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चीन और भारत में अंतर देखिए, यहां दहेज लड़कियों की जान ले रहा, वहां लड़कों की जिंदगी खराब

चीन में बढ़ती शादी की लागत और ‘ब्राइड प्राइस’ से युवा पुरुष परेशान हैं, चीनी युवा पुरुष महंगे मकान और लाखों रुपये के ब्राइड प्राइस के कारण शादी से दूरी बना रहे हैं. जबकि भारत में दहेज प्रथा अब भी महिलाओं के खिलाफ हिंसा और मौतों का बड़ा कारण बनी हुई है.

चीन और भारत में अंतर देखिए, यहां दहेज लड़कियों की जान ले रहा, वहां लड़कों की जिंदगी खराब
चीन में दुल्हन लाने के लिए लाखों का ‘ब्राइड प्राइस’, भारत में दहेज से जा रही बेटियों की जान; दो देशों की दो अलग तस्वीरें
अल्टर्ड बाय NDTV
नई दिल्ली:

चीन में लाखों युवा शादी से दूरी बना रहे हैं. वजह सिर्फ प्रेम या रिश्ते नहीं, बल्कि करोड़ों की प्रॉपर्टी, लाखों रुपये का ‘ब्राइड प्राइस' और आर्थिक दबाव है. इसे हम भारत के दहेज सिस्टम के तौर पर देख सकते है, जो बेटियों और उनके माता-पिता पर किसी बोझ से कम नहीं होता. बीबीसी एक खास पॉडकॉस्ट एपिसोड में यह बतया गया कि चीन में कई युवा पुरुष मानते हैं कि शादी अब सामाजिक संस्था से ज्यादा आर्थिक बोझ बन चुकी है. इसी असंतोष ने चीन में एक नए ‘मैनोस्फेयर' को जन्म दिया है, जिसे हम आगे समझेंगे. लेकिन पहले बात ‘दहेज सिस्टम' पर जिससे हम समझेंगे चीन और भारत का अंतर कैसे हमारे यहां दहेज लड़कियों की जान ले रहा, जबकि वहां चीन में लड़कों की जिंदगी खराब कर रहा है.

एक-बच्चा नीति का असर आज भी दिख रहा

चीन की पूर्व वन चाइल्ड पॉलिसी का प्रभाव आज भी समाज में दिखाई देता है. कई परिवारों ने पुत्र को प्राथमिकता दी, जिसका परिणाम यह हुआ कि शादी की उम्र आते-आते पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी अधिक हो गई. पॉडकास्ट के दौरान बताया गया कि 2027 तक विवाह योग्य आयु वर्ग में पुरुषों की संख्या महिलाओं से करोड़ों अधिक हो सकती है. इस असंतुलन ने विवाह को और अधिक प्रतिस्पर्धी बना दिया है. बड़ी संख्या में युवाओं को जीवनसाथी तलाशने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है.

शादी से क्यों दूर हो रहे हैं युवा?

मकाऊ यूनिवर्सिटी के रिसर्च स्कॉलर यिहुआन झांग के अनुसार चीन में युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत केवल साथी न मिलना नहीं है, बल्कि शादी का खर्च है.

चीन के कुछ प्रांतों में ब्राइड प्राइस दो लाख युआन या उससे अधिक तक पहुंच जाती है. कई परिवारों को बेटे की शादी के लिए अपनी जीवनभर की बचत खर्च करनी पड़ती है.

कई पुरुषों का कहना है कि विवाह से पहले घर खरीदना, आर्थिक रूप से स्थिर होना और ‘ब्राइड प्राइस' देना उनके लिए बेहद कठिन होता जा रहा है. इसी वजह से कुछ युवा पुरुष विवाह को खुशी के बजाय आर्थिक बोझ के रूप में देखने लगे हैं.

क्या है ‘ब्राइड प्राइस' विवाद?

पॉडकास्ट के दौरान एक्सपर्ट्स ने बताया कि चीन में ‘कै ली' (Cai Li) या ब्राइड प्राइस एक अहम सामाजिक परंपरा है. शहरी क्षेत्रों में यह अक्सर एक प्रतीकात्मक रस्म होती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों में इसका आर्थिक महत्व काफी अधिक है.

कुछ पुरुषों का तर्क है कि शादी के दौरान केवल उन्हें ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है. इसी वजह से सोशल मीडिया पर ब्राइड प्राइस के खिलाफ नाराजगी देखने को मिलती है.

वहीं एक्सपर्ट्स का कहना है कि यह मुद्दा केवल महिलाओं से नहीं बल्कि व्यापक सामाजिक और आर्थिक ढांचे से जुड़ा हुआ है.

एनसीआरबी के आंकड़े क्या कहते हैं?

एनसीआरबी के आंकड़े क्या कहते हैं?

दहेज की वजह से भारत में हर 90 मिनट में एक मौत

एनसीआरबी के आंकड़े बताते हैं कि भारत में दहेज हत्या के मामलों में पिछले एक दशक में गिरावट जरूर आई है, लेकिन समस्या अब भी भयावह बनी हुई है. 2024 में देशभर में 5,737 दहेज हत्याएं दर्ज की गईं, यानी औसतन हर दिन 15 से अधिक महिलाओं की जान दहेज से जुड़े उत्पीड़न और हिंसा के कारण गई. सबसे ज्यादा मामले उत्तर प्रदेश (2,038), बिहार (1,078) और मध्य प्रदेश (450) में दर्ज हुए. राजस्थान और पश्चिम बंगाल भी इस सूची में प्रमुख राज्यों में शामिल रहे. आंकड़े संकेत देते हैं कि दहेज प्रथा और उससे जुड़ी हिंसा आज भी कई राज्यों में सामाजिक संरचना का गहरा हिस्सा बनी हुई है.

दहेज से जुड़ी मौतें केवल प्रत्यक्ष हत्या तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इनमें आत्महत्या और लगातार प्रताड़ना के बाद हुई असामान्य मौतें भी शामिल हैं.

एनसीआरबी के अनुसार 2024 में देश में पति और उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता के 1.20 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए. उत्तर प्रदेश में 21 हजार से ज्यादा और पश्चिम बंगाल में 19 हजार से अधिक मामले सामने आए. वहीं दहेज निषेध अधिनियम के तहत दर्ज मामलों में लगभग 37 प्रतिशत मामले अब भी लंबित हैं.

इन राज्यों के आंकड़े सबसे ज्यादा खराब

इन राज्यों के आंकड़े सबसे ज्यादा खराब

आदिवासी समुदाय और पूर्वोत्तर राज्यों में उलट है तस्वीर

भारत में जहां दहेज प्रथा आज भी कई राज्यों में सामाजिक अभिशाप बनी हुई है और हर साल हजारों महिलाएं दहेज उत्पीड़न, हिंसा और हत्या का शिकार होती हैं, वहीं देश के कुछ आदिवासी और पूर्वोत्तर के समुदाय बिल्कुल अलग सामाजिक व्यवस्था की मिसाल पेश करते हैं.

पूर्वोत्तर भारत के कई समुदायों में विवाह को आर्थिक लेन-देन या बोझ नहीं, बल्कि दो परिवारों और समुदायों के बीच सामाजिक संबंध के रूप में देखा जाता है. मेघालय के खासी और जयंतिया समुदायों में मातृसत्तात्मक परंपरा है, जहां शादी के बाद महिला नहीं बल्कि पुरुष ससुराल में जाकर रहता है, सास-ससुर का खर्च उठाता है और वहां दहेज जैसी कोई प्रथा नहीं है. परिवार की सबसे छोटी बेटी माता-पिता की देखभाल की जिम्मेदारी निभाती है.

इसी तरह अरुणाचल प्रदेश की गालो जनजाति में विवाह के दौरान दुल्हन पक्ष पर आर्थिक बोझ नहीं डाला जाता, बल्कि वर पक्ष की ओर से पारंपरिक रूप से ‘न्यिरपुंग' (Bride Price) दिया जाता है, जिसे महिला के सम्मान और सामाजिक महत्व का प्रतीक माना जाता है. ऐसे उदाहरण दिखाते हैं कि जहां देश के कई हिस्सों में दहेज के कारण महिलाओं की जान तक जा रही है, वहीं अनेक आदिवासी और पूर्वोत्तर समाज लैंगिक सम्मान, सामुदायिक परंपराओं और अपेक्षाकृत समानतापूर्ण वैवाहिक व्यवस्थाओं की अलग तस्वीर पेश करते हैं.

अब जानते हैं क्या है चीन का ‘मैनोस्फेयर'?

पॉडकास्ट में चर्चा में शामिल एक्सपर्ट्स के अनुसार ‘मैनोस्फेयर' कोई एक संगठन या आंदोलन नहीं है, बल्कि विचारों का एक व्यापक ऑनलाइन नेटवर्क है. चीन में यह पश्चिमी देशों से अलग रूप में दिखाई देता है. यहां कोई खुद को स्त्री-विरोधी बताने वाला इन्फ्लुएंसर एंड्रयू टेट जैसा प्रभावशाली चेहरा नहीं है, जिसके इर्द-गिर्द बड़ी संख्या में लोग जुटते हों. इसके बजाय कई छोटे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर और ऑनलाइन समूह हैं, जहां कुछ पुरुष महिलाओं, फेमिनिस्ट और सामाजिक बदलावों को अपनी समस्याओं का कारण बताते हैं.

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