Bhagwan Jagannath Ki Mausi Kaun Hai: प्राचीन सप्तपुरियों में से एक भगवान जगन्नाथ का महाधाम कहलाने वाली पुरी में हर साल की भांति आज विश्व की सबसे बड़ी सांस्कृतिक एवं धार्मिक यात्रा निकलने जा रही है. आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि पर सारे जगत के नाथ कहलाने वााले भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ दिव्य रथ पर सवार होकर अपनी मौसी के घर जाने के लिए निकलते हैं. भगवान श्री कृष्ण का स्वरूप माने जाने वाले भगवान जगन्नाथ जिस गुंडिचा मौसी से मिलने के लिए उनके घर में जाते हैं, आखिर उनकी कहानी क्या है? आइए गुंडिचा देवी से भगवान जगन्नाथ के जुड़ाव और लगाव के बारे में विस्तार से जानते हैं.
देवी गुंडिचा की कहानी
हिंदू मान्यता के अनुसार पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर और उसमें विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा की मूर्तिर्यों का निर्माण मालवा के राजा इंद्रद्युम्न ने करवाया था. मान्यता है कि राजा इंद्रद्युम्न ने श्रीमंदिर का निर्माण करवाने के बाद जब मूर्तियों की प्राण-प्रतिष्ठा के लिए योग्य पुरोहित की खोज प्रारंभ की तो उन्हें पता चला कि यह कार्य तो सिर्फ ब्रह्मा जी ही कर सकते हैं. इसके बाद जब इंद्रद्युम्न ब्रह्मलोक जाने को तैयार हुए तो उन्हें नारद मुनि ने बताया कि ब्रह्मा जी के पास मिलकर पृथ्वी वापस आने में तो कई युग लग जाएंगे. तब रानी गुंडिचा ने राजा इंद्रद्युम्न के लौटने तक समाधि लेकर तप करने का संकल्प लिया.
सदियों तक रेत में दबा रहा श्री मंदिर

मान्यता है कि जब कई सदियों बाद राजा इंद्रद्युम्न वापस पृथ्वी पर लौटे तो श्री मंदिर रेत के नीचे दब चुका था और वहां पर राजा गालु माधव का शासन था. मान्यता है कि एक समुद्री तूफान के आने के बाद मंदिर प्रकट हुआ और हनुमान जी की मदद से श्री मंदिर की वास्तविकता सिद्ध हुई. उधर गुंडिचा को जब अपने पति यानि राजा इंद्रद्युम्न के लौटने का अहसास हुआ तो उनकी समाधि टूट गई. जब उन्होंने अपनी आंखें खोली तो उनके सामने एक युवा दंपत्ति था, जो उन्हें देवी मानकर पूज रहा था. तब देवी गुंडिचा ने उन्हें बताया कि वे उनकी पूर्वज हैं. इसके बाद रानी गुंडिचा राजा इंद्रद्युम्न से मिलने के लिए श्री मंदिर पहुंचीं.
तब राजा ने मांगा यह वरदान
मान्यता है कि इसके बाद स्वयं ब्रह्मा जी ने यज्ञ आदि करवा कर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की मूर्तियों प्राण प्रतिष्ठा राजा-रानी के हाथों से करवाई. यज्ञ और पूजन के बाद भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और सुभद्रा के साथ प्रकट हुए और उन्होंने राजा इंद्रद्युम्न और रानी गुंडिचा को आशीर्वाद देते हुए वर मांगने को कहा. तब राजा इंद्रद्युम्न ने भगवान जगन्नाथ से निवेदन किया कि आपके मंदिर निर्माण और पूजन में योगदान देने वाले सभी श्रमिकों, सेवकों और पुजारियों को हमेशा सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त होता रहे और मेरी पत्नी जिसने इस कार्य के लिए मातृत्व सुख को त्याग दिया, उसे अपने श्री चरणों में स्थान प्रदान करें.
ऐसे बनी रानी गुंडिचा भगवान जगन्नाथ की मौसी

राजा इंद्रद्युम्न के इस निवेदन पर भगवान जगन्नाथ ने रानी गुंडिचा से कहा कि आपने मेरी प्रतीक्षा एक मां की तरह की है, इसलिए आप मेरी मां जैसी हैं, इसलिए आज से आप मेरी मौसी हैं. मैं आपसे मिलने के लिए साल में एक बार अवश्य आऊंगा. हिंदू मान्यता के अनुसार रानी गुंडिचा ने जिस पावन स्थल पर कठिन तप किया था, वह अब 'गुंडिचा मंदिर' के नाम से जाना जाता है. जहां हर साल आषाढ़ मास में मिलने के लिए भगवान जगन्नाथ आज भी पहुंचते हैं.
भगवान जगन्नाथ अपनी मौसी के यहां कितने दिन रुकते हैं?
भगवान जगन्नाथ जब अपनी मौसी को दिये वचन को निभाने के लिए जब उनसे मिलने के लिए उनके घर गुंडिचा तीर्थ पहुंचते हैं तो देवी गुंडिचा उनका खूब स्वागत करते हुए उन्हें खाने के लिए उनके प्रिय पकवान 'पोडा पीठा' समेत तमाम तरह के पकवान परोसती हैं. मौसी के घर में सात दिनों तक रुकने के बाद जब भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और सुभद्रा के साथ अपने घर को लौटते हैं तो वह यात्रा बाहुदा या बाहुड़ा यात्रा कहलाती है.
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