जरा आंखें बंद कीजिए और चलने की कोशिश कीजिए. पैर डगमगाएंगे, दिल में डर बैठेगा. लेकिन बेंगलुरु की 5 साल की इस नन्हीं बच्ची ऐनी (Aeny) को देखिए. हाथ में सफेद छड़ी थामे, लड़खड़ाते कदमों से ही सही, पर गजब के हौसले के साथ आगे बढ़ती इस बच्ची का वीडियो आजकल सोशल मीडिया पर छाया हुआ है. लोग ऐनी के आत्मविश्वास और उसकी मां के हौसले को सलाम कर रहे हैं. लेकिन ये कहानी है एक मां के उस संघर्ष की, जिसने समाज के तानों को पीछे छोड़ते हुए अपनी बेटी को उड़ना सिखाया.
ऐनी जन्म से देख नहीं सकती. जब वो बहुत छोटी थी, तो कुछ लोगों ने उसकी मां लोपामुद्रा कर से कहा कि ये तो 'कर्मों का फल' है. पिछले जन्म का कोई पाप है. घबराई हुई मां ने दो साल तक मंदिरों के चक्कर काटे, पूजा-पाठ करवाए. लेकिन एक दिन लोपामुद्रा के मन में ख्याल आया कि क्या वो अपनी बेटी को लाचारी की जिंदगी जीने देगी? उन्होंने तय किया कि उनकी बेटी को हमदर्दी या दया की भीख नहीं, बल्कि बराबरी का हक और हौसला चाहिए. उन्होंने सवाल पूछना बंद कर दिया कि "मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ?" और सोचना शुरू किया कि "मैं अपनी बेटी को बेहतरीन जिंदगी कैसे दे सकती हूं?"
अपनी जिंदगी जी रही ऐनी
आज 5 साल की ऐनी वो सब कुछ कर रही है जो उसकी उम्र का कोई भी आम बच्चा करता है. वो कीबोर्ड बजाना सीख रही है, ब्रेल लिपि पढ़ती है, एबेकस सीखती है, साइकिल चलाती है और कराटे भी करती है. आपको जानकर हैरानी होगी कि महज साढ़े चार साल की उम्र में ऐनी ने कराटे में ऑरेंज बेल्ट हासिल कर ली है. ऐनी के माता-पिता बेंगलुरु में आईटी प्रोफेशनल्स हैं. वे कहते हैं कि ये कोई असाधारण काम नहीं है, ये बस वो मौके हैं जो वो अपनी बेटी को देना चाहते हैं.
15 schools rejected Aeny because of what she couldn't see. They failed to see everything she could. Today, she plays the piano, practises karate, speaks three languages and has presented her own science project at an All India STEM exhibition. Her blindness was never the limit.… pic.twitter.com/YLGaUv9yD2
— The Better India (@thebetterindia) September 24, 2026
इस मुश्किल सफर में ऐनी के नानाजी उसके सबसे बड़े मददगार और दोस्त बनकर सामने आए. वे ऐनी को पार्क ले जाते, उसे छूकर दुनिया को महसूस करना सिखाते और उसका हौसला बढ़ाते. लेकिन इस सुनहरे सफर के पीछे एक कड़वी हकीकत भी है.
15 स्कूलों ने किया रिजेक्ट
लोपामुद्रा बताती हैं कि बेंगलुरु जैसे बड़े शहर में सुविधाएं तो हैं, लेकिन संवेदनशीलता की आज भी भारी कमी है. जब उन्होंने ऐनी के एडमिशन के लिए शहर के 15 नामी स्कूलों के दरवाजे खटखटाए, तो सबने मना कर दिया. कोई कहता कि अलग से टीचर रखिए, तो कोई भारी-भरकम फीस मांगता. आज भी हमारे देश के स्कूलों में विशेष बच्चों के लिए जरूरी उपकरण और ट्रेनिंग की भारी कमी है. कानूनन (RPWD Act 2016) हर बच्चे को बराबरी की शिक्षा का अधिकार है, लेकिन जमीन पर हकीकत कुछ और ही है.
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"लोगों की दया नहीं चाहिए"
लोपामुद्रा कहती हैं, "हमारे बच्चों को किसी की सहानुभूति या दया नहीं चाहिए. उन्हें चाहिए तो सिर्फ स्वीकार्यता, समान अवसर और अपनी क्षमता दिखाने की आजादी."
ऐनी की कहानी हमें सिखाती है कि कोई भी कमजोरी तब तक आपको नहीं रोक सकती जब तक आपके पास हौसले के पंख और अपनों का साथ हो. आज ऐनी अपनी छड़ी के सहारे सिर्फ चलना नहीं सीख रही, बल्कि वो अपनी आजादी और आत्मनिर्भरता का नया रास्ता खुद बना रही है.
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