Maa Vimla Devi Puja Significance: हिंदू धर्म के चार प्रमुख तीर्थ स्थलों में पुरी स्थित जगन्नाथ धाम का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है क्योंकि यहां पर श्री मंदिर में सारे जगत के नाथ कहलाने वाले जगन्नाथ विराजते हैं. भगवान श्री कृष्ण का पावन स्वरूप माने जाने वाले भगवान जगन्नाथ के मंदिर में तमाम देवी-देवताओं के बीच मां विमला देवी की पूजा का बहुत ज्यादा महत्व माना जाता है. मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ को भोग तब तक महाप्रसाद नहीं कहलाता है, जब तक वह मां विमला देवी को न चढ़ाया जाए. आइए जानते हैं कि मां विमला देवी किसका स्वरूप हैं और उनकी पूजा का क्या महत्व है?
कौन हैं विमला देवी?

हिंदू मान्यता के अनुसार मां विमला पुरी की अधिष्ठात्री देवी हैं, जिन्हें माता पार्वती का स्वरूप माना जाता है. मां विमला के साधक को उन्हें जगन्नाथ मंदिर की मुख्य शक्ति मानते हैं. पुराणों में देवी को पुरुषोत्तम क्षेत्र की प्रमुख देवी के रूप में उल्लेखित किया गया है. मां विमला देवी का मंदिर भगवान जगन्नाथ के मंदिर परिसर में ही स्थित है. देवी विमला का मंदिर अति प्राचीन है. हिंदू मान्यता के अनुसार देवी यहां पर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति स्थापित होने के पहले से पूजी जा रही हैं. पौराणिक मान्यता के अनुसार वह शक्तिपीठ है, जहां पर कभी सती का पैर गिरा था. 51 शक्तिपीठों में अत्यंत ही पूजनीय होने के कारण यह शक्ति के साधकों को एक विशेष स्थान है.
विमला देवी की पूजा का धार्मिक महत्व

हिंदू मान्यता के अनुसार शक्ति के बगैर न सिर्फ प्राणी बल्कि देवता भी अधूरे माने जाते हैं. यही कारण है कि पुरी के दिव्य क्षेत्र की देवी की पूजा लोग बड़ी श्रद्धा और विश्वास के साथ करते हैं. देवी विमला की पूजा का महत्व ऐसे समझा जा सकता है कि भगवान जगन्नाथ धाम को लगाए जाने वाले भोग को पहले वे चखती हैं यानि उन्हें अर्पित करने के बाद ही उस भोग को भगवान जगन्नाथ को चढ़ाया जाता है. जब यह प्रक्रिया पूरी होती है तभी श्री जगन्नाथ जी का भोग महाप्रसाद कहलाता है.
विमला देवी की कथा

हिंदू मान्यता के अनुसार भगवान जगन्नाथ का भोग स्वयं लक्ष्मी जी तैयार करती थीं और वह सिर्फ श्री हरि यानि भगवान विष्णु को प्राप्त होता था. मान्यता है कि एक बार नारद मुनि ने माता लक्ष्मी विनती करके उनसे वह भोग का कुछ हिस्सा प्राप्त कर लिया. तब माता लक्ष्मी ने उन्हें यह बात किसी को न बताने के लिए कहा. नारद जी ने भगवान जगन्नाथ जी का भोग खाने के बाद इतने तृप्त हुए कि हरि का गुणगान करते हुए कैलाश पर्वत पर भगवान शिव के धाम पहुंच गये.
जब भगवान शिव ने उनकी प्रसन्नता का कारण पूंछा तो अचानक उनके मुंह से भगवान जगन्नाथ के प्रसाद की महिमा का बखान हो गया. तब महादेव ने पूछा कि आपको उसके स्वाद का कैसे पता चला, जबकि वह तो सिर्फ भगवान विष्णु को प्राप्त होता है. तब नारद जी ने उन्हें सारी बात बता दी. भगवान शिव ने उनसे वह प्रसाद मांगा तो नारद मुनि ने उन्हें बचा हुआ जगन्नाथ का प्रसाद दे दिया. शिव भी उस प्रसाद को खाने के बाद खुशी से तांडव नृत्य करने लगे.
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जब माता पार्वती ने उनकी प्रसन्नता का कारण पूंछा तो उन्होंने सारी बात बता दी. माता पार्वती को जब यह बात पता चली तो वह सीधे विष्णु लोक पहुंच गईं. भगवान विष्णु माता पार्वती को अपनी बहन मानते हैं, इसलिए जब वे अपने मायके में पहुंची तो उन्होंने श्री हरि से भोजन की इच्छा प्रकट की. अंतरयामी भगवान विष्णु सारी बात समझ चुके थे तब उन्होंने उनकी नाराजगी को दूर करते हुए बताया कि मैंने आज तक अपने महाभोग को स्वयं तक इसलिए सीमित रखा था क्योंकि माता लक्ष्मी के हाथ से बने महाभोग को चखने से कर्म का सिद्धांत बिगड़ सकता था, लेकिन आज मैं इसे सभी के लिए उपलब्ध करवाता हूं और मेरे लिए चढ़ाए जाने वाला भोग सबसे पहले तुम ग्रहण करोगी. तब से लेकर आज तक भगवान जगन्नाथ का महाभोग पहले देवी विमला को फिर जगन्नाथ जी को चढ़ता है.
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