India First IVF Doctor Subhash Mukhopadhyay Story Hindi: जिस शख्स ने सूनी गोद में औलाद की किलकारी गूंजने की उम्मीद दी, जिसने भारत को दुनिया के वैज्ञानिक नक्शे पर सबसे आगे खड़ा कर दिया. उस मसीहा को बदले में क्या मिला? न कोई सम्मान, न तालियां... मिली तो बस बेरुखी, जलालत और व्यवस्था की ऐसी प्रताड़ना, जिसने आखिरकार उसकी जिंदगी छीन ली. यह कहानी भारत के महान वैज्ञानिक डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय की सच्ची दास्तान है, जो हर भारतीय की आंखें नम कर देगी.
जब दुनिया में गूंजी पहली किलकारी
साल 1978... 25 जुलाई की तारीख को इंग्लैंड से एक ऐसी खबर आई जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया. दुनिया की पहली टेस्ट-ट्यूब बेबी यानी आईवीएफ (IVF) से जन्मी बच्ची 'लुईस ब्राउन' ने जन्म लिया. डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स और पैट्रिक स्टेप्टो ने विज्ञान का यह करिश्मा कर दिखाया था.
लेकिन ठीक इसके 67 दिन बाद, 3 अक्टूबर 1978 को भारत में कुछ ऐसा हुआ जो उससे भी बड़ा चमत्कार था. उस दिन शारदीय नवरात्रि का पहला दिन था. कोलकाता में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय और उनकी टीम ने भारत के पहले और दुनिया के दूसरे टेस्ट-ट्यूब बेबी को जन्म दिला दिया.
डॉ. सुभाष ने उस नन्हीं बच्ची का नाम रखा 'दुर्गा' (जिन्हें आज दुनिया कनुप्रिया अग्रवाल के नाम से जानती है). बच्ची का नाम दुर्गा इसलिए रखा गया क्योंकि उस दौर में भी बेटियों को कोख में मारने और संतान न होने पर औरतों को ताने देने की कुप्रथा थी.
एक पुराना फ्रिज और घर को बना दिया प्रयोगशाला
डॉ. सुभाष का यह सफर किसी तपस्या से कम नहीं था. 16 जनवरी 1931 को हजारीबाग में जन्मे सुभाष ने कोलकाता से एमबीबीएस और ब्रिटेन से रिप्रोडक्टिव एंडोक्रिनोलॉजी में डॉक्टरेट की थी. जब देश में इमरजेंसी का दौर था, उनके पास आधुनिक लैब नहीं थी. उन्होंने अपने घर को ही लैब बनाया और एक पुराने घरेलू फ्रिज का इस्तेमाल हार्मोन्स और भ्रूण (Embryo) के अध्ययन के लिए किया.
उन्होंने भ्रूण को 53 दिनों तक शरीर से बाहर संजोकर (Cryopreservation) रखने की, जो तकनीक विकसित की, वह इंग्लैंड के वैज्ञानिकों से कहीं अधिक सरल और उन्नत थी. अगले 5 साल तक पूरी दुनिया का कोई वैज्ञानिक ऐसा नहीं कर पाया था. 13 साल से औलाद के लिए तरस रही बेला अग्रवाल जब उनके पास पहुंचीं, तो डॉ. सुभाष ने अपनी इसी नायाब तकनीक से उनकी सूनी गोद भर दी.
चमत्कार के बदले मिला फर्जीवाड़े का तमगा
जहां पश्चिम में डॉ. रॉबर्ट एडवर्ड्स को सिर-आंखों पर बिठाया गया, वहीं भारत में अपने ही देश के सिस्टम ने डॉ. सुभाष को 'धोखेबाज' साबित करने में पूरी ताकत झोंक दी. दुर्गा के माता-पिता समाज के तानों और तमाशा बनने के डर से बच्ची की पहचान उजागर नहीं करना चाहते थे. डॉ. सुभाष ने अपने मरीज की गोपनीयता की खातिर दुनिया के सामने बच्ची को पेश करने से मना कर दिया.
सरकार ने जांच के लिए जो चार सदस्यीय कमेटी बनाई, उसमें रिप्रोडक्टिव साइंस का एक भी विशेषज्ञ नहीं था. नौकरशाहों और नीम-हकीमों ने उनके काम को सिरे से 'बोगस' करार दे दिया. 1979 में जापान में होने वाले अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में उन्हें अपना शोध पत्र पेश करने की अनुमति नहीं दी गई. हद तो तब हो गई जब इस जीनियस वैज्ञानिक को प्रताड़ित करने के लिए उनका तबादला आंखों के विभाग (Ophthalmology) में कर दिया गया.

वैज्ञानिक के वो आखिरी शब्द
लगातार तिरस्कार, अपनी ही रिसर्च पर लगे झूठे आरोपों और व्यवस्था की संवेदनहीनता ने उम्मीद बांटने वाले इस डॉक्टर को अंदर से तोड़ दिया. 19 जून 1981 को कोलकाता के अपने फ्लैट में डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय ने अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली. जाते-जाते उनके दर्द भरे शब्द इस देश के सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा थे- "मैं अपने मर जाने के लिए रोज दिल के दौरे का इंतजार नहीं कर सकता."
मौत के बाद मिला सम्मान
डॉक्टर साहब के जाने के बाद सालों तक यह झूठा नैरेटिव चलता रहा कि भारत की पहली टेस्ट ट्यूब बेबी 1986 में मुंबई में जन्मी थी. लेकिन सच को कब तक दबाया जा सकता था? उनके सहयोगी डॉ. सुनीत मुखर्जी और बाद में डॉ. टीसी आनंद कुमार के प्रयासों से सच सामने आया. साल 2002 में जाकर इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) ने डॉ. सुभाष मुखोपाध्याय को भारत के पहले IVF का असली जनक स्वीकार किया.
दुर्गा यानी कनुप्रिया ने अपने 25वें जन्मदिन पर भरी सभा में कहा था, "मैं कोई ट्रॉफी नहीं हूं, लेकिन मुझे खुशी है कि आज मेरे 'साइंटिफिक पिता' को इंसाफ मिल गया." 2010 में जब ब्रिटिश वैज्ञानिक को आईवीएफ के लिए नोबेल पुरस्कार से नवाजा गया, तब भारत के डॉक्टर सुभाष इतिहास के पन्नों में भुला दिए गए. साल 1990 में पंकज कपूर और शबाना आजमी अभिनीत फिल्म 'एक डॉक्टर की मौत' इसी रियल घटना पर आधारित है. जिसमें सरकारी सिस्टम एक डॉक्टर की खोज को मानने से इनकार कर देता है और उसी पर जांच बैठा देता है.
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