- ट्रंप की स्टारगेट AI परियोजना ईरान के खिलाफ युद्ध के कारण UAE में डेटा केंद्रों पर हमलों से प्रभावित हो रही है
- रेनमिन विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार यह युद्ध अमेरिकी वर्चस्व को कमजोर कर रहा है
- ईरान का क्षेत्रीय प्रभाव और सैन्य क्षमता युद्ध के चलते बढ़ी है, जिससे US की सैन्य श्रेष्ठता पर सवाल उठ रहे हैं
ईरान के खिलाफ ट्रंप का युद्ध क्या अमेरिका के सुपरपावर होने या अमेरिकी वर्चस्व का अंत है? चीनी एक्सपर्ट के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की 500 अरब अमेरिकी डॉलर की स्टारगेट एआई परियोजना ईरान के साथ चल रहे युद्ध से प्रभावित हो रही है. ऑर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में अमेरिकी प्रभुत्व को मजबूत करने के उद्देश्य से बनाई गई इस परियोजना की घोषणा पिछले साल जनवरी में ट्रंप के सत्ता में लौटने के तुरंत बाद की गई थी और इसमें ओपनएआई, सॉफ्टबैंक और ओरेकल जैसी प्रमुख कंपनियां शामिल हैं. इस योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संयुक्त अरब अमीरात में दुनिया का सबसे बड़ा एआई डेटा सेंटर क्लस्टर बनाना था.
अमेरिका को पहला झटका
रेनमिन विश्वविद्यालय के अंतरराष्ट्रीय संबंध विभाग के एसोसिएट डीन ली वेई ने कहा कि ईरान के संयुक्त अरब अमीरात में डेटा केंद्रों पर हमले के बाद युद्ध ने नीति के मूल सिद्धांतों पर प्रहार किया है. ली ने शनिवार को बीजिंग में चीन मैक्रोइकॉनॉमी फोरम में कहा, "ट्रंप के सत्ता में दोबारा लौटने के बाद पहली प्राथमिकता स्टारगेट परियोजना थी. पिछले मई में, उन्होंने इस परियोजना को इस क्षेत्र में स्थापित करने के लिए विशेष रूप से मिडिल ईस्ट का दौरा किया था. वर्तमान में, संयुक्त अरब अमीरात में कंप्यूटिंग केंद्रों पर ईरान के हमलों ने स्टारगेट के मध्य पूर्वी विस्तार पर अनिश्चितता पैदा कर दी है.”
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ली ने आगे कहा कि अमेरिका एक गलत युद्ध में फंस गया है और इस संघर्ष ने अमेरिका के वर्चस्व को तेजी से कमजोर करना शुरू कर दिया है. फिलहाल, अमेरिका को इस युद्ध से कोई ठोस लाभ नहीं मिला है. इसके बजाय, इसने यूरोप, एशिया और मिडिल ईस्ट सहित अपने सहयोगियों के मन में अमेरिकी क्षमता और रणनीति को लेकर संदेह को और बढ़ा दिया है. ली की बात से सहमत होते हुए अन्य वक्ताओं ने भी माना कि ईरान के खिलाफ अमेरिका-इजरायल युद्ध ने अमेरिकी शक्ति की सीमाओं को उजागर कर दिया है.
अमेरिका को दूसरा झटका
अल जजीरा के अनुसार, रेनमिन विश्वविद्यालय के मध्य पूर्व अध्ययन संस्थान के निदेशक तियान वेनलिन ने कहा कि युद्ध ने ईरान की क्षेत्रीय स्थिति को भी मजबूत किया है. अमेरिका पर पहले ही 39 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का अमेरिकी राष्ट्रीय ऋण है. इस युद्ध की अनुमानित 50 अरब अमेरिकी डॉलर की लागत अमेरिका की खोखली अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डालेगी. उन्होंने यह भी तर्क दिया कि ड्रोन या हाइपरसोनिक मिसाइलों के उपयोग सहित कभी भी और कहीं भी युद्ध छेड़ने की ईरान की क्षमता भी अमेरिकी पारंपरिक सेनाओं के लिए एक चुनौती है. तियान ने कहा, "जिस तरह से युद्ध आगे बढ़ रहा है, उससे अमेरिकी सेना के अजेय होने का मिथक भी चकनाचूर हो गया है. इसका भविष्य में अमेरिकी प्रतिरोध पर गहरा प्रभाव पड़ेगा.
अमेरिका को तीसरा झटका
तियान वेनलिन ने कहा कि वाशिंगटन एक रणनीतिक दुविधा में फंसा हुआ है और युद्ध को जल्द समाप्त करने से उसकी कमजोरी उजागर हो जाएगी, जबकि इसमें और अधिक शामिल होने से वियतनाम जैसी दलदल जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. इस "हार-हार" वाली स्थिति ने अमेरिकी नीति निर्माताओं को असमंजस में डाल दिया है क्योंकि समय से पहले पीछे हटना और युद्ध को और बढ़ाना, दोनों ही समान रूप से हानिकारक माने जाते हैं. इसके विपरीत, उन्होंने कहा कि ईरान का प्रभाव तेजी से बढ़ा है और उसकी अप्रत्याशित दृढ़ता ने उसे होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण के माध्यम से एक रणनीतिक हथियार दे दिया है - जो वैश्विक तेल बाजार के लिए एक महत्वपूर्ण शिपिंग मार्ग है.
ईरान से ये हाल तो चीन के साथ क्या होगा?
रेनमिन विश्वविद्यालय के आर्थिक अनुसंधान संस्थान के सह-निदेशक माओ झेनहुआ ने कहा कि वैश्विक राजनीति के "बड़े भाई" ने अपना "असली रंग दिखा दिया है". उन्होंने आगे कहा कि यदि अमेरिका ईरान जैसे प्रतिबंधित देश से निपटने में संघर्ष कर रहा है, तो चीन जैसी प्रमुख शक्तियों को दबाव में लाने की उसकी क्षमता लगभग समाप्त हो चुकी है. माओ ने यह भी कहा कि बीजिंग को अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लानी चाहिए और दक्षिण-पूर्व एशिया में संवेदनशील समुद्री मार्गों से बचने का लक्ष्य रखना चाहिए, उदाहरण के लिए म्यांमार के माध्यम से भूमि मार्ग विकसित करके. उन्होंने कहा, "हमें यह आकलन करना होगा कि मौजूदा भू-राजनीतिक संदर्भ में अन्य जोखिम भी हैं या नहीं, जैसे कि मलक्का जलडमरूमध्य से जुड़े जोखिम."
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