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अमेरिका ने ईरान जंग में झोंक दिए खरबों रुपये, पेंटागन के नए आंकड़े क्यों डराते हैं?

पेंटागन ने हाल ही में ईरान के साथ चल रहे इस संघर्ष की लागत 29 अरब डॉलर बताई है. गौर करने वाली बात यह है कि मात्र दो हफ्ते पहले अमेरिकी रक्षा विभाग ने कांग्रेस को यही खर्च 25 अरब डॉलर बताया था.

अमेरिका ने ईरान जंग में झोंक दिए खरबों रुपये, पेंटागन के नए आंकड़े क्यों डराते हैं?

अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव अब केवल मिसाइलों और बमों तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की जेब पर भी भारी पड़ रहा है. एक तरफ जहां पेंटागन इस युद्ध का खर्च करोड़ों में बता रहा है, वहीं विशेषज्ञों का दावा है कि असली आंकड़ा खरबों डॉलर तक पहुंचने वाला है. सवाल यह है कि क्या अमेरिकी सरकार जनता से इस युद्ध की असली कीमत छुपा रही है?

पेंटागन ने हाल ही में ईरान के साथ चल रहे इस संघर्ष की लागत 29 अरब डॉलर बताई है. गौर करने वाली बात यह है कि मात्र दो हफ्ते पहले अमेरिकी रक्षा विभाग ने कांग्रेस को यही खर्च 25 अरब डॉलर बताया था. यानी महज 14 दिनों में अनुमानित खर्च 4 अरब डॉलर बढ़ गया. सीनियर अधिकारियों का कहना है कि इस नए आंकड़े में हथियारों की मरम्मत, पुराने उपकरणों को बदलने और ऑपरेशनल खर्चों को शामिल किया गया है.

हालांकि, जानकारों का मानना है कि यह केवल दिखाने की बात है. सीएनएन की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने पहले जो 25 अरब डॉलर का आंकड़ा दिया था, वह बेहद कम करके आंका गया था क्योंकि उसमें मिडिल ईस्ट में अमेरिकी ठिकानों को हुए नुकसान की मरम्मत का खर्च शामिल ही नहीं था.

$1 ट्रिलियन का अनुमान

सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक,  हार्वर्ड केनेडी स्कूल की सार्वजनिक नीति विशेषज्ञ लिंडा बिल्म्स ने इस युद्ध को लेकर एक चेतावनी जारी की है. उनका कहना है कि अमेरिकी टैक्सपेयर्स को इस युद्ध के लिए कम से कम 1 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 84 लाख करोड़ रुपये) चुकाने होंगे. बिल्म्स के मुताबिक, इतिहास गवाह है कि युद्ध हमेशा उम्मीद से कहीं ज्यादा महंगे साबित होते हैं.

उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि पूर्व राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू. बुश ने अपने आर्थिक सलाहकार लैरी लिंडसे को सिर्फ इसलिए पद से हटा दिया था क्योंकि उन्होंने इराक युद्ध का खर्च 200 अरब डॉलर होने की भविष्यवाणी की थी. अंत में वह युद्ध 5 ट्रिलियन डॉलर से भी ज्यादा महंगा पड़ा. इसी तरह रूस ने भी सोचा था कि वह कुछ हफ्तों में यूक्रेन जीत लेगा, लेकिन नतीजा सबके सामने है.

क्यों बढ़ती जा रही है युद्ध की लागत?

बिल्म्स ने इस खर्च को दो हिस्सों में बांटा है. अल्पकालिक खर्चों में मिसाइलें, बम, इंटरसेप्टर, लड़ाकू विमानों का रखरखाव और सैनिकों का वेतन शामिल है. सबसे चौंकाने वाली बात 'रिप्लेसमेंट कॉस्ट' है. उदाहरण के लिए, सेना के पास जो 'टॉमहॉक मिसाइल' पहले से स्टॉक में है, उसकी कीमत 20 लाख डॉलर हो सकती है, लेकिन आज उसे दोबारा खरीदने या बनाने में 35 लाख डॉलर तक खर्च हो रहे हैं.

इसके अलावा, मध्यम और दीर्घकालिक खर्च और भी बड़े हैं. अगले 4-5 वर्षों तक सैन्य ठिकानों की मरम्मत, नई तकनीक वाले हथियारों का स्टॉक भरना और क्षेत्र में तैनात 55,000 अमेरिकी सैनिकों की स्वास्थ्य देखभाल पर भारी पैसा खर्च होगा. युद्ध में तैनात सैनिकों को कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है, जिसका बोझ भविष्य में वेटरन्स केयर (पूर्व सैनिक कल्याण) बजट पर पड़ेगा.

आम आदमी की जेब पर सीधा असर

इस युद्ध का असर केवल बॉर्डर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर अमेरिकी की रसोई और गाड़ी तक पहुंच रहा है. युद्ध के कारण ऊर्जा संकट गहरा गया है और अमेरिकी ऊर्जा विभाग का अनुमान है कि कच्चे तेल की कीमतें आने वाले हफ्तों में 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर बनी रहेंगी.

आर्थिक विश्लेषकों ने चेतावनी दी है कि अगर तनाव कम नहीं हुआ, तो अमेरिका में पेट्रोल की औसत कीमत 5 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच सकती है. इसका सीधा मतलब है कि महंगाई और बढ़ेगी, जिससे आम जनता का बजट पूरी तरह बिगड़ सकता है.

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