- अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध के बाद होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से तेल की कीमतें युद्ध से पहले से काफी बढ़ गईं
- सीजफायर के बावजूद युद्ध में नुकसान पहुंची तेल और गैस सुविधाओं की मरम्मत में महीनों या सालों का समय लग सकता है
- फारस की खाड़ी में हजारों जहाज और लाखों बैरल तेल युद्ध की वजह से फंसे हुए हैं, जिससे सप्लाई प्रभावित हुई है
अमेरिका और ईरान के बीच भीषण जंग के बाद आखिरकार सीजफायर हो गया है. लेकिन अभी भी माहौल तनाव वाले ही बने हुए हैं. सीजफायर की शर्त में होर्मुज स्ट्रेट खोलना भी शामिल है. ऐसे में जब सीजफायर की खबरें सामने आईं, तो लोगों के मन में सबसे बड़ा सवाल यही है कि पेट्रोल-डीजल और गैस की कीमतें वापस पहले की तरह सामान्य कब होंगी? क्या कभी तेल की कीमतें पहले की तरह हो भी पाएंगी या नहीं? आइए समझते हैं.
तेल की कीमतें छू रही आसमान
28 फरवरी को जब से ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच युद्ध शुरू हुआ है, तभी से तेल की कीमतों में बड़ा उछाल आया है. इसका सबसे बड़ा कारण होर्मुज स्ट्रेट का बंद होना है. दरअसल होर्मुज पर ईरान का कंट्रोल है. ऐसे में उसने अमेरिका पर दबाव डालने के लिए इसे बंद कर दिया. इस समुद्री रास्ते से दुनिया का 20 फीसदी तेल का आवागमन होता है. युद्ध की शुरुआत में कच्चे तेल की कीमत 119 डॉलर यानी करीब 11,050 रुपये प्रति बैरल तक पहुंच गई थी. हालांकि अब कीमत 16% गिरकर 93 डॉलर लगभग 8,636 रुपये प्रति बैरल पर आ गई हैं. लेकिन युद्ध से पहले यही कीमत 70 डॉलर यानी करीब 6,500 रुपये पर थी.
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कब नॉर्मल होंगी तेल की कीमतें
अब सीजफायर हो चुका है. अगले हफ्ते इस्लामाबाद में ईरान और अमेरिका के बीच शांति वार्ता भी होनी है. ऐसे में तेल की कीमतों में गिरावट हो सकती है. लेकिन सीजफायर होने के बावजूद दुनिया भर में तेल और गैस की कीमतों को युद्ध से पहले वाले स्तर पर लौटने में कई हफ्तों या महीनों का समय लग सकता है. इसके पीछे कई बड़ी वजहें हैं.

Oil Price
तबाह हो चुका है इंफ्रास्ट्रक्चर
सीजफायर और शांति वार्ता के बात अगर होर्मुज स्ट्रेट पूरी तरह खुल भी जाएगा, तो भी कीमतें अपने आप पुरानी स्थिति में नहीं लौटेंगी. युद्ध के कारण सऊदी अरब, कतर, यूएई और कुवैत में तेल और गैस सुविधाओं को भारी नुकसान पहुंचा है, जिसकी मरम्मत में हफ्तों या महीनों का समय लगेगा. जैसे ईरान के खतरनाक हमले के बाद कतर में एलपीजी हब का आउटपुट लगभग 20 फीसदी घट गया है. माना जा रहा है कि इसे पहले की क्षमता पर लौटने में 3 से 5 साल तक का वक्त लग सकता है.
होर्मुज बंद होने से समंदर में लगा जहाजों का जाम
युद्ध की वजह से खाड़ी में करीब 2,000 जहाज और 20,000 नाविक युद्ध की शुरुआत से ही फंसे हुए हैं, जिनमें से कई जहाजों पर राशन और पानी तक की कमी हो गई है. फारस की खाड़ी में करीब 180 मिलियन बैरल कच्चा तेल और 1 मिलियन टन से ज्यादा एलएनजी फंसा हुआ है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस बैकलॉग को साफ करना एक बड़ी चुनौती है. अगर होर्मुज खुलता भी है, तो भी इन जहाजों को निकलने में करीब जुलाई तक का वक्त लग जाएगा.

ईरान टोल वसूलने की कर रहा तैयारी
इस युद्ध में ईरान को भारी नुकसान हुआ है. उसका इंफ्रास्ट्रक्चर तबाह हो चुका है. ऐसे में इस युद्ध की लागत का हर्जाना भी वह होर्मुज से वसूलने की तैयारी कर रहा है. ईरान ने सीजफायर समझौते में होर्मुज से गुजरने वाले जहाजों से 2 मिलियन डॉलर यानी करीब 1.86 करोड़ रुपये का टोल मांगने का प्रस्ताव रखा है, जिसे युआन या क्रिप्टोकरेंसी में चुकाना होगा. अगर ऐसा हुआ तो तेल के आयात-निर्यात में एक्स्ट्रा खर्चा बढ़ जाएगा. जहाजों को होर्मुज से गुजरने के लिए मोटा पैसा देना होगा, इससे जाहिर तौर पर तेल की कीमतों में उछाल आएगा. यानी सीजफायर के बाद तेल का पुरानी कीमतों तक पहुंचना काफी मुश्किल ही लग रहा है.
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भारत पर क्या होगा असर?
ईरान अमेरिका युद्ध का असर दुनिया के कई देशों पर पड़ा है. कई देश ईंधन की भारी किल्लत का सामना कर रहे हैं और पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ा रहे हैं. वहीं भारत ने बेहतरीन तरीके से इस संकट को संभाला है. भारत सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में 10 रुपये प्रति लीटर की कटौती की है और तेल कंपनियों को दाम न बढ़ाने के निर्देश दिए हैं, जिससे घरेलू स्तर पर कीमतें स्थिर बनी हुई हैं. होर्मुज खुलने के बाद भारत ईरान से इस मुद्दे पर कूटनीतिक बातचीत जारी रहेगा. जिस तरह युद्ध के हालात में भारत ने अपने जहाजों को सुरक्षित निकाला उम्मीद है कि वह आगे भी तेल की सप्लाई के लिए कदम उठाएगा.
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