Viral Story: एक कंपनी के फाउंडर ने अपनी मार्केटिंग टीम के सभी जूनियर एम्प्लॉई को नौकरी से निकाल दिया है. इस फैसले को 'AI ट्रांसफॉर्मेशन' नाम देते हुए फाउंडर ने बड़े ही गर्व से कहा, 'अब एंट्री-लेवल का काम आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से हो जाता है. ऐसे में 3 जूनियर्स को पैसे क्यों दिए जाएं, जब यही काम एक सीनियर कर्मचारी और एक एआई टूल मिलकर संभाल सकते हैं?' इस फैसले के बाद उनकी 5 लोगों की मार्केटिंग टीम घटकर सिर्फ 2 सीनियर्स पर आ गई है.
एक सवाल ने की बोलती बंद
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लिंक्डइन पर B2B मार्केटर अपूर्व चतुर्वेदी ने इस किस्से को शेयर करते हुए उस फाउंडर से एक ऐसा सवाल पूछा कि उसकी बोलती बंद हो गई. अपूर्व ने पूछा, 'तुम्हारे हिसाब से सीनियर कहां से आते हैं?' जिसका कोई ठोस जवाब फाउंडर नहीं दे पाया.
सीनियर कहां से आते हैं?
अपूर्व के मुताबिक, 'कोई भी सीनियर मार्केटर सीधे आसमान से नहीं टपकता. एक सीनियर असल में वही जूनियर होता है जिसे शुरुआती सालों में गलतियां करने, फ्लॉप कैंपेन चलाने और उन असफलताओं से सीखने की आजादी दी गई थी. तजुर्बा कोई सॉफ्टवेयर नहीं है जिसे इंटरनेट से सीधे डाउनलोड किया जा सके, इसे समय देकर डेवलप करना पड़ता है.'
क्रिकेट के उदाहरण से समझें
अपूर्व ने इस स्थिति की तुलना भारतीय क्रिकेट से करते हुए एक बेहद सटीक उदाहरण दिया. उन्होंने कहा, 'आज पैसे बचाने के लिए जूनियर खिलाड़ियों को हटाना वैसा ही है जैसे कोई क्रिकेट बोर्ड अपनी पूरी रणजी पाइपलाइन ही खत्म कर दे, क्योंकि आप बस विदेशी खिलाड़ी खरीद सकते हैं. यह एक सीजन के लिए तो बहुत अच्छा है, लेकिन 5 साल बाद आप देखेंगे कि नंबर 4 पर खेलने वाला कोई भारतीय खिलाड़ी तैयार नहीं है, यानी अगली पीढ़ी ही नहीं है.'
'कंपनियां खत्म कर रही नौकरियां'
आखिर में अपूर्व ने कहा, 'AI जूनियर रोल्स को खत्म नहीं कर रहा है, बल्कि कंपनियां ऐसा कर रही हैं और फिर इसे एफिशिएंसी का नाम दे रही हैं. आप उस बीज को ही खा रहे हैं जिसे आपको बोना चाहिए था. आज सबसे सस्ती टीम वह है जिसमें 2030 तक कोई सीनियर नहीं बचेगा.'
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सोशल मीडिया पर लोगों ने दी अलग-अलग रायएक शख्स ने अपूर्व की बातों का समर्थन करते हुए कहा, 'AI के बारे में हो रही बातचीत का यह वह पहलू है जिस पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता. अगर हर कंपनी जूनियर्स को नौकरी पर रखना बंद कर दे, तो सीनियर्स की अगली पीढ़ी कहां से आएगी? AI कुछ कामों की जगह ले सकता है, लेकिन गलत फैसले लेने, फेल होने, फीडबैक पाने और दोबारा कोशिश करने से मिलने वाले अनुभव की जगह नहीं ले सकता.'
दूसरे शख्स ने भी अपूर्व की बातों से सहमति जताते हुए कहा, 'आप सही कह रहे हैं. लेकिन यहां फाउंडर यह तर्क देंगे कि वे यहां समाज सेवा के लिए नहीं हैं. वे वही करते हैं जिसमें उन्हें मुनाफा दिखता है. और इतनी ज्यादा आबादी और बेरोजगारी वाले देश में, हमें नहीं लगता कि कभी कर्मचारियों की कमी होगी.'
तीसरे शख्स ने कहा, 'आजकल कंपनियां मशीनों को इंसान और इंसानों को मशीन की तरह समझ रही हैं. कर्मचारियों की संख्या कम करने और AI का इस्तेमाल बढ़ाने के लक्ष्य तय किए जा रहे हैं. कुछ मामलों में, टीमों के लिए यह जरूरी कर दिया गया है कि वे छंटनी के लिए अपनी टीम से कम से कम एक व्यक्ति का नाम जरूर दें.'
इन सब के विपरीत, एक शख्स ने फाउंडर के फैसले को सही बताते हुए कहा, 'आपने कितनी बार ऐसे होशियार लोगों को काम पर रखा है जो लंबे समय तक टिके रहे, चीजें अच्छी तरह सीखीं और फिर टीम में पक्की जगह बना ली? AI किसी की जगह नहीं ले रहा है और मुझे नहीं लगता कि इस बारे में हो रही ज्यादातर बातों में कोई दम है. AI मेरी टीम को नई चीजें करने और अपने लिए ज्यादा पर्सनल समय निकालने का मौका दे रहा है.'
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