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ईरान के 18 लाख के ड्रोन को 37 करोड़ की मिसाइल से गिरा रहा अमेरिका! कैसे अपने ही जाल में फंस गए ट्रंप

US Iran War in Middle East: अमेरिका और खाड़ी में मौजूद उसके सहयोगी देशों के लिए सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं उनके एयर डिफेंस सिस्टम के इंटरसेप्टर खत्म न हो जाएं, जबकि ईरान के पास अभी भी बड़ी संख्या में ड्रोन और मिसाइल मौजूद हैं.

ईरान के 18 लाख के ड्रोन को 37 करोड़ की मिसाइल से गिरा रहा अमेरिका! कैसे अपने ही जाल में फंस गए ट्रंप
US Iran War in Middle East: ईरान के 18 लाख के ड्रोन को 37 करोड़ की मिसाइल से गिरा रहा अमेरिका!
  • ईरान के ड्रोन और मिसाइल हमलों से अमेरिका और उसके सहयोगियों को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है
  • अमेरिका और खाड़ी के देश महंगे एयर डिफेंस सिस्टम पर निर्भर हैं, जबकि ईरान के सस्ते ड्रोन लगातार हमले कर रहे हैं
  • अमेरिका के मिसाइल डिफेंस भंडार पर दबाव बढ़ा है, कई सिस्टम यूक्रेन और अन्य क्षेत्रों में तैनात किए गए हैं
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US Iran War in Middle East: मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान के लगातार ड्रोन और मिसाइल हमले अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए बड़ी चुनौती बनते जा रहे हैं. शुरुआत में इजरायल और अमेरिका को उम्मीद थी कि ईरान पर हमले के बाद वह जल्दी झुक जाएगा. लेकिन सुप्रीम लीडर अली खामेनेई और कई सीनियर अधिकारियों की मौत के बावजूद ईरान हमले जारी रखने में सक्षम रहा है. अमेरिका और खाड़ी में मौजूद उसके सहयोगियों के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईरान के सस्ते ड्रोन बन गए हैं जिनकी कीमत को केवल 18 लाख रुपए तक की है लेकिन उनको मार गिराने के लिए अमेरिका जिन पैट्रियट मिसाइल का इस्तेमाल करता है, उनकी कीमत करीब 40 लाख डॉलर तक हो सकती है.

ईरान के पास अभी भी बड़ी संख्या में ड्रोन और मिसाइलें

मौजूदा स्थिति अमेरिका, इजरायल और खाड़ी के देशों के लिए चिंता बढ़ा रही है. सबसे बड़ा डर यह है कि कहीं उनके एयर डिफेंस सिस्टम के इंटरसेप्टर खत्म न हो जाएं, जबकि ईरान के पास अभी भी बड़ी संख्या में ड्रोन और मिसाइल मौजूद हैं. दरअसल अमेरिका और उसके सहयोगी आने वाले हमलों को रोकने के लिए कई एडवांस हथियार प्रणालियों का इस्तेमाल करते हैं. इनमें थाड इंटरसेप्टर, पैट्रियट मिसाइल सिस्टम और स्टैंडर्ड मिसाइल शामिल हैं. वहीं इजरायल लंबी दूरी के एरो इंटरसेप्टर का भी उपयोग करता है. लेकिन पिछले कुछ वर्षों में इन इंटरसेप्टर की उपलब्धता पर भारी दबाव पड़ा है.

इनमें से कई सिस्टम यूक्रेन को दिए गए हैं, जो रूस के लगातार हवाई हमलों का सामना कर रहा है. कुछ सिस्टम लाल सागर में जहाजों की सुरक्षा के लिए तैनात किए गए, जहां हूती समूह हमले करता रहा है. इसके अलावा कुछ एयर डिफेंस सिस्टम एशिया-प्रशांत क्षेत्र में भी लगाए गए हैं ताकि दक्षिण कोरिया और ताइवान को उत्तर कोरिया और चीन से संभावित खतरों से बचाया जा सके.

इन सब कारणों से अमेरिका के मिसाइल डिफेंस भंडार पर गंभीर दबाव पड़ा है. जून 2025 में अमेरिका और इज़राइल द्वारा ईरान के खिलाफ लड़े गए 12 दिन के युद्ध में ही अमेरिका के लगभग एक चौथाई थाड इंटरसेप्टर इस्तेमाल हो गए थे.

कीमतों में बहुत बड़ा अंतर

सबसे बड़ी चुनौती खाड़ी के देशों के सामने है. ये देश ईरान की लंबी दूरी की मिसाइलों और छोटी दूरी के हथियारों दोनों की पहुंच में हैं. ईरान के शाहेद ड्रोन बड़ा खतरा बन रहे हैं. ये ड्रोन मिसाइलों की तुलना में आसानी से लॉन्च किए जा सकते हैं, कम जोखिम वाले होते हैं और कुछ ही मिनटों में लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं. माना जाता है कि ईरान के पास करीब 80,000 ऐसे ड्रोन मौजूद हैं.

दूसरी ओर यूक्रेन कई वर्षों से इसी तरह के संयुक्त ड्रोन और मिसाइल हमलों का सामना कर रहा है. उसने इससे बचने के लिए कई लेयर वाले एयर डिफेंस सिस्टम विकसित की है. इसमें महंगे इंटरसेप्टर का उपयोग बैलिस्टिक मिसाइलों को गिराने के लिए किया जाता है, जबकि ड्रोन को मशीन गन जैसे सस्ते हथियारों से निशाना बनाया जाता है. इससे महंगे इंटरसेप्टर की बचत होती है.

इसके विपरीत खाड़ी के देश लगभग हर खतरे को रोकने के लिए महंगे सिस्टम जैसे पैट्रियट मिसाइलों पर निर्भर दिखाई देते हैं. यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि कई ड्रोन की कीमत सिर्फ लगभग 20,000 डॉलर (लगभग 18 लाख रुपए) होती है, जबकि एक पैट्रियट मिसाइल की कीमत करीब 40 लाख डॉलर (लगभग 37 करोड़ रुपए) तक हो सकती है.

क्या अमेरिका अपनी रणनीति बदलेगा?

मिसाइल डिफेंस सिस्टम अक्सर एक लक्ष्य को गिराने के लिए कई इंटरसेप्टर लॉन्च करते हैं. इसलिए इनके भंडार तेजी से कम हो सकते हैं और खाड़ी देशों को जल्द ही अपनी रणनीति बदलनी पड़ सकती है.

भले सबसे अधिक जोखिम खाड़ी देशों को है, लेकिन क्षेत्र में तैनात अमेरिकी सैन्य ठिकानों और इज़राइल के लिए भी खतरा बना हुआ है. कुछ अमेरिकी बेस ईरान के शाहेद ड्रोन और छोटी दूरी की मिसाइलों की पहुंच में हैं, जबकि अन्य लंबी दूरी की मिसाइलों से प्रभावित हो सकते हैं.

मिसाइल डिफेंस के वास्तविक भंडार की जानकारी गोपनीय है, लेकिन रक्षा बजट के आंकड़े संकेत देते हैं कि अमेरिकी सेना कुछ दिनों या ज्यादा से ज्यादा कुछ हफ्तों के भीतर दबाव में आ सकती है. ऐसी स्थिति में अमेरिका को दुनिया के अन्य हिस्सों से एयर डिफेंस सिस्टम हटाकर मिडिल ईस्ट भेजने पड़ सकते हैं.

कुल मिलाकर, लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष के लिए अमेरिका और उसके सहयोगियों की तैयारी सीमित दिखाई देती है. भले ही ईरान की लंबी दूरी की मिसाइलें खत्म हो जाएं, लेकिन उसके ड्रोन हमले लंबे समय तक जारी रह सकते हैं. इससे क्षेत्र में ऊर्जा उत्पादन और समुद्री व्यापार प्रभावित हो सकता है तथा वैश्विक तेल कीमतों में भी बढ़ोतरी हो सकती है.

(इनपुट- पीटीआई में छपी द कन्वर्सेशन की रिपोर्ट)

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