क्या आपने कभी सुना है कि सृष्टि के पालनहार खुद माता का रूप धर लें और संतान के जन्म की प्रसव पीड़ा सहें? सुनने में यह जितना हैरान करने वाला लगता है, आस्था और भक्ति की दुनिया में उतना ही अलौकिक और भावुक भी है. जब पूरी दुनिया नंदलाल के जन्मोत्सव की तैयारियों में जुटी होती है, ठीक उससे एक शाम पहले पुरी के जगन्नाथ मंदिर में एक ऐसा गुप्त और अनोखा अनुष्ठान होता है, जो हर भक्त के रोंगटे खड़े कर दे. इस विशेष अनुष्ठान को कहा जाता है 'गर्भोदक बंदापना नीति'. यानी अनुष्ठान में भगवान जगन्नाथ गर्भधारण करते हैं और अपने गर्भ से बाल गोपाल को जन्म देते हैं. भगवान जगन्नाथ मंदिर के पुजारी बृजमोहन पंडित ने एनडीटीवी इंडिया को जन्माष्टमी की एक शाम पहले होने वाली इस अनोखे अनुष्ठान के बारे विस्तार से बताया.
भगवान जगन्नाथ क्यों करते हैं गर्भधारण?
शास्त्रों में स्पष्ट है कि महाप्रभु जगन्नाथ केवल एक अवतार नहीं, बल्कि साक्षात परब्रह्म और 'अवतारी' हैं. यानी वो मूल स्रोत, जिनसे प्रभु के दसों अवतार प्रकट हुए हैं. स्कंद पुराण और वामदेव संहिता गवाह हैं कि द्वापर में पांडवों संग भगवान श्रीकृष्ण और त्रेता में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम, दोनों स्वयं महाप्रभु के दर्शन करने पुरी धाम आए थे. अब सवाल उठता है कि जब जगत के पालनहार को ही जन्म लेना है, तो माता का स्थान कौन लेगा?
मान्यता है कि महाप्रभु में माता और पिता दोनों के तत्व समाहित हैं. इसलिए जन्माष्टमी से ठीक एक शाम पहले जगन्नाथ स्वयं 'माता' का रूप धारण कर अपने गर्भ में श्रीकृष्ण को धारण करते हैं और एक मां की तरह उस असहनीय प्रसव पीड़ा (Labor Pain) से गुजरते हैं.

शाम से शुरू हो जाती है 'गर्भोदक बंदापना'
शाम की 'संध्या धूप' आरती संपन्न होते ही मंदिर का वातावरण पूरी तरह बदल जाता है. सेवायत भगवान जगन्नाथ की एक विशेष आरती करते हैं.
गर्भ रक्षा की वंदना: महाप्रभु के गर्भ की सुरक्षा और भगवान कृष्ण के सुरक्षित प्राकट्य के लिए पुजारियों द्वारा विशेष वंदना और आरती की जाती है, जिसे 'गर्भोदक बंदापना' कहते हैं.
कपाट बंद होने की परंपरा: इस वंदना के तुरंत बाद गर्भगृह के कपाट बंद कर दिए जाते हैं, ताकि प्रभु के इस मातृत्व भाव और एकांत साधना में कोई विघ्न न आए. इस समय भगवान जगन्नाथ को 'माता देवकी' के भाव में माना जाता है, जो अपने गर्भ में भगवान श्रीकृष्ण को धारण किए हुए हैं.
प्रसव पीड़ा से राहत के लिए दिया जाता है 'जेऊठ भोग'
जब एक मां असहनीय दर्द में होती है, तो सेवा और वात्सल्य का भाव सबसे बड़ा होता है. श्रीमंदिर में भी यही अनूठा भाव देखने को मिलता है. कपाट बंद होने के बाद महाप्रभु को एक विशेष आयुर्वेदिक भोग लगाया जाता है, जिसे 'जेऊठ भोग' कहते हैं.
यह भोग मंदिर की पवित्र रसोई में खास औषधीय सब्जियों और जड़ी-बूटियों से तैयार किया जाता है. पारंपरिक मान्यताओं के मुताबिक, यह वही औषधीय आहार है जो सदियों से गर्भवती महिलाओं को प्रसव पीड़ा से राहत देने और संबल प्रदान करने के लिए दिया जाता रहा है.

मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म और नाल-छेदन
अष्टमी की मध्यरात्रि को 'गर्भधारण नीति' पूर्ण होती है. इसके बाद बाल गोपाल की गर्भनाल काटने (नाल-छेदन) का संस्कार संपन्न होता है. पुरी में इस लीला के लिए एक प्रसिद्ध कहावत है "आजी माता, काली पुअ, परदिन पुणी माता" यानी आज जो माता बनकर जन्म दे रहे हैं, कल वे ही पुत्र हैं, और परसों पुनः माता).
रात भर मातृत्व की इस पीड़ा को सहने के बाद, अगले दिन यानी जन्माष्टमी की पावन रात श्रीमंदिर के भीतर धूमधाम से भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है. जो जगन्नाथ हैं, वही माता बनकर जगत के कल्याण के लिए बाल गोपाल को अपनी गोद में प्रकट करते हैं.
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