विज्ञापन

क्या सच में भूत होते हैं? वैज्ञानिकों ने बताया क्यों पुरानी इमारतों में लगता है डर, वजह हैरान कर देगी

पुरानी इमारतों में डर और बेचैनी का कारण भूत-प्रेत नहीं बल्कि इन्फ्रासाउंड नाम की अदृश्य ध्वनि हो सकती है. जानिए कैसे यह लो-फ्रीक्वेंसी आवाज हमारे दिमाग और शरीर को प्रभावित करती है और वैज्ञानिकों की नई रिसर्च क्या कहती है.

क्या सच में भूत होते हैं? वैज्ञानिकों ने बताया क्यों पुरानी इमारतों में लगता है डर, वजह हैरान कर देगी
पुरानी इमारतों में क्यों लगता है डर? वैज्ञानिकों ने बताई ऐसी वजह, यकीन नहीं करेंगे आप

क्या आपने कभी किसी पुराने घर या इमारत में कदम रखते ही अजीब सा डर या बेचैनी महसूस की है? ऐसा लगता है जैसे कोई देख रहा हो, या माहौल ही भारी हो. अब वैज्ञानिकों ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है. उनका कहना है कि यह किसी भूत-प्रेत का असर नहीं, बल्कि एक ऐसी आवाज है जिसे हम सुन नहीं सकते, लेकिन महसूस जरूर करते हैं.

क्या है पुरानी इमारतों में डर की वजह?

हाल ही में जर्नल Frontiers in Behavioral Neuroscience में प्रकाशित एक रिसर्च के मुताबिक, पुराने घरों में महसूस होने वाली डरावनी फीलिंग के पीछे इन्फ्रासाउंड (Infrasound) नाम की लो-फ्रीक्वेंसी आवाज होती है. इन्फ्रासाउंड वो ध्वनि होती है जिसकी फ्रीक्वेंसी 20 हर्ट्ज से कम होती है. इंसान इसे सुन नहीं सकता, लेकिन ये हमारे दिमाग और शरीर पर असर डालती है.

कहां से आती है ये अदृश्य आवाज?

यह आवाज अक्सर इन चीजों से पैदा होती है. जैसे- पुराने पाइप्स और उनकी खड़खड़ाहट, वेंटिलेशन सिस्टम, मशीनरी, प्राकृतिक घटनाएं जैसे तूफान, भूकंप और ज्वालामुखी. ये ध्वनियां दीवारों के पार भी आसानी से फैल जाती हैं, जिससे पूरे माहौल में एक अनजाना तनाव बन जाता है.

रिसर्च में क्या सामने आया?

इस स्टडी के प्रमुख वैज्ञानिक Rodney Schmaltz और Kale Scatterty ने 36 छात्रों पर एक प्रयोग किया. छात्रों को एक कमरे में बैठाकर संगीत सुनाया गया. कुछ लोगों को 18 हर्ट्ज का इन्फ्रासाउंड भी सुनाया गया (बिना बताए). बाद में उनकी भावनाएं और स्ट्रेस लेवल (कॉर्टिसोल) चेक किया गया.

नतीजा- जिन लोगों ने इन्फ्रासाउंड एक्सपोजर लिया, उन्हें ज्यादा बेचैनी और चिड़चिड़ापन महसूस हुआ. उनका स्ट्रेस हार्मोन (कॉर्टिसोल) भी बढ़ गया. खास बात: किसी को भी पता नहीं चला कि उन्हें कोई अलग आवाज सुनाई दी.

दिमाग कैसे करता है प्रतिक्रिया?

वैज्ञानिकों का मानना है कि इंसानों का दिमाग इन्फ्रासाउंड को खतरे के संकेत की तरह लेता है. जैसे कुछ जानवर भूकंप या सुनामी से पहले इन लो-फ्रीक्वेंसी वाइब्रेशन को महसूस कर लेते हैं. यानी, जो हमें भूतिया माहौल लगता है, वो असल में हमारे शरीर का प्राचीन अलार्म सिस्टम हो सकता है.

क्या ये रिसर्च पूरी तरह पक्की है?

वैज्ञानिकों ने माना है कि सैंपल साइज छोटा था. सिर्फ एक ही फ्रीक्वेंसी पर टेस्ट हुआ और ज्यादा रिसर्च की जरूरत है. लेकिन फिर भी, यह खोज भविष्य में बिल्डिंग डिजाइन और नॉइज़ कंट्रोल के नियमों को बदल सकती है.

यह भी पढ़ें: बारिश में दिखी इंसानियत! भीग रहा था ऑटो ड्राइवर, महिला ने किया ऐसा काम, कहानी से सबको मिल रही सीख

ऑफिस में 2 बजे काम बंद, शुरू हो जाती है ‘पिकनिक', इस कंपनी की अनोखी पॉलिसी ने जीता सबका दिल

किस्मत अच्छी है मैं दुबई में रहता हूं...मुंबई का हाल देख हैरान हुआ शख्स, बोला- इतनी कीमत, पर सुविधाएं नहीं?

NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं

फॉलो करे:
Listen to the latest songs, only on JioSaavn.com