- ईरान और अमेरिका के बीच एक महत्वपूर्ण MoU अंतिम चरण में है जो संघर्ष समाप्ति से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है
- वार्ता में परमाणु कार्यक्रम को फिलहाल शामिल नहीं किया गया है और यह बाद में चर्चा के लिए छोड़ा गया है
- ईरान ने अपने जमे हुए वित्तीय संसाधनों की तत्काल रिहाई को वार्ता में शामिल होने की प्रमुख शर्त बताया है
हाल ही में ईरान के विदेश मंत्रालय ने संकेत दिया है कि वह एक महत्वपूर्ण समझौता ज्ञापन (MoU) को अंतिम रूप देने के चरण में है. यह पहल मुख्य रूप से संघर्ष की समाप्ति से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित है. प्रस्तावित ज्ञापन में विशेष रूप से अमेरिकी नौसैनिक गतिविधियों की समाप्ति और ईरान के जमे हुए वित्तीय संसाधनों की रिहाई जैसे अहम विषय शामिल हैं. हालांकि, यह समझना जरूरी है कि समझौता ज्ञापन और औपचारिक संधि में स्पष्ट अंतर होता है. मौजूदा स्थिति में दोनों पक्षों ने केवल कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों विशेषकर युद्ध की समाप्ति पर बातचीत जारी रखने पर सहमति जताई है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह वार्ता सरलता से निर्णायक परिणाम तक पहुंचना आसान नहीं होगा.
इस समझौते की राह में भरोसे की कमी और बढ़ते टकराव को समझने के लिए ईरान के सहर टीवी के पत्रकार राशिद नकवी से NDTV ने बात की जिन्होंने विस्तार से बताया कि किन बातों पर ईरान आगे बढ़ना चाहता है और कहां रुकेगी बात?
वार्ता में सामने आ रहीं बड़ी चुनौतियां
ईरानी पत्रकार राशिद नकवी ने बताया कि यदि अमेरिका ने अपने रुख में लचीलापन नहीं दिखाया, तो यह वार्ता विफल हो सकती है. ईरानी वार्ता टीम के एक जानकार सूत्र ने इस प्रक्रिया को लेकर संदेह भी जताया है. उनका कहना है कि अमेरिका ने अपनी शुरुआती आक्रामक रणनीति में कुछ बदलाव किए हैं और यह स्वीकार किया है कि ईरान को दबाव से झुकाया नहीं जा सकता. इसके बावजूद, वार्ता में अब भी तीन बड़ी बाधाएं मौजूद हैं.
1. परमाणु मुद्दे पर असहमति
ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान दौर की बातचीत में वह परमाणु कार्यक्रम को शामिल नहीं करेगा. ईरान का कहना है कि केवल तभी अगले चरण में इस विषय पर चर्चा होगी जब दूसरा पक्ष पहले विश्वास बहाली के उपायों को लागू करेगा. इसका मतलब है कि परमाणु कार्यक्रम को फिलहाल वार्ता से बाहर रखा गया है, जो अमेरिका की प्राथमिक चिंताओं में शामिल रहा है.
2. जमे हुए फंड्स की रिहाई
ईरान के लिए सबसे महत्वपूर्ण और बुनियादी शर्त है कि उसके ब्लॉक किए गए फंड्स को पहले जारी किया जाए. ईरानी पक्ष का कहना है कि जब तक ये वित्तीय संसाधन औपचारिक रूप से मुक्त नहीं किए जाते, तब तक वे वार्ता में पूरी तरह शामिल नहीं होंगे. यह मुद्दा दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
3. हॉर्मुज पर नियंत्रण
तीसरा और सबसे जटिल मुद्दा है हॉर्मुज स्ट्रेट में जहाजों की आवाजाही को लेकर मतभेद. अमेरिका चाहता है कि इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग की स्थिति पहले जैसी बहाल हो जाए और अंतरराष्ट्रीय जहाजों की निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित हो. वहीं ईरान का कहना है कि वह केवल जहाजों की संख्या को पुराने स्तर पर लाने के लिए तैयार है, लेकिन नियंत्रण उसके अपने मॉडल के अनुसार रहेगा. ईरान चाहता है कि जहाजों की आवाजाही उसकी अनुमति से हो,और वे उसी मार्ग का पालन करें जो ईरान निर्धारित करेगा. यह प्रस्ताव अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और सुरक्षा के लिए एक बड़ा विवाद का कारण बन सकता है.
ईरानी सूत्रों का कहना है कि भले ही अमेरिका ने कुछ मामलों में ईरान के रुख को स्वीकार किया हो, लेकिन ये तीन मुख्य विवाद अभी भी गंभीर रूप से बने हुए हैं. यही मुद्दे इस वार्ता के भविष्य को तय करेंगे.
ईरान ने यह भी स्पष्ट किया है कि वह हर संभावित स्थिति के लिए तैयार है. इससे साफ संकेत मिलता है कि दोनों देशों के बीच बातचीत अभी निर्णायक मोड़ से दूर है और आगे की दिशा काफी हद तक अमेरिका के रवैये पर निर्भर करेगी.
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