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अमेरिका, भारत को लौटा सकता है ₹1 लाख करोड़, ट्रंप टैरिफ रिफंड का रास्ता साफ! जानिए किसे और कैसे मिलेगा

US Trump Tariff Return: फरवरी में आए अदालती आदेश के बाद अब जाकर अमेरिका ने ग्‍लोबल टैरिफ रिफंड की खिड़की खोल दी है. अमेरिका ने एक नया ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया है, जो 20 अप्रैल से शुरू हुआ है. 

अमेरिका, भारत को लौटा सकता है ₹1 लाख करोड़, ट्रंप टैरिफ रिफंड का रास्ता साफ! जानिए किसे और कैसे मिलेगा
Trump Tariff on India: अतिरिक्‍त रिफंड लौटाए जाने का रास्‍ता साफ

How India got Tariff Refund from US: अमेरिका में चल रही ट्रेड टॉक के बीच भारत के लिए व्‍यापारिक मोर्चे पर एक बड़ी खबर सामने आई है. राष्‍ट्रपति ट्रंप के मनमाने टैरिफ वाले फैसले को अमेरिकी कोर्ट की ओर से गलत ठहराए जाने के बाद, अब भारतीय सामानों पर लगाए गए शुल्‍क के रिफंड का रास्‍ता साफ हो गया है. भारतीय सामानों पर उस दौरान जो भारी भरकम टैरिफ लगाए गए थे, उनमें करीब 10 से 12 बिलियन डॉलर वाला हिस्‍सा अवैध माना जा सकता है. भारतीय रुपये में इसकी वैल्‍यू देखें तो ये करीब 83,000 से 1,00,000 करोड़ रुपये हो सकता है, जिसके रिफंड का रास्ता साफ हो गया है. रिफंड की प्रक्रिया को तेज करने के लिए अमेरिकी सीमा शुल्क विभाग (CBP) ने 20 अप्रैल 2026 से CAPE प्लेटफॉर्म का पहला चरण शुरू कर दिया है. 

अमेरिका ने खोली 'रिफंड वाली खिड़की'

ये पूरा विवाद ट्रंप प्रशासन के 'इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट' (IEEPA) के तहत लगाए गए दंडात्मक शुल्कों से जुड़ा है. ट्रंप ने अपनी 'अमेरिका फर्स्ट' नीति के नाम पर, कई देशों से आने वाले सामानों पर भारी टैरिफ लगा दिए थे. हालांकि, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट और अपीलीय अदालतों ने बाद में व्यवस्था दी कि सरकार ने इन शक्तियों का जिस तरह इस्तेमाल किया, उनमें खामियां थीं और ये शुल्क कानून की मूल भावना के विपरीत थे. इस अदालती आदेश के बाद अब अमेरिका ने कुल 166 बिलियन डॉलर के ग्‍लोबल टैरिफ रिफंड की खिड़की खोल दी है. अमेरिका ने एक नया ऑनलाइन पोर्टल लॉन्च किया है, जो 20 अप्रैल से शुरू हुआ है. 

भारतीय निर्यातकों को कैसे होगा फायदा?

ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) के आंकड़ों के अनुसार, इस रिफंड का एक बड़ा हिस्सा (10-12 अरब डॉलर) उन सामानों से संबंधित है जो भारत में बने हैं.

हालांकि, तकनीकी रूप से ये रिफंड सीधे भारतीय निर्यातकों को नहीं मिलेगा, क्योंकि दावा केवल 'यूएस इंपोर्टर' (अमेरिकी खरीदार) ही कर सकते हैं. भारतीय निर्यातकों को इसका लाभ उठाने के लिए अपने अमेरिकी खरीदारों के साथ बातचीत करनी होगी.

भारतीय निर्यातक भविष्य के ऑर्डर्स में डिस्काउंट, रिफंड शेयरिंग या कीमतों में संशोधन के जरिए इस पैसे का हिस्सा हासिल कर सकते हैं. विशेष रूप से टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग गुड्स और केमिकल्स जैसे सेक्टर, जिन्हें इन शुल्कों से सबसे ज्यादा चोट पहुंची थी, अब बड़ी राहत की उम्मीद कर रहे हैं.

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एक्‍सपर्ट इस फैसले पर क्‍या बता रहे?  

ग्रांट थॉर्नटन भारत (Grant Thornton Bharat) के पार्टनर (इनडायरेक्ट टैक्स), सोहराब बरारिया ने CAPE प्लेटफॉर्म की शुरुआत को IEEPA ड्यूटी रिफंड के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया. उन्‍होंने कहा, 'ये रिफंड दावों की 'बल्क प्रोसेसिंग' की अनुमति देता है, जिससे कागजी कार्रवाई कम होगी और रिफंड की प्रक्रिया तेज होगी. इससे आयातकों (Importers) के कैश फ्लो में सुधार होगा.'

हालांकि, स्‍टेकहोल्‍डर्स के लिए ये भी जरूरी है कि वे ऐतिहासिक डेटा को समय पर संकलित और सत्यापित करें ताकि कोई पात्र छूट न जाए.'  जानकारों का मानना है कि यह भारत के लिए व्यापारिक लाभ के साथ-साथ अमेरिका के साथ आर्थिक रिश्तों को और मजबूत करने का एक बड़ा अवसर है.

किस सेक्‍टर को कितना रिफंड मिल सकता है? 

यह संभावित रिफंड मुख्य रूप से तीन बड़े सेक्टरों से जुड़ा है: 

  • कपड़ा-परिधान: करीब 4 बिलियन डॉलर
  • इंजीनियरिंग गुड्स: करीब 4 बिलियन डॉलर
  • केमिकल्‍स और संबंधित उत्पाद: 2 बिलियन डॉलर 
  • अन्‍य सेक्‍टर्स: बहुत कम 

भारतीय एक्‍सपोर्टर्स के पास क्‍या रास्‍ते? 

भारतीय निर्यातकों को इस रिफंड का लाभ लेने के लिए अमेरिकी खरीदारों के साथ सक्रिय बातचीत और डील करनी होगी. 

  1. पहला रास्ता 'रिफंड‑शेयरिंग कॉन्ट्रैक्ट' हो सकता है कि दोनों पक्ष लिखित समझौते के ज़रिए तय कर लें कि रिफंड की जो भी राशि मिलेगी, उसका एक तय हिस्सा भारतीय सप्लायर को वापस किया जाएगा. 
  2. दूसरा विकल्प यह है कि जो नए या चल रहे कॉन्ट्रैक्ट हैं, उनकी कीमतों को दोबारा नेगोशिएट किया जाए. उदाहरण के लिए, भविष्य की सप्लाई के रेट थोड़े कम रखे जाएं और बदले में अमेरिकी आयातक को मिलने वाला रिफंड लाभ भारतीय सप्लायर तक परोक्ष रूप से पहुंच जाए. 
  3. तीसरा रास्ता ये है कि भविष्य के ऑर्डर और प्रतिस्पर्धा पर बात करते हुए भारतीय निर्यातक यह संदेश दें कि जो कंपनियां रिफंड का हिस्सा साझा करेंगी, उन्हें कीमत और सप्लाई के मामले में प्राथमिकता दी जाएगी. इससे अमेरिकी ख़रीदारों पर भी दबाव बनेगा कि वे रिफंड का कुछ लाभ सप्लायर के साथ बांटें. 

भारत को मिलने वाला असली फायदा इस बात पर निर्भर करेगा कि निर्यातक कैसी बातचीत कर पाते हैं. 

(ऋषभ भटनागर के इनपुट के साथ)

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लेखक के बारे में
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निलेश कुमार
Senior Producer
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