अमेरिका के मिडटर्म चुनावों के बाद कांग्रेस (संसद) पर रिपब्लिकन पार्टी का एकतरफा कंट्रोल खत्म हो गया है. इससे भारत के लिए अमेरिका के साथ व्यापार समझौते को लेकर तत्काल दबाव कम हो गया है. गुरुवार को जारी एक नई रिपोर्ट के अनुसार, यह भारत के लिए सकारात्मक घटनाक्रम माना जा रहा है क्योंकि इससे अचानक टैरिफ वृद्धि और व्यापारिक अनिश्चितताओं का जोखिम कुछ हद तक घट सकता है.
एमके ग्लोबल फाइनेंशियल सर्विसेज की रिपोर्ट में कहा गया है कि 18 प्रतिशत की प्रस्तावित अमेरिकी टैरिफ दर कभी लागू नहीं हुई और फिलहाल भारतीय उत्पादों पर अपेक्षाकृत कम 10 प्रतिशत का "सेक्शन 301" शुल्क लागू है. साथ ही अमेरिका अब इंटरनेशनल इमरजेंसी इकोनॉमिक पावर्स एक्ट (IEEPA) के तहत मिलने वाले कुछ प्रभावी दबावकारी विकल्पों का उपयोग नहीं कर पाएगा.
चुनावी नतीजों से ट्रंप पर प्रेशर क्यों?
रिपोर्ट के अनुसार, मिडटर्म चुनावों के नतीजे टैरिफ ढांचे में बहुत बड़ा बदलाव नहीं ला सकते हैं, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की राजनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते हैं. अब उनके पास व्यापारिक तनाव बढ़ाने के सीमित साधन होंगे, जबकि उपभोक्ताओं के लिए कीमतों को नियंत्रित रखने और 2028 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले कुछ व्यापारिक समझौते करने का दबाव बढ़ सकता है.
विश्लेषकों का मानना है कि भविष्य में यदि कोई नया व्यापारिक कदम उठाया जाता है, तो उसे "सेक्शन 301" या "सेक्शन 232" जैसी अपेक्षाकृत धीमी और जांच-आधारित प्रक्रियाओं से गुजरना होगा. इससे अचानक लगाए जाने वाले टैरिफ या व्यापारिक प्रतिबंधों का जोखिम कम हो सकता है.
हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि व्यापार अभी भी उन क्षेत्रों में से एक है जहां राष्ट्रपति के पास पर्याप्त अधिकार बने हुए हैं. इसलिए व्यापारिक नीतियों से जुड़ी सुर्खियों और अस्थिरता की संभावना पूरी तरह समाप्त नहीं होगी, भले ही उसका रुख पहले की तुलना में नरम पड़ जाए.
भारत के लिए कितनी अच्छी खबर?
रिपोर्ट ने भारत के लिए कुछ संभावित जोखिमों की भी पहचान की है. इनमें फार्मास्युटिकल और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों पर संभावित "सेक्शन 232" टैरिफ शामिल हैं. इसके अलावा रूस या ईरान से जुड़े कूटनीतिक प्रयासों में किसी प्रकार की विफलता भारत के कच्चे तेल आयात पर फिर से दबाव बढ़ा सकती है. विश्लेषकों के अनुसार, कमजोर अमेरिकी डॉलर, कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और टैरिफ से जुड़ी अनिश्चितता में कमी भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए सकारात्मक है. इससे रुपए की स्थिरता को समर्थन मिलेगा, निर्यातकों की संभावनाएं बेहतर होंगी और भारतीय परिसंपत्तियों पर जोखिम प्रीमियम धीरे-धीरे कम हो सकता है.
रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रेंट क्रूड अक्टूबर 2026 के उच्चतम स्तर से लगभग 19 प्रतिशत गिरकर 94 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गया है. यह भारत के लिए महत्वपूर्ण राहत है क्योंकि चालू वित्त वर्ष में अब तक देश का तेल आयात बिल 24 प्रतिशत बढ़ा हुआ है और ब्रेंट का औसत मूल्य लगभग 97 डॉलर प्रति बैरल रहा है.
इससे भारतीय रिजर्व बैंक यानी RBI को भी कुछ राहत मिल सकती है, क्योंकि विदेशी मुद्रा बाजार में रुपए की रक्षा करने की लागत लगातार बढ़ रही थी. हालांकि रिपोर्ट के अनुसार यह राहत पूरी तरह स्थायी नहीं होगी.
विश्लेषकों ने कहा कि चालू खाते के घाटे के वित्तपोषण की जरूरत और आरबीआई की बैलेंस शीट पर लगभग 239 अरब डॉलर की फॉरवर्ड डॉलर देनदारियां मौजूद हैं. ऐसे में केंद्रीय बैंक दीर्घकालिक पूंजी प्रवाह का उपयोग विदेशी मुद्रा भंडार और मुद्रा सुरक्षा तंत्र को मजबूत करने में कर सकता है, जिससे रुपए में अत्यधिक तेजी की संभावना सीमित रह सकती है.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भले ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व भविष्य में ब्याज दरों को लेकर नरम रुख अपनाए, लेकिन अमेरिका में लगातार ऊंची मुद्रास्फीति के कारण ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं. यही वजह है कि आरबीआई को भी मौद्रिक नीति के मोर्चे पर सतर्क रहना होगा.
(इनपुट- IANS)
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