VIRAL POST: बाप की विरासत में मिली 12 एकड़ जमीन और गाड़ियां बेचकर 40 साल से देश का सबसे ऊंचा रावण बनाने वाले तेजिंदर सिंह चौहान की यह कहानी केवल दशहरे के पुतले की नहीं, बल्कि एक अनोखे पश्चाताप की है. अंबाला के बराड़ा गांव के रहने वाले तेजिंदर जवानी के दिनों में बेहद बागी थे. पिता की एक कड़वी बात चुपके से सुनने के बाद उनके जीवन की दिशा पूरी तरह बदल गई. पिता के सम्मान को वापस पाने की जिद में उन्होंने अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. यूपी के मुस्लिम कारीगरों के साथ मिलकर वे हर साल इस कला को आसमान जैसी ऊंचाई देते हैं. आज पंचकूला और दिल्ली के द्वारका में जलने वाले 221 फीट के रावण असल में उसी बेटे की एक मूक माफी हैं, जिसे वे हर साल पहले से और ऊंचा करके दोहराते हैं. तेजिंदर ने खुद बताया कि पंचकूला के रावण को बनाने में अनुमानित लागत 38 लाख रुपए है. फेसबुक पर यह दिल छूने वाली कहानी राहुल मिश्रा ने साझा की है.
पिता की बात ने तोड़ दिया
कहानी शुरू होती है साल 1983 के अंबाला के बराड़ा गांव से. एक सरकारी स्कूल के कड़क हेडमास्टर अमी सिंह चौहान का घर. तेजिंदर सबसे छोटे और सबसे जिद्दी बेटे थे. घर का अनुशासन इतना कड़ा था कि खेलने तक पर पाबंदी थी. मार पड़ती रही और तेजिंदर और बागी होते गए. पढ़ाई से नफरत हो गई. जैसे-तैसे 10वीं पास की और किताबें फेंककर गलियों में घूमने लगे.
इसके बाद के तीन साल सबसे कड़वे थे. कबड्डी अच्छी खेलते थे, नशा कभी नहीं किया, लेकिन बिना किसी मकसद के घूमना और झगड़े करना उनकी पहचान बन गया. रोज घर पर शिकायतें आतीं. एक दिन उन्होंने दीवार के पीछे से पिता को किसी से कहते सुना, "इस लड़के ने पूरे परिवार का नाम मिट्टी में मिला दिया."
बस, यही वो मोड़ था. कोई थप्पड़ या डांट नहीं, बल्कि पिता का वो एक वाक्य तेजिंदर के सीने में चुभ गया. उन्होंने तय किया कि अब बदलना है. मनोविज्ञान भी कहता है कि जब इंसान को खुद के 'बुरे होने' का अहसास होता है तो वो सुधरने की राह पकड़ता है. तेजिंदर पिता के पास गए, रोए और माफी मांगी. पिता ने बस इतना कहा, "अब समाज और धर्म का कोई ऐसा काम करो जिससे तुम्हारी छवि सुधरे."
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यूपी के मुस्लिम कारीगरों ने दिया साथ
उन दिनों गांव की रामलीला बंद पड़ी थी. पिता ने बिगड़े बेटे को भाषण नहीं, जिम्मेदारी दे दी. लेकिन गांव वालों को शक था कि यह लड़का चंदे के पैसे खा जाएगा. तेजिंदर ने हार नहीं मानी. मां से पैसे लिए, कुछ उधार उठाया और 80 के दशक के बीच बराड़ा में पहला 20 फीट का रावण खड़ा कर दिया. उस शाम जब पुतला जला, तो पिता की आंखें नम थीं और पूरा गांव तालियां बजा रहा था.
इसके बाद रावण की ऊंचाई हर साल बढ़ती गई. तेजिंदर खुद भी 25 सालों तक रामलीला के मंच पर रावण का किरदार निभाते रहे. लोग पूछते कि पुतला इतना ऊंचा क्यों करते हो? तेजिंदर का जवाब सीधा था, "जैसे-जैसे समाज में भ्रष्टाचार, दहेज और अपराध जैसी बुराइयां बढ़ रही हैं, मेरे रावण का कद भी बढ़ता जा रहा है."
इस भव्यता की एक खूबसूरत और सच्ची तस्वीर भी थी. बराड़ा के इन विशालकाय रावणों को आकार देने वाले कारीगर उत्तर प्रदेश के सहारनपुर के मुसलमान थे. भारत की असली और खूबसूरत तस्वीर अक्सर इन्हीं मैदानों में बनती है, जहां कोई यह नहीं पूछता कि इस रावण के बांस किसने बांधे हैं.
हर फीट की अपनी एक कीमत थी
रावण तो ऊंचा होता गया, लेकिन उसकी कीमत चंदे से नहीं, तेजिंदर के घर से चुकती थी. मदद न के बराबर थी. पुतले के लिए कभी फसल बिकी, तो कभी जमीन का टुकड़ा. देखते ही देखते पूरी 12 एकड़ जमीन और गाड़ियां बिक गईं. परिवार चलाना मुश्किल हो गया. साल 2017 में थककर उन्होंने एलान कर दिया कि अब और नहीं. यह कहानी सिर्फ सबसे ऊंचे रावण की नहीं, बल्कि उस जमीन की भी है जो बाप से मिली थी और उसी बाप की नजरों में सम्मान वापस पाने के लिए बिकती चली गई. तेजिंदर कहते हैं, "मुझे अपने बेटे के लिए बुरा लगता है कि मैं उसे जमीन नहीं दे पाया, लेकिन मेरा बेटा मेरे साथ खड़ा है. वह कहता है कि इसी काम ने हमें पहचान दी है."
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राख से फिर उठने का हुनर
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई. अगले ही साल पंचकूला की एक संस्था ने उन्हें आर्थिक सहयोग दिया और सिलसिला फिर शुरू हो गया. कोरोना काल में जब मैदान सूने रहे, तो उन्होंने खाली बैठने के बजाय फाइबर की मूर्तियां बनाने का नया हुनर सीखा. साल 2023 में एक बड़ा हादसा हुआ जब क्रेन टूटने से 125 फीट का पुतला जमीन पर गिर गया, लेकिन उन्होंने मैदान खाली नहीं छोड़ा.
आज 58 साल की उम्र में भी तेजिंदर के सपने छोटे नहीं हुए हैं. वे अपने गांव बराड़ा में फिर से 300 फीट का रावण बनाना चाहते हैं. लेकिन उससे भी बड़ा सपना है भगवान राम और शिव की 200 फीट ऊंची मूर्तियां बनाना. वे कहते हैं, "पुतले तो एक दिन में जल जाते हैं, मूर्तियां दशकों तक रहेंगी. जो आदमी 40 साल से सिर्फ जलने के लिए चीजें बना रहा था, अब वो कुछ ऐसा बनाना चाहता है जो हमेशा के लिए ठहर जाए."
कल शाम जब रिमोट का बटन दबेगा और 221 फीट का रावण धू-धू कर जलेगा, तो आसमान की तरफ देखती भीड़ को शायद ही पता होगा कि वह विशालकाय रावण असल में एक माफीनामा है, जो 40 साल पहले एक बेटे ने अपने पिता से मांगी थी और जिसे वह आज भी हर साल थोड़ा और ऊंचा करके दोहराता है.
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