सूरत. एक तरफ आलीशान सफेद बंगला और ठीक बगल में वड़ा पाव की एक छोटी सी रेहड़ी (ठेला). पहली नजर में कोई भी धोखा खा जाएगा कि इस आलीशान बंगले के मालिक ने अपने घर के बाहर किसी गरीब को दुकान लगाने की इजाजत दी होगी. लेकिन असल कहानी इसके बिल्कुल उलट है. ये ठेला इसी आलीशान बंगले के मालिक अनिल भाई का है. 1997 में ₹2.50 से सफर शुरू करने वाले अनिल भाई आज भी सुबह 6 बजे खुद अपने हाथों से ये ठेला बाहर निकालते हैं. आज उनकी नेटवर्थ तकरीबन 40 करोड़ रुपए है. आइए आपको सीधे सूरत लिए चलते हैं और सुनाते हैं 'शून्य से शिखर' तक पहुंचने की एक ऐसी दास्तान, जो आपके भीतर कुछ कर गुजरने का जज्बा जगा देगी.
मंदिर के बाहर पार्किंग से ONGC की नौकरी तक का संघर्ष
अनिल भाई की जिंदगी हमेशा से इतनी आसान नहीं थी. एक दौर था जब वो अपने परिवार के साथ पेट पालने के लिए सूरत के अंबिका निकेतन मंदिर के बाहर लोगों की गाड़ियां पार्क करते थे. श्रद्धालुओं के जूते-चप्पलों की रखवाली करते थे. घर चलाने के लिए मां, भाई-बहन सब मिलकर घर पर सब्जियां बेचने का काम करते थे.
मेहनत रंग लाई और अनिल भाई को ONGC में चपरासी की सरकारी नौकरी मिल गई. महीने फिक्स थे, काम भी तय था. लेकिन जिसके सपनों की उड़ान बड़ी हो, उसे नौकरी का ये दायरा कब तक बांध कर रखता? सिर्फ 17 महीने काम करने के बाद, अनिल भाई ने एक बहुत बड़ा और साहसी फैसला लिया. उन्होंने सरकारी नौकरी को लात मार दी.
मुंबई का स्वाद, सूरत में शुरुआत और मां के हाथों का जादू
साल 1997 में जब अनिल भाई ने नौकरी छोड़ी, तो हाथ में कोई बहुत बड़ा बिजनेस प्लान नहीं था. बस एक हुनर था जो उनकी मां के हाथों में था- वड़ा पाव बनाने का जादू. मुंबई के इस मशहूर स्ट्रीट फूड को अनिल भाई ने सूरत की गलियों में उतारने का फैसला किया.
शुरुआत बहुत मामूली थी. वो दाबेली बेचने वालों से कच्चा पाव लाते, मां घर पर सीक्रेट मसाला तैयार करतीं और अनिल भाई उसे सिर्फ ढाई रुपये में सड़क किनारे ठेला लगाकर बेचते. शुरुआती दिन चुनौतियों से भरे थे. कभी सड़क पर दुकान लगाने को लेकर झगड़े होते, तो कभी नगर निगम की कार्रवाई का डर. आखिरकार वो सड़क से थोड़ा पीछे हटे और एक खाली जगह पर अपना ठेला जमा लिया.
साकार हुआ मां-भाई का सपना
वड़ा पाव का स्वाद लोगों की जुबान पर ऐसा चढ़ा कि अनिल भाई की किस्मत ही पलट गई. जिस सड़क पर वो कभी वड़ा पाव और सब्जियां बेचने के लिए चक्कर काटा करते थे, वहां एक खूबसूरत बंगला हुआ करता था जिसके मालिक हितेश पारेख थे. समय का पहिया ऐसा घूमा कि अनिल भाई ने उसी आलीशान बंगले को खरीद लिया.
अनिल भाई बेहद सादगी से कहते हैं, "ये बंगला मैंने नहीं, माताजी के आशीर्वाद ने बनवाया है. ये मेरा नहीं, बल्कि मेरी मां और भाई का सपना था जो आज सच हुआ है." आज उसी बंगले के अहाते में ग्राहकों के बैठकर गर्म-गर्म वड़ा पाव खाने की खास व्यवस्था है.
यह कहानी गवाह है कि मेहनत और ईमानदारी से किया गया कोई भी काम छोटा नहीं होता. जो लोग सड़क पर रेहड़ी लगाने वालों को कमतर आंकते हैं, उनके लिए अनिल भाई की ये कहानी एक करारा जवाब और प्रेरणा है.
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