कामवासना सहज और प्राकृतिक है. अपने-आप में इसमें कुछ भी गलत नहीं है. किंतु जब यह हमारे विवेक और व्यवहार को नियंत्रित करने लगे, तब यह स्वयं हमारे लिए और दूसरों के लिए दुःख का कारण बन सकती है. भूख और कामेच्छा मानव शरीर के बहुत पुराने संस्कारों में से हैं. केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी और अन्य जीव-जंतु भी अपने जीवन-चक्र में इन दोनों प्रवृत्तियों से होकर गुजरते हैं. जीवन की विकास-यात्रा में हमारा मन और शरीर इन संस्कारों को धारण करते आए हैं. संसार की उत्पत्ति और उसके संचालन में काम-शक्ति का अपना योगदान है.
मन की प्रवृत्ति है कि वह जिस विषय पर केंद्रित होता है, उसे प्राप्त करना चाहता है. कामुक साहित्य और कामुक दृश्यों को बार-बार देखने से कामवासना प्रबल होती है. जब कामना अत्यधिक बढ़ जाती है, तब उसकी पूर्ति न होने पर निराशा और क्रोध उत्पन्न हो सकते हैं. कई बार उसकी पूर्ति हो जाने के बाद भी मन शांत नहीं होता; वह फिर किसी नई इच्छा के पीछे दौड़ने लगता है. इस प्रकार अनियंत्रित कामना अंततः अशांति को जन्म देती है. काम से क्रोध का जन्म होता है.
जब कामना आसक्ति बन जाए
जो व्यक्ति काम के प्रति अत्यधिक आसक्त हो जाते हैं, उनके भीतर धीरे-धीरे एक प्रकार की नीरसता और जड़ता आने लगती है. अत्यधिक काम-आसक्ति व्यक्ति की सहजता, संवेदनशीलता और दूसरों के साथ स्वस्थ संबंध बनाने की क्षमता को प्रभावित करती है. उसका मन संकुचित होने लगता है.
काम की अति अपने साथ ईर्ष्या, कुंठा और अनेक प्रकार की नकारात्मकताएँ लेकर आती है. व्यक्ति का मनोबल और उसकी प्राण-शक्ति क्षीण होने लगती है. उसकी प्रतिबद्धता और कार्यक्षमता भी कम होने लगती हैं. यहाँ तक कि जीवन की छोटी-छोटी घटनाओं में प्रसन्नता और प्रकृति के सौंदर्य का अनुभव करने की उसकी क्षमता भी धीरे-धीरे समाप्त होने लगती है.
कामवासना को कैसे संतुलित करें?
सबसे पहले अश्लील या अत्यधिक उत्तेजक सामग्री से दूरी बनाएं. ऐसी सामग्री मन की दृष्टि, संवेदनशीलता और विचार-प्रक्रिया को प्रभावित करती है तथा कामुक विचारों को बार-बार उभारती है. मन जिस प्रकार का प्रभाव ग्रहण करता है, उसी प्रकार के विचार उसमें उठने लगते हैं.
जब प्रेम गहरा होता है, तब कामना का आग्रह स्वाभाविक रूप से क्षीण होने लगता है. प्रेम आपको केवल शरीर तक सीमित नहीं रखता. वह आपको दूसरे व्यक्ति के अस्तित्व, उसकी भावनाओं और उसकी गरिमा के प्रति संवेदनशील बनाता है.
जीवन में किसी महत्त्वपूर्ण कार्य और निश्चित लक्ष्य का होना भी आवश्यक है. जब आपके सामने कोई बड़ा उद्देश्य होता है, तब मन की ऊर्जा उसी दिशा में प्रवाहित होने लगती है. किसी उच्चतर और महत्त्वपूर्ण उद्देश्य के लिए कार्य करने पर कामवासना आपको अधिक नहीं सताती.
रचनात्मकता भी ऊर्जा को एक सुंदर दिशा देती है. जब आप संगीत, नृत्य, चित्रकला या किसी अन्य रचनात्मक कार्य में स्वयं को व्यस्त रखते हैं, तब वही ऊर्जा सृजन के रूप में अभिव्यक्त होने लगती है. इसी प्रकार खेल-कूद, योग, जिम्नास्टिक और नियमित शारीरिक व्यायाम से शरीर की ऊर्जा को स्वस्थ दिशा मिलती है. इससे व्यक्ति अधिक संतुलित, प्रसन्न और सहज अनुभव करता है.
प्राणायाम और ध्यान के द्वारा हमारी प्राण-ऊर्जा को एक उच्च आयाम प्राप्त होता है. इस उच्च आयाम से मिलने वाली प्रसन्नता, आनंद और संतुष्टि सहज रूप से कामवासना के अत्यधिक आग्रह को क्षीण कर देती है.
सुख की परिभाषा बदलती रहती है
सामान्यतः काम-कृत्य को प्रसन्नता और सुख के साथ जोड़कर देखा जाता है. किंतु सुख की परिभाषा व्यक्ति की आयु, अवस्था और परिस्थिति के अनुसार बदलती रहती है. इस संबंध में एक रोचक कहानी है. एक बार एक पत्रकार ने जानना चाहा कि लोगों को खुशी किस बात से मिलती है. वह सबसे पहले एक छोटे बच्चे के पास गया. बच्चे ने बताया कि उसे खेलने और चॉकलेट और मिठाई खाने में खुशी मिलती है.
फिर पत्रकार एक युवक के पास गया. युवक ने कहा कि उसे रोमांचक कार्यों, विवाह और सुंदर स्त्रियों में खुशी दिखाई देती है. अंत में पत्रकार एक वृद्ध व्यक्ति के पास पहुंचा. वृद्ध ने कहा, “मुझे कब्ज की समस्या है. इसके कारण बेचैनी रहती है और मैं ठीक से खा भी नहीं पाता. जिस दिन मेरा पेट साफ होता है और मुझे गहरी नींद आती है, उस दिन मुझे बहुत सुख और खुशी मिलती है.”
इसलिए सुख की परिभाषा जीवनभर एक-सी नहीं रहती. जो बात एक अवस्था में अत्यंत महत्त्वपूर्ण लगती है, दूसरी अवस्था में उसका महत्त्व अपने-आप कम हो जाता है. कामवासना लगभग दस या बारह वर्ष की आयु से आरंभ होकर जीवन के कुछ निश्चित वर्षों तक हमें प्रभावित करती है. जीवन के प्रारंभिक काल में जब हमें इसका कोई बोध नहीं था, तब भी हमारा अस्तित्व पूर्ण था और हमारे व्यक्तित्व के अनेक सुंदर एवं महत्त्वपूर्ण पहलू थे. वृद्धावस्था में कामवासना के क्षीण हो जाने पर भी हमारा अस्तित्व पूर्ण बना रहता है. हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि कामवासना का प्रभाव जीवन के कुछ नियत वर्षों तक ही रहता है, जबकि हमारा समग्र अस्तित्व उससे कहीं अधिक विशाल है. इस प्रभाव के कम हो जाने पर भी हमारे व्यक्तित्व के अनेक महत्त्वपूर्ण पहलू शेष रहते हैं, जो पहले से अधिक शुभ और उज्ज्वल हो सकते हैं.
कामवासना सहज और प्राकृतिक है; इसमें कुछ भी गलत नहीं है. किंतु जब यह हमारे नियंत्रण से बाहर हो जाती है, तब यह हमारे और अन्य लोगों के लिए दुःख का कारण बन सकती है. इसका दमन करना भी उचित नहीं है और इसे अनावश्यक रूप से प्रोत्साहित करना भी उचित नहीं है.
योग, प्राणायाम, ध्यान, श्वास-साधना तथा नियमित और संयमित दिनचर्या के माध्यम से प्रकृति की इस शक्ति को सृजनात्मक दिशा दी जा सकती है. यही ऊर्जा जब किसी उच्चतर और सात्त्विक उद्देश्य की ओर प्रवाहित होती है, तब वह जीवन में उत्साह, आनंद और विस्तार लेकर आती है.
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