देश में डिजिटल क्रांति के साथ-साथ साइबर अपराधियों का जाल भी उतनी ही तेजी से फैल रहा है. इस बार जो खुलासा हुआ है, उसने सुरक्षा एजेंसियों के भी होश उड़ा दिए हैं. दरअसल, प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय साइबर फ्रॉड नेटवर्क की रीढ़ तोड़ दी है, जिसे कंबोडिया और मलेशिया में बैठे मास्टर माइंड ऑपरेट कर रहा था और मोहरे भारत के गली-मोहल्लों में थे. ईडी की जयपुर जोनल टीम ने 5 जून 2026 को एक साथ राजस्थान और पंजाब के 7 ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की. यह पूरी कार्रवाई मनी लॉन्ड्रिंग एक्ट के तहत की गई है, जिसके तार सीधे तौर पर देश की सुरक्षा और आम जनता की गाढ़ी कमाई से जुड़े हैं.
इस पूरे महाघोटाले की कहानी राजस्थान के जोधपुर से शुरू हुई. दरअसल, जोधपुर साइबर पुलिस स्टेशन में एक एफआईआर दर्ज की गई थी, जिसमें स्थानीय सिम कार्ड विक्रेताओं और पॉइंट ऑफ सेल (POS) एजेंट्स पर गंभीर आरोप लगे थे. आरोप था कि ये एजेंट्स सिम एक्टिवेशन की प्रक्रिया और नियमों को ताक पर रखकर फर्जी तरीके से सिम जारी कर रहे हैं. जब मामले में बड़े पैमाने पर वित्तीय हेरफेर और विदेशी कनेक्शन की बू आई, तो ईडी ने केस अपने हाथ में लिया.
जांच में एक-एक कर परतें खुलने लगी
ईडी ने जब जांच का दायरा बढ़ाया और करीब 2.3 लाख संदिग्ध मोबाइल नंबरों का डाटा खंगाला, तो जो आंकड़े सामने आए वो चौंकाने वाले थे. इनमें से करीब 36,000 भारतीय सिम कार्ड कंबोडिया में एक्टिव पाए गए. भारत की जमीन पर चालू हुए ये नंबर सात समंदर पार कंबोडिया में बैठकर चलाए जा रहे थे. इनमें से कम से कम 5,300 नंबर ऐसे मिले, जो देश के अलग-अलग राज्यों में दर्ज साइबर क्राइम के मुकदमों में सीधे तौर पर शामिल पाए गए. शुरुआती कड़ियों को जोड़ें, तो यह ठगी चंद लाख या करोड़ की नहीं, बल्कि सैकड़ों करोड़ रुपये की है.
मासूमों के दस्तावेज और मलेशियाई खरीदार
अब सवाल उठता है कि आखिर इतने बड़े पैमाने पर भारतीय सिम कार्ड विदेशों तक पहुंचे कैसे? ईडी की तफ्तीश में सामने आया कि इस सिंडिकेट के निशाने पर समाज का वो तबका था, जो कम पढ़ा लिखा है, या जिसमें डिजिटल अवेयरनेस की कमी है. आरोपी इन मासूम लोगों को सिम पोर्ट कराने या नया सिम सस्ते में दिलाने का लालच देते थे. जब पीड़ित अपना बायोमेट्रिक (अंगूठा) लगाते या दस्तावेज देते, तो चालाक पीओएस (POS) एजेंट उनके नाम पर एक असली सिम तो एक्टिवेट करते ही थे, साथ ही उनके बिना जाने उसी दस्तावेज पर एक्स्ट्रा सिम कार्ड भी निकाल लेते थे. इन अतिरिक्त सिम कार्ड्स को मोटे कमीशन के लालच में मलेशियाई नागरिकों को बेच दिया जाता था. इसके बाद ये सिम कंबोडिया पहुंचते थे, जहां से व्हाट्सएप कॉल और फिशिंग लिंक्स के जरिए भारतीयों को ही निशाना बनाया जाता था.
ये हैं सिंडिकेट के मुख्य किरदार
इस पूरे नेक्सस को ऑपरेट करने वाले चेहरों को भी ईडी ने बेनकाब कर दिया है. जांच एजेंसी के मुताबिक, राहुल कुमार झा, मोहम्मद शरीफ और संदीप भट्ट इस पूरे नेटवर्क के मास्टरमाइंड और मुख्य कड़ी हैं. इनके अलावा टेलीकॉम कंपनियों की पीओएस आईडी का गलत इस्तेमाल करने वाले सिम वेंडर्स प्रकाश भील, रामअवतार राठी, हरीश मालाकार और हेमंत पंवार भी जांच के घेरे में हैं. ये सभी आरोपी देश की नामी टेलीकॉम कंपनियों के सिस्टम में सेंध लगाकर इस संगठित अपराध को अंजाम दे रहे थे.
30 बैंक खातों से करोड़ों की संपत्ति का लेन-देन
ईडी की टीमों ने एक सोची समझी रणनीति के तहत राजस्थान के किशनगढ़ (अजमेर), नागौर, जोधपुर और पंजाब के लुधियाना में एक साथ रेड की. इस छापेमारी के दौरान जांच एजेंसी के हाथ कई ऐसे डिजिटल सबूत, लैपटॉप, मोबाइल और आपत्तिजनक दस्तावेज लगे हैं, जो इस घोटाले की कड़ियों को पूरी तरह जोड़ते हैं. इतना ही नहीं, इस अवैध कमाई को ठिकाने लगाने के लिए इस्तेमाल किए जा रहे करीब 30 बैंक खातों को भी ट्रेस किया गया. आरोपियों की कई चल-अचल संपत्तियों का पता चला है, जिन्हें आने वाले दिनों में जब्त किया जा सकता है.
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ईडी के अधिकारियों का मानना है कि यह मामला सिर्फ सिम कार्ड की हेराफेरी या कुछ करोड़ के फ्रॉड का नहीं है. यह एक बहुत बड़ा इंटरनेशनल साइबर क्राइम सिंडिकेट है, जिसके तार दुबई, कंबोडिया और मलेशिया के बड़े सिंडिकेट्स से जुड़े हो सकते हैं. एजेंसी अब मनी ट्रेल (पैसे के लेनदेन का रास्ता) को खंगाल रही है, ताकि यह साफ हो सके कि ठगी का यह पैसा किन-किन विदेशी खातों में ट्रांसफर हुआ. आने वाले दिनों में इस मामले में कई और गिरफ्तारियां और बड़े खुलासे होने की संभावना है.
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