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विदेश जाने का मौका छोड़कर भारत में रुकने वाले एंटरप्रेन्योर का छलका दर्द, बोले- 'कई बार लगा मैंने गलती की'

चेन्नई में अपना बिजनेस करने वाले सुभाष ने कहा, 'मेरे विदेश जाने की सारी तैयारी हो चुकी थी. लेकिन मैंने पापा को नाराज करके इंडिया को चुना. पढ़ाई के बाद मैंने यहीं बिजनेस किया, क्योंकि भारत ही ऐसा देश है जो मुझसे कभी वीजा नहीं मांगेगा.

विदेश जाने का मौका छोड़कर भारत में रुकने वाले एंटरप्रेन्योर का छलका दर्द, बोले- 'कई बार लगा मैंने गलती की'
चेन्नई के बिजनेसमैन ने 17 साल के संघर्ष के बाद भी इंडिया ना छोड़ने की बात कही है.
X@subashr232

Trending Post: पापा को नाराज करके विदेश जाने से इनकार करने वाले चेन्नई के एंटरप्रेन्योर सुभाष आर ने शुक्रवार को अपने कहानी सोशल मीडिया पर शेयर की है, जो तेजी से वायरल हो रही है. उन्होंने एक्स पर एक लंबी पोस्ट करते हुए लिखा, 'जब मैं मिडिल स्कूल में था, तो विदेश जाने के बारे में सोचना मुझे बहुत फैसिनेटिंग लगता था. इसीलिए मैंने 2003 में SAT की परीक्षा दी थी. तब मुझे NUS और NTU समेत कई जगहों से एडमिशन का मौका मिला. मेरे विदेश जाने की सारी तैयारी हो चुकी थी. लेकिन मुझे CEG में भी एडमिशन मिल गया, जो उस समय तमिलनाडु के सबसे अच्छे इंजीनियरिंग कॉलेजों में से एक था. और मैंने कुछ ऐसा किया जिसकी किसी को उम्मीद नहीं थी. मैंने NUS/NTU के बजाय CEG में मैकेनिकल इंजीनियरिंग को चुना, जिससे पापा नाराज हो गए.'

'सिस्टम की वजह से कई बार फैसले पर हुआ पछतावा'

सुभाष ने कहा, 'अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी होने के बाद, मेरे पास दो रास्ते थे: GRE या CAT. पापा चाहते थे कि मैं GRE दूं और जल्द से जल्द भारत छोड़ दूं. मैंने CAT चुना और यहीं रुक गया. आखिरकार मैंने भारत के सबसे ज्यादा रेगुलेटेड सेक्टर में से एक में अपना बिजनेस शुरू किया. रेगुलेटर्स ने लगभग तीन बार मेरे बिजनेस को खत्म ही कर दिया था. कभी MSE को बंद करना. कभी अपनी मर्जी से कमीशन कम कर देना. कभी मनमाने ढंग से नेट-वर्थ की जरूरतें बढ़ा देना और मेरे बिजनेस के टिके रहने की क्षमता पर ही सवाल उठाना. कई बार मुझे लगा कि क्या यहीं रुकना मेरी गलती थी. सिस्टम ने मुझे ऐसा सोचने के लिए काफी वजहें भी दीं. फिर भी, भगवान की कृपा से, मैं टिका रहा. भारत में कंपनी चलाते हुए मुझे 17 साल हो गए हैं और सब कुछ होने के बावजूद, मैं अब भी इस देश से प्यार करता हूं.'

'मेरा लगाव मेरी निराशाओं से कहीं ज्यादा गहरा है' 

सुभाष ने आगे लिखा, 'शायद यह वह मानसिक शांति है जो मुझे उसके ग्रामीण इलाकों में घूमने पर मिलती है. शायद यह वह आत्म-संतुष्टि है जो उसके मंदिर मुझे देते हैं. शायद यह वह खुशी है जो मुझे मलनाड, अपने पांड्य देश या अपने प्यारे त्रावणकोर में महसूस होती है, जब भी मैं उस धरती पर कदम रखता हूं और वहां की पगडंडियों पर चलता हूं. मैं इस बात से सुकून महसूस करता हूं कि दशकों की समाजवादी नीतियों और राजनीतिक कुप्रबंधन के बावजूद भारत ने इतनी तरक्की की, बजाय इसके कि मैं हर पल उसकी कमियों की शिकायत करता रहूं. मैं भारत की आलोचना कर सकता हूं. यहां की नौकरशाही और नियमों से निराश हो सकता हूं, लेकिन मेरा लगाव मेरी निराशाओं से कहीं ज्यादा गहरा है.'

'17 साल बाद मुझे लगता है कि मेरो फैसला सही था'

सुभाष ने आखिर में लिखा, 'शायद यही बात वे लोग नहीं समझ पाते जो लगातार भारत की तुलना पश्चिम से करते हैं. कोई देश सिर्फ अपनी सड़कों की क्वालिटी, सरकारी कामकाज की कुशलता या लोगों की सैलरी से नहीं पहचाना जाता. इसमें अपनापन, सभ्यता से जुड़ाव और मन की शांति भी होती है, जिसे किसी स्प्रेडशीट पर मापा नहीं जा सकता. मैं किसी बेजान सिस्टम का गुलाम बनकर जिंदगी बिताने के बजाय, उस देश में एक मामूली इंसान बनकर रहना पसंद करूंगा जिसे मैं प्यार करता हूं. मेरे पास देश छोड़ने के मौके थे. मैंने यहीं रहने का फैसला किया. 17 साल बाद, तमाम मुश्किलों, नाकामियों और संघर्षों के बावजूद, मुझे लगता है कि मेरा फैसला सही था. यह देश एकदम परफेक्ट नहीं है. लेकिन यह मेरा है. यह मुझे कभी नहीं छोड़ेगा. मुझे अपने यहां जगह देने के लिए यह वीजा नहीं मांगेगा, क्योंकि इसमें एक आत्मा है और मैं इसका बेटा हूं. और यही बात सबसे बड़ा फर्क पैदा करती है.'

यहां पढ़ें पूरी पोस्ट:-

सोशल मीडिया पर लोगों ने दिए अलग-अलग रिएक्शन्स

सोशल मीडिया पर सुभाष की इस पोस्ट को पढ़कर लोग अलग-अलग रिएक्शन्स दे रहे हैं.

एक यूजर ने लिखा, 'आपका घर चाहे जैसा भी हो, अच्छा या बुरा, वह आपका ही होता है. किसी और के घर में कुछ दिनों से ज्यादा रहने और वहां पराया महसूस कराए जाने का अनुभव अपमानजनक हो सकता है. भले ही वहां जीवन-स्तर कितना भी अच्छा क्यों न हो, वह घर आपका नहीं होता.'

दूसरे यूजर ने लिखा, 'यह बात दिल से निकली थी. हाल ही में मेरे कुछ जूनियर साथियों ने मुझसे पूछा कि मैं भारत में क्यों रुका रहा, और मेरा जवाब भी कुछ ऐसा ही था. यहां अपनापन और जुड़ाव महसूस होता है, जबकि बाकी जगहों पर भले ही मैं सफल हो जाऊं, लेकिन किसी न किसी स्तर पर मैं बाहरी ही कहलाऊंगा.'

तीसरे यूजर ने लिखा, 'मैं आपकी पोस्ट का सम्मान करता हूं. लेकिन मुझे लगता है कि अपार संभावनाओं वाला हमारा देश हमारे नेताओं की वजह से जकड़ा हुआ है. आजादी के समय से ही ये बंधन और कसते जा रहे हैं. भले ही टैक्स की दरें और ओपन लाइसेंस राज खत्म हो गए हों, लेकिन पॉलिसी को लेकर अनिर्णय की स्थिति, नौकरशाही का दखल और अक्षम न्यायपालिका जैसी समस्याएं अभी भी बनी हुई हैं.'

चौथे यूजर ने लिखा, 'सीधी बात यह है कि भारत में रहने का फैसला करने वाला व्यक्ति, विदेश में रहने का फैसला करने वाले व्यक्ति की तुलना में ज्यादा देशभक्त नहीं होता.'

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