं या निर्णय ले लेते हैं तो उन्हें अपनी छवि बनाए रखने के लिए उस पर अडिग रहना होता है. यह सब कुछ एक बेहद जटिल स्थिति का निर्माण करता है.

संघर्ष समाधान के प्रयास और शांति वार्ता

शांति वार्ता और संघर्ष समाधान के लिए प्रयास न्याय को त्याग या किसी बुरे व्यक्ति या संगठन को मंच देना नहीं है. शांति वार्ता हार मानने या विजय प्राप्त कर लेने की प्रक्रिया भी नहीं है. यह तो एक साझा मंच खोजने का प्रयास है जहां पर सभी पक्ष साथ मिलकर अपने मतभेदों को दूर कर शांति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं.

संवाद का मतलब झुकना नहीं, समझना है

संवाद का अर्थ किसी की विचारधारा या दृष्टिकोण के आगे झुकना नहीं है. संवाद केवल दूसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण को समझना है. संवाद के लिए दोनों पक्षों की ओर से ईमानदारी की आवश्यकता है. यदि कोई भी एक पक्ष ईमानदार नहीं है तो संवाद अपना अर्थ खो देता है. जब आप संवाद करते हैं तो केवल यही बात महत्व नहीं रखती कि आप क्या कहते हैं बल्कि इससे अधिक महत्वपूर्ण यह होता है कि आपकी उपस्थिति का अन्य पक्षों पर क्या प्रभाव पड़ता है. विश्वास शब्दों से परे, शब्दों से भी बढ़कर है.

संवेदनशीलता और समझदारी दोनों हैं जरूरी

संवाद में संवेदनशीलता और समझदारी दोनों आवश्यक है. दोनों के उचित संतुलन के अभाव में सं द विफल हो सकता है. समय एक बड़ा कारक है. आपको लोगों को विचारों से नहीं भरना चाहिए. आप उन्हें विचार देते हैं और कुछ समय छोड़ देते हैं. अदालतों में भी यही किया जाता है न्यायाधीश तुरंत ही कोई निर्णय नहीं सुनाते हैं वे दोनों पक्षों को और फिर से विचार करने का समय और अवसर देते हैं. भारत का अयोध्या विवाद का समाधान या फिर कोलाबिंया का संघर्ष अथवा नक्सली हिंसा का अंत एक सफल संवाद द्वारा शांति की पुर्नस्थापना का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं.

आध्यात्मिक उत्थान और व्यापक दृष्टिकोण

मूल रूप से हर कोई एक मनुष्य है. राष्ट्र कोई गैर-मानवीय वस्तु नहीं है, वह भी मनुष्यों का ही समूह है. मनुष्यों की बातचीत, सोच, व्यवहार, वे किस चेतना की स्थिति से कार्य कर रहे हैं, यह बहुत बड़ा अंतर पैदा करता है. युद्ध और संघर्ष का कारण बनने वाली मुख्य प्रवृत्तियां जैसे एक-दूसरे से आगे निकलने की प्रवृत्ति, खुद को ऊपर रखने की भूमिका और अहंकार जैसी सभी दुर्भाग्यपूर्ण प्रवृत्तियां समाज के उचित आध्यात्मिक उत्थान के बिना दूर नहीं हो सकतीं. अगर किसी समाज या राष्ट्र के लोग व्यापक दृष्टिकोण और मानवता पूर्ण दृष्टि का अनुसरण करते हैं तो यह विश्व शांति और मानवीय चेतना के उत्थान के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण कदम होगा. वसुधैव कुटुम्बकं अर्थात पूरे विश्व को अपना परिवार मानना, एकत्व व अपनेपन का भाव अनुभव करना विश्व शांति के लिए अत्यंत आवश्यक है.

यह भी पढ़ें: Sant ki Seekh: श्री श्री रविशंकर ने बताया सुख की स्थिति बदलती रहती हैं, जानिए कैसे

यह भी पढ़ें: Sant Ki Seekh: प्रेम को पाने के बाद भी आखिर जीवन में क्यों आता है दुख?

पूरी स्टोरी पढ़ें

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Sri Sri Ravishankar
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com