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This Article is From Oct 15, 2025

जामा मस्जिद के पटाखा बाज़ार में नहीं दिखे ग्रीन क्रैकर्स, सुप्रीम कोर्ट ने दी शर्तों के साथ मंज़ूरी

कोर्ट के आदेश के मुताबिक, 18 से 20 अक्टूबर तक सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक ही NEERI-PESO अप्रूव्ड ग्रीन पटाखे बेचे और फोड़े जा सकते हैं.

जामा मस्जिद के पटाखा बाज़ार में नहीं दिखे ग्रीन क्रैकर्स, सुप्रीम कोर्ट ने दी शर्तों के साथ मंज़ूरी

दिल्ली के जामा मस्जिद इलाके में दिवाली की रौनक अपने चरम पर है. सड़कों पर त्योहार की हलचल है, दुकानों में सजावट का सामान, मिठाइयां और कपड़ों की खरीदारी जोरों पर है. लेकिन पटाखों के शौकीनों के लिए एक निराशाजनक बात है -ग्रीन पटाखे अब तक बाज़ार में नज़र नहीं आ रहे. सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-NCR में सिर्फ ग्रीन पटाखों की बिक्री और उपयोग की सीमित मंज़ूरी दी है. कोर्ट के आदेश के मुताबिक, 18 से 20 अक्टूबर तक सुबह 6 से 7 बजे और रात 8 से 10 बजे तक ही NEERI-PESO अप्रूव्ड ग्रीन पटाखे बेचे और फोड़े जा सकते हैं. ये पटाखे सामान्य पटाखों की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम प्रदूषण फैलाते हैं और इनसे आवाज़ भी कम निकलती है.

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कोर्ट ने स्पष्ट की ये बातें

  • केवल लाइसेंस लिए विक्रेता ही ग्रीन पटाखे बेच सकते हैं
  • पटाखों पर QR कोड होना ज़रूरी है ताकि उनकी प्रमाणिकता की जांच हो सके
  • ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर किसी भी तरह की बिक्री प्रतिबंधित रहेगी
  • और पुलिस व प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निगरानी के सख्त निर्देश दिए गए हैं

लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और कहती है. जामा मस्जिद के पास पटरी बाज़ार में हर तरह के पारंपरिक पटाखे तो बिक रहे हैं, मगर ग्रीन क्रैकर्स का कोई नामोनिशान नहीं. दुकानदारों का कहना है कि ग्रीन पटाखे अभी तक मार्केट में आए ही नहीं हैं. अगर कोर्ट को मंज़ूरी देनी थी, तो फैसला थोड़ा पहले आना चाहिए था. अब दिवाली में बहुत कम वक्त बचा है.

इसके बावजूद बाज़ारों की रौनक कम नहीं हुई है. लोग बच्चों के लिए पटाखे, घर की सजावट का सामान और त्योहार की तैयारियों में जुटे हैं. हर तरफ़ चकाचौंध है - बस फर्क इतना है कि इस बार लोग उम्मीद कर रहे हैं कि दिवाली की रोशनी के साथ दिल्ली की हवा भी थोड़ी साफ़ हो जाए. सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भले देर से आया हो, लेकिन यह कोशिश इस दिशा में अहम है कि दिल्ली-NCR की दिवाली थोड़ी क्लीन और ग्रीन बन सके. अब देखना यह होगा कि इन ग्रीन पटाखों की उपलब्धता कब तक बाज़ारों तक पहुँच पाती है और दिल्ली की हवा पर इसका कितना असर पड़ता है. 

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