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अमेरिका का आखिर इतना दुलारा क्यों है इजरायल, हर देश से भिड़ने को तैयार, ये 6 वजह हैरान करने वाली

US Israel Iran War: अमेरिका और इजरायल की गहरी दोस्ती के पीछे ये खास वजह है. ईरान-इजरायल के मौजूदा युद्ध के दौरान भी दोनों देश एक-दूसरे के साथ हर जोखिम लेने को तैयार दिखते हैं.

अमेरिका का आखिर इतना दुलारा क्यों है इजरायल, हर देश से भिड़ने को तैयार,  ये 6 वजह हैरान करने वाली
US Israel Iran War
नई दिल्ली:

अमेरिका और इजरायल के रिश्तों को आज के जमाने में जय-वीरू की दोस्ती कहा जाए तो अतिश्योक्ति नहीं होगी. लेकिन छोटा सा यहूदी देश इजरायल आखिर अमेरिका का इतना दुलारा क्यों है. ऐसा क्या है कि अमेरिका इस्लामिक देशों के साथ रूस, चीन जैसी महाशक्तियों से भी इजरायल के लिए टकराने को तैयार है. खुद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इजरायल की खातिर यूरोप से अमेरिका के सदियों रिश्तों को भी ताक पर रख दिया. ट्रंप ने अपनी पूरी सियासी पूंजी ईरान के खिलाफ इजरायल के मौजूदा युद्ध में दांव पर लगा दी है. अगर ट्रंप और इजरायल की हार हुई या उन्हें पीछे हटना पड़ा तो ट्रंप के लिए देश में होने वाले मध्यावधि चुनाव में टिक पाना मुश्किल होगा. संसद में बहुमत खोया तो उन्हें महाभियोग का सामना भी करना पड़ सकता है. 

1. अमेरिका-इजरायल की दोस्ती

अमेरिका इजरायल को मध्य पूर्व में अपना एक ऐसा 'विमान वाहक पोत' मानता है जिसे कोई डुबो नहीं सकता.तेल-गैस के भंडार वाले देशों के साथ पूरे खाड़ी क्षेत्र में अपना दबदबा रखता है.  इजरायल उसकी आंख और कान बनकर काम करता है. ईरान के साथ बढ़ते टकराव के दौरान इजरायल ने अमेरिकी हितों की रक्षा में ढाल का काम किया है.

2. हथियारों की टेस्टिंग

अमेरिका इजरायल को हर साल अरबों डॉलर (2026 बजट में 4 अरब डॉलर) की सैन्य सहायता देता है, लेकिन यह पैसा वापस अमेरिका ही आता है. इजरायल इस पैसे से अमेरिकी हथियार खरीदता है. जब इजरायल इन हथियारों को युद्ध जैसे गाजा या लेबनान में इस्तेमाल करता है तो उनका रियल टाइम डेटा अमेरिकी कंपनियों को मिलता है. इससे अमेरिकी हथियारों (जैसे F-35 और मिसाइल डिफेंस) को सुधारने में मदद मिलती है. इजरायल की मिसाइल डिफेंस प्रणाली आयरन डोम में अमेरिका का भी निवेश है.

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3. खुफिया जानकारी में सहयोग

इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद का नेटवर्क पूरे इस्लामिक देशों में बहुत गहरा है. अमेरिका को कट्टरपंथी संगठनों और ईरान के परमाणु कार्यक्रम की जो बारीक जानकारियां इजरायल से मिलती हैं, वे उसे दुनिया की कोई और एजेंसी नहीं दे सकती. यह जानकारी अमेरिका को अपने देश पर होने वाले आतंकी हमलों को रोकने में मदद करती है.

4. आर्थिक और तकनीकी साझेदारी

इजरायल को स्टार्टअप नेशन कहा जाता है. इंटेल (Intel), गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी अमेरिकी कंपनियों के सबसे बड़े रिसर्च सेंटर इजरायल में हैं.इजरायली कंपनियों ने अमेरिका में लाखों नौकरियां पैदा की हैं. अमेरिका के आईटी हब सिलिकॉन वैली और इजरायल के बीच अटूट रिश्ता है.

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5. घरेलू राजनीति 

अमेरिका में इजरायल समर्थक गुट (Lobbies) बहुत शक्तिशाली हैं.अमेरिकन इजरायल पब्लिक अफेयर्स कमेटी (AIPAC) जैसी संस्थाएं अमेरिकी चुनावों में बहुत प्रभाव रखती हैं. कोई भी अमेरिकी राष्ट्रपति या सांसद इजरायल के खिलाफ जाकर अपना राजनीतिक करियर दांव पर नहीं लगाना चाहता.

6. ईसाई और यहूदियों का रिश्ता

अमेरिका में एक बड़ा वर्ग (ईसाई) धार्मिक मान्यताओं के कारण इजरायल का समर्थन करना अपना पवित्र कर्तव्य मानता है. यहूदियों की हिफाजत करना वो अपना धार्मिक और नैतिक कर्तव्य मानते हैं.

अमेरिका को महाशक्ति बनाने में मदद

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप से पलायन कर रहे हजारों यहूदी बुद्धिजीवियों, वैज्ञानिकों और कलाकारों को शरण दी. एडोल्फ हिटलर के जर्मनी में यहूदियों पर अत्याचार के बाद सबसे प्रतिभाशाली यहूदी अमेरिका पहुंचे.

1.अल्बर्ट आइंस्टीन (Albert Einstein) ने 1933 में ही जर्मनी छोड़ा और प्रिंसटन में शरण ली. आइंस्टीन द्वारा राष्ट्रपति रूजवेल्ट को लिखे पत्र ने ही 'मैनहट्टन प्रोजेक्ट' (परमाणु बम) की नींव रखी.

2. एडवर्ड टेलर (Edward Teller): इन्हें 'हाइड्रोजन बम का पिता' कहा जाता है. वो हंगरी के यहूदी थे जो नाजीवाद से बचकर अमेरिका आए.

3. लियो ज़िलार्ड ने ही पहली बार 'न्यूक्लियर चेन रिएक्शन' की कल्पना की थी. वो भी हंगरी से पलायन कर अमेरिका पहुंचे और परमाणु ऊर्जा के विकास में बड़ी भूमिका निभाई.

राजनीतिक और दार्शनिक हस्तियां को पनाह दी

1. हन्ना आरेंड्ट (Hannah Arendt) 20वीं सदी की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक दार्शनिक थीं. वो जर्मनी से भागकर अमेरिका आईं और उन्होंने तानाशाही पर कालजयी किताबें लिखीं.
2. हेनरी किसिंजर (Henry Kissinger)1938 में एक किशोर के रूप में जर्मनी से भागकर अमेरिका आए थे, लेकिन बाद में वे अमेरिका के सबसे शक्तिशाली विदेश मंत्री बने.

ऑपरेशन पेपरक्लिप चलाया

द्वितीय विश्व युद्ध के तुरंत बाद (1945-1959) अमेरिका ने 'ऑपरेशन पेपरक्लिप' चलाया. इसमें अमेरिका ने न केवल यहूदियों को शरण दी, बल्कि 1600 से अधिक जर्मन वैज्ञानिकों को भी गोपनीय रूप से अमेरिका बुलाया.

1. इसमें वर्नर वॉन ब्रौन (Wernher von Braun) जैसे वैज्ञानिक शामिल थे, जिन्होंने बाद में अमेरिका के 'अपोलो' मून मिशन और नासा (NASA) की सफलता में मुख्य भूमिका निभाई.बिली वाइल्डर (Billy Wilder) ऑस्ट्रियाई यहूदी थे, जो हॉलीवुड के महानतम निर्देशकों में से एक बने.

2. जॉन वॉन न्यूमैन (John von Neumann) आधुनिक कंप्यूटर और 'गेम थ्योरी' के जनक थे. हंगरी के इस यहूदी गणितज्ञ के बिना आधुनिक कंप्यूटिंग संभव नहीं थी।

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