अमेरिका में 2026 के मिडटर्म चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप को बड़ा झटका देते हुए विपक्षी डेमोक्रेट्स ने कांग्रेस (संसद) के दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण कर लिया है. इस नतीजे को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के खिलाफ सीधा जनादेश माना जा रहा है, जिन्होंने वोटर्स से कहा था कि ऐसा मान कर वोट दें जैसे चुनाव में वे खुद खड़े हों. डोनाल्ड ट्रंप चुनावी हार के बाद कह रहे हैं कि वह खुद मैदान में होते हो प्रचंड जीत मिलती. ट्रंप हार के लिए खुद के शुरू किए गए ईरान जंग को दोषी मान रहे हैं और उसी जंग की वजह से महंगे हुए तेल और गैस को भी. ट्रंप लगातार उनकी तरफ से बोलने वाले एक खास मीडिया चैनल को भी निशाने पर ले रहे हैं.
ये चुनाव ट्रंप के उतार-चढ़ाव और विवादों से भरे दूसरे कार्यकाल पर एक तरह का जनादेश था. जीवन-यापन की बढ़ती लागत, टैरिफ और ईरान के खिलाफ अमेरिकी युद्ध को लेकर वहां के लोगों में असंतोष था. इस युद्ध के कारण तेल-गैस की कीमतें काफी बढ़ गई हैं, जिसका खामियाजा रिपब्लिकन पार्टी को भुगतना पड़ा है. वहीं, राष्ट्रपति की लोकप्रियता रेटिंग भी अपने सबसे निचले स्तर के करीब है. 'एपी वोटर पोल' के अनुसार, अधिकांश वोटर बढ़ती महंगाई के लिए ट्रंप सरकार को जिम्मेदार मानते हैं और चाहते हैं कि संसद उन पर और अधिक अंकुश लगाए.
भारत के लिए डेमोक्रेटिक बहुमत वाले संसद के क्या मायने हैं?
मिडटर्म चुनावों के बाद अमेरिका संसद के दोनों सदनों पर डेमोक्रेट्स का नियंत्रण होने से, उन्हें कानून बनाने, जांच करने और फंडिंग के मामलों में अधिक ताकत मिल गई है. वैसे संसद सीधे तौर पर अमेरिकी विदेश नीति की कमान नहीं संभाल लेगी, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप के पास वीटो सहित व्यापक कार्यकारी शक्तियां बनी रहेंगी.
लेकिन भारत के लिए इसके गंभीर मायने हैं. संसद और अमेरिकी सरकार द्वारा लिए गए फैसले भारतीय निर्यात, अमेरिका में काम कर रहे भारतीय पेशेवरों के भविष्य और दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग को प्रभावित कर सकते हैं.
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व्यापार और टैरिफ
अमेरिका भारतीय सामानों के लिए एक बड़ा बाजार है, इसलिए अमेरिकी टैरिफ नीति में किसी भी बदलाव का सीधा असर निर्यातकों पर पड़ता है. फरवरी में, दोनों देशों ने एक अंतरिम व्यापार समझौते के लिए एक रूपरेखा पेश की थी, जिसके तहत अमेरिका ने कहा था कि वह भारत से आने वाले सामानों पर 18 प्रतिशत का 'रेसिप्रोकल' (पारस्परिक) टैरिफ लगाएगा. इसके बाद, अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने दुनिया भर के व्यापारिक पार्टनर्स पर टैरिफ लगाने के लिए ट्रंप द्वारा आपातकालीन शक्तियों के इस्तेमाल को खारिज कर दिया, जिससे टैरिफ घटकर 10 प्रतिशत के आधार स्तर पर आ गया.
भारत को अमेरिका के साथ एक पूर्ण व्यापार समझौते का इंतजार है. विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने इस महीने की शुरुआत में मीडिया को बताया था कि भारत-अमेरिका व्यापार समझौता अंतिम रूप लेने के करीब है.
H-1B वीजा और इमिग्रेशन
चुनाव नतीजों का अमेरिका में रह रहे भारतीय पेशेवरों, खासकर H-1B वीजा धारकों पर भी असर पड़ सकता है. अमेरिकी संसद के नियंत्रण में बदलाव से भविष्य के इमिग्रेशन कानूनों और उन पर निगरानी रखने के तरीकों पर असर पड़ सकता है, हालांकि इससे वीजा नियमों में तुरंत कोई बदलाव आए, यह जरूरी नहीं है.
डेमोक्रेटिक पार्टी की जीत से इमिग्रेशन नियमों को लेकर कांग्रेस की जांच-पड़ताल बढ़ सकती है और रिपब्लिकन समर्थित कुछ प्रस्तावों पर रोक लग सकती है. लेकिन ध्यान रहे कि इस नतीजे से ट्रंप के राष्ट्रपति आदेश अपने आप रद्द नहीं हो जाएंगे. इनमें पिछले सितंबर में घोषित नए H-1B वीजा आवेदनों पर 100,000 डॉलर की फीस लगाने का फैसला भी शामिल है.
वैसे अगर डेमोक्रेट्स दोनों सदनों पर कब्जा भी कर लेते हैं, तो भी उनकी ताकत बढ़ेगी जरूर, लेकिन नीतियों को लेकर, खासकर विदेशी मामलों में, उनकी गुंजाइश सीमित ही रहेगी. इसकी वजह है ट्रंप का वीटो, सीनेट का फिलिबस्टर और अर्थव्यवस्था की साझा जिम्मेदारी. फिलिबस्टर अमेरिका की सीनेट का एक नियम है. सीनेट में कोई भी बिल पास कराने के लिए 100 में से 60 वोट चाहिए होते हैं, सिर्फ 51 नहीं. अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने पिछले हफ्ते कहा था कि अगर हाउस में डेमोक्रेट्स का बहुमत हो भी गया, तो भी वे ट्रंप के एजेंडे को रोकने के लिए "बहुत कम" ही कर पाएंगे.
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